कर्म का सिद्धांत लोगों को अपनी जिम्मेदारियों से भागने की सुविधा प्रदान करता है – 05 फरवरी 2013

मैं पहले ही बता चुका हूँ कि कैसे हिन्दू धर्म का कर्म सिद्धांत विवादास्पद हो सकता है, विशेषकर जब यह स्पष्ट न हो कि इस जन्म के कर्म अगले जन्म में ले जाए जा सकते हैं या (स्वर्ग या नर्क में एक निश्चित काल के बाद वे समाप्त हो जाते हैं।) नहीं। इसका एक और पहलू है जो इस सिद्धांत पर सवालिया निशान खड़ा कर देता है: जब आपके साथ कोई बुरी बात होती है तो लोग कह देते हैं कि यह आपके बुरे कर्मों का फल है। अगर यह बुरी बात अपेक्षाकृत बहुत महत्वपूर्ण नहीं है, जैसे मान लीजिये आपका मोबाइल गुम गया हो या छोटी-मोटी चोरी हो गई हो, तो आप उसे आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन ज़्यादा गंभीर बातों के बारे में आप क्या कहेंगे? अगर किसी के साथ बलात्कार हो जाए तो? क्या आप सिर्फ यह कह सकते हैं कि 'यह उसके बुरे कर्मों का नतीजा है'?

यह प्रश्न दिसंबर में दिल्ली में हुए दर्दनाक सामूहिक बलात्कार के बाद उभरकर सामने आया। भारतीय समाज में ऐसे जघन्य अपराध कैसे हो जाते हैं इस बात पर बड़ा वाद-विवाद हुआ। स्वाभाविक ही उसके कारणों को स्पष्ट करने के धार्मिक प्रयासों को भी उचित स्थान प्राप्त हुआ और मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि उनमें से कुछ तो भयावह और निंदनीय थे लेकिन कुछ ऐसे भी थे जिनमे धर्म द्वारा अपने ही शब्दों को तोड़-मरोड़कर समयानुसार ढालने की भद्दी कोशिश भर थी, जिससे घटना का धर्म के नियमों के अनुसार विश्लेषण भी हो जाए और पीड़ित का और ज़्यादा अपमान होता हुआ भी प्रतीत न हो।

मुझे लगता है कि उनके बारे में मुझे कुछ भी कहने की आवशयकता नहीं है जो कहते थे कि इसमें पीड़ित का ही दोष था। मैंने उसके बारे में पहले ही काफी कुछ लिखा है जिससे इस विषय में मेरे विचार आप जान सकें। इन लोगों ने साफ-साफ ऐसा न कहा होगा लेकिन ऐसे वक़्त किसी पीड़ित के पिछले कर्मों का ज़िक्र करना ही न सिर्फ पीड़ित पर सारे हादसे का दोष मढ़ने जैसा है बल्कि बेहूदा और अपमानजनक भी है।

मगर कुछ धार्मिक लोग ऐसे भी थे जो पीड़ित पर घटना का दोष न मढ़ते हुए कर्म सिद्धांत के आधार पर घटना को समझाने की कोशिश कर रहे थे। इनमें से एक प्रयास में तर्क दिया गया कि यह 'समाज के या देश के सामूहिक कर्मों' का नतीजा है। कुछ लोग खुद को और दूसरों को इस बात के लिए सहमत करने की कोशिश कर रहे थे कि भारत की जनता और भारत के कर्मों के नतीजे में उस लड़की के साथ बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या कर दी गयी। हो सकता है कि उस लड़की के कर्म ठीक-ठाक हों मगर वे सारे समाज और देश के कर्मों के सामने कमजोर पड़ गए। मेरे विचार में यह अपने धार्मिक विश्वासों को उचित ठहराने का एक बहुत कमजोर तरीका है। आपका धर्म, हिन्दू धर्म, साफ-साफ कहता है कि जो भी आपके साथ घटित होता है उसका कारण आपके स्वयं के कर्मों में निहित है। लेकिन वक़्त की नज़ाकत को देखते हुए आप सोचते हैं कि ऐसे वक़्त में एक बलात्कार पीड़ित को ही बलात्कार का दोषी कहना निरा पागलपन न भी हो तो बेहद क्रूर और मूर्खतापूर्ण बात तो अवश्य ही होगी, इसलिए आप निराश होकर किसी न किसी तरह उस अकथनीय जुर्म को कर्म से जोड़ने की कोशिश करते हैं जो घटना का कोई स्पष्टीकरण दे सके।

समस्या यह है कि ऐसे लोग भी हैं जो इन स्पष्टीकरणों को मान लेते हैं, जैसे वे धार्मिक लोग, जो नहीं चाहते कि उनके धर्म पर इस बात का दोष मढ़ा जाए कि वह ऐसे जघन्य अपराधों को बढ़ावा देता है। लोग, जिनके लिए वास्तविकता से आँखें मिलाना असंभव बात है; लोग, जो अपनी ज़िम्मेदारी महसूस नहीं करते और परिवर्तन की कोई कोशिश करना नहीं चाहते।

अगर लोग ऐसे स्पष्टीकरणों को मान लेते हैं तो उनके पास ऐसे अपराधों के दूसरे किसी कारण की खोज आवश्यक नहीं रह जाती। ऐसे में समस्या पर जैसा ध्यान दिया जाना चाहिए, नहीं दिया जाता और उसके समाधान की कोई पहलकदमी भी नहीं की जाती या उसे जड़मूल से समाप्त करने का कोई प्रयास भी नहीं किया जाता।

कर्म का सिद्धांत गैरजिम्मेदार लोगों के लिए भयावह से भयावह हादसों को स्वीकार करने का आसान उपाय मुहैया कराता है। ऐसे हादसे न हों इसके लिए अपने आप के और समाज के सोच में किसी बदलाव की कोशिश करने की ज़रूरत भी यह सिद्धांत समाप्त कर देता है।

अगर आप कोई परिवर्तन चाहते हैं तो आप कर्म पर उसका दोष नहीं मढ़ सकते। समस्या के मूल में जाइए और वहाँ से उसे सुलझाने की कोशिश कीजिये।

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