मैं नहीं मानता कि ईश्वर से प्रेम करना तो पवित्र है और अपने परिवार से प्रेम करना आसक्ति-14 फरवरी 2013

प्रेम

कल मैंने गुरु और धर्मोपदेशक से अ-धार्मिक और नास्तिक हो जाने की अपनी परिवर्तन-प्रक्रिया के बारे में कुछ लिखा था। इस दौरान इतना कुछ बदला और मैंने बहुत सारे पृष्ठ विस्तृत रूप से इसका निरूपण करते हुए लिखे। सच तो यह है कि सब कुछ बदल गया, यहाँ तक कि प्रेम के बारे में मेरे विचार भी। जब मैं धर्मग्रंथों पर प्रवचन किया करता था, मैं प्रेम को उन ग्रन्थों के माध्यम से समझता था। उनमें लिखा है कि अपने परिवार, माता-पिता, बच्चों, भाई-बहनों और नाते-रिश्तेदारों से होने वाला आपका प्रेम सिर्फ आसक्ति है और ईश्वर के प्रति आपका प्रेम ही वास्तविक प्रेम है।

मैं इस बात पर विश्वास करता था और यही बातें अपने प्रवचनों में लोगों से कहता था। अगर आपने इस विचार के बारे में नहीं सुना है तो आपको यह बात बहुत अनोखी, बल्कि बहुत कठोर लग सकती है लेकिन वहां (भारत में), यह एक सामान्य रूप से प्रचलित और मान्य विचार है जिसे लोग सच मानते हैं। इसीलिए साधु, जो सभी आसक्तियों से अपने आपको मुक्त करना चाहते हैं, अपने घर-बार और परिवार का परित्याग कर देते हैं। वे सीधे अपना घर छोडकर कहीं चले जाते हैं और अपने बच्चों तक से कोई संबंध नहीं रखते। वे ईश्वर-प्रेम में अपना जीवन गुजारना चाहते हैं और लोग उनकी इस इच्छा का सम्मान करते हैं। यहाँ तक कि लोग उन्हें बहुत धर्मपरायण और पुण्यात्मा समझते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। आखिर उन्होंने ऐसा काम किया होता है जो सामान्यतः लोग नहीं कर पाते- अपने परिवार के साथ विलग होकर उनके प्रति अपने मोह और आसक्ति का परित्याग।

मैं उस वक़्त इस बात पर पूरा विश्वास करता था लेकिन अब बिल्कुल नहीं। अब मैं विश्वास करता हूँ कि अपने माता-पिता, बच्चों, अपने परिवार और मित्रों के प्रति आपका प्रेम ही वास्तविक प्रेम है। ईश्वर से प्रेम मेरी नज़र में पवित्र प्रेम नहीं है।

मैं नहीं समझता कि ईश्वर से आप विशुद्ध प्रेम कर सकते हैं। वहाँ या तो डर इसका कारण होगा या फिर कोई लालच। और हमारे माता-पिता और परिवार ही ईश्वर के बारे में इस भावना को हमारे भीतर प्रतिष्ठापित करते हैं। अगर आप समझते हैं कि लालच कुछ ज़्यादा ही कटु शब्द है तो उसे आप ‘ईश्वर की अनुकंपा की अपेक्षा’ कह सकते हैं। आप ईश्वर के बारे में तभी जानते हैं जब आपके माता-पिता आपको उसके बारे में बताते हैं। अगर तुम कोई बुरा काम करते हो तो ईश्वर सब कुछ देख लेता है! दूसरों से लड़ाई मत करो या झूठ मत बोलो, ईश्वर सब जानता है! अगर जीवन में तुम कुछ बनना चाहते हो तो अच्छे बनो और जैसा ईश्वर ने कहा है वह करो! अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा में ईश्वर का उपयोग करते हैं- धमकी के रूप में या उन्हें भरोसा दिलाकर कि ईश्वर उन्हें पुरस्कृत करेगा। निश्चय ही धार्मिक अभिभावक तर्क कर सकते हैं कि वे इस तरह कभी भी ईश्वर का नाम नहीं घसीटते और सिर्फ ईश्वर के प्रेम के बारे में अपने बच्चों को बताते हैं, कि वह हमेशा आपकी सुरक्षा में आपके पिता की तरह हाथ पकड़कर आपके पीछे खड़ा है, या दोस्त की तरह आपके साथ खेलता हुआ। लेकिन मेरी नज़र में ये बातें आपको तुलनात्मक रूप से, ईश्वर से उतना प्रेम करने के लिए उद्यत नहीं कर सकतीं जितना आप अपने अभिभावकों से करते हैं। उससे अधिक तो कर ही नहीं सकतीं। नहीं, परिवार से अपने प्रेम के लगभग बराबर प्रेम भी आप ईश्वर से नहीं कर सकते! यह कैसे संभव है? वह आपके माता या पिता की तरह कोई प्राणी तो नहीं है जो कठिन वक़्त आने पर आपको अपनी बाहों की सुरक्षा में ले लेते हैं। आपके भाई-बहन आपके साथ खेलते हैं और खुश होते है- क्या कभी ईश्वर यह कर सकता है? जब आप बच्चे होते हैं आपकी माँ आपको दूध पिलाती है। उसकी गंध, उसके स्वर, उसके स्पर्श की अनुभूति आपके दिलोदिमाग में बसी हुई होती है। ईश्वर की गंध, उसके स्वर या उसका स्पर्श नहीं आपको छू भी नहीं सकते! यह असंभव है कि आप ईश्वर से कभी भी उतना उत्कट प्रेम कर सकते हैं जितना अपने परिवार से करते हैं!

तो आप देखते हैं कि मेरा दिमाग पूरी तरह बदल गया, समझिए कि वह बिल्कुल विपरीत दिशा में मुड़ गया और आज मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि मैंने ठीक किया। स्वाभाविक ही, पहले भी मैं यही कहता था, मगर अब मेरा भविष्य कहीं भी मुझे ले जाए, मैं पीछे मुड़कर अपने पुराने विश्वासों की दिशा में कभी नहीं जा सकता!

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