मुक्ति या स्वर्ग? अपने कर्म के दर्शन से हिन्दू धर्म लोगों को भ्रमित करता है! – 1 फरवरी 2013

भाग्य/नियति

मैं कुम्भ मेले के बारे में पिछले दो हफ्ते में बहुत कुछ लिख चुका हूँ और मुझे लगता है मैंने इस त्योहार के बारे में पूरी तस्वीर पेश कर दी है और यह भी कि वह किस लिए मनाया जाता है और लोग वहाँ सारे कर्मकांडों सहित नहाकर क्या पाने की अपेक्षा करते हैं? लेकिन मुझे लगता है कि कुछ लोग कुछ उलझन में पड़ गए हैं: मैंने लिखा था कि हिन्दू गंगा में इसलिए नहाते हैं कि मृत्यु के बाद स्वर्ग जा सकें।

शायद मैं एक या दो बार यह कह चुका हूँ कि धर्म बिल्कुल तार्किक नहीं है। दरअसल वह बहुत भ्रम फैलाने वाला है और उसकी कई बातें अंतर्विरोधी होती हैं। हिन्दू धर्म में इतनी सारी धार्मिक किताबें हैं कि यह संभव ही नहीं है कि सारी किताबें शब्दशः एक ही बात कह सकें। हिन्दू धर्म में तो कई दर्शन भी सन्निहित हैं और सभी को सही माना जाता है। इस तरह हिन्दू धर्म के अनुयायियों को अपनी सुविधानुसार या अपने लाभ के लिए कुछ भी मनाने की सुविधा प्राप्त है।

हिन्दू धर्म में भी स्वर्ग की अवधारणा है। यह समझने के लिए कि कौन स्वर्ग को प्राप्त हुआ आपको थोड़ा सा कर्म के दर्शन को समझना होगा। आप अपने इस जनम में जीवन भर अच्छे और बुरे कर्म करते हैं। ये सारे कर्म इकट्ठा होते रहते हैं और जब आपका देहांत हो जाता है तब इन कर्मों की बैलेन्स शीट बनाई जाती है और अच्छे और बुरे कर्मों की तुलना की जाती है। आपके सारे बुरे कर्मों को आपके द्वारा किए गए अच्छे कर्मों में से घटाया जाता है और अगर योग धनात्मक होता है तो आप स्वर्ग जाते हैं और योग ऋणात्मक होता है तो आपको नरक की यात्रा करनी पड़ती है। आप तब तक ही स्वर्ग में रह सकते हैं जब तक आपके बचे हुए अच्छे कर्म पूरी तरह ‘खर्च’ नहीं हो जाते। यानी जितने ज़्यादा अपने अच्छे कर्म लेकर आप स्वर्ग जाते हैं उतनी ही ज़्यादा समय तक आप वहाँ रह सकते हैं। और जितने बुरे कर्मों का ‘कर्ज़’ आप पर होता है उतने समय ही आपको नर्क में रहना पड़ता है। जब आपके सारे कर्म, स्वर्ग या नर्क में खर्च हो जाते हैं या आप अपना कर्ज़ अदा कर देते हैं और इसके बाद भी आपकी इच्छा कुछ अच्छा या बुरा अनुभव करने की बनी ही रहती है तो आप फिर जीवन की यात्रा शुरू कर देते है, इस बार किसी और प्रजाति में, जिसे पुनर्जन्म कहा जाता है।

गंगा में स्नान करने के पीछे यह मूल विचार है। अगर इन दिनों में आप इलाहाबाद में गंगा में स्नान कर लेते हैं तो आपके सारे पाप धुल जाते हैं। यह अपने कर्ज़ से मुक्ति है, एक तरह की ऋण मुक्ति योजना के अंतर्गत कर्ज़ मुक्ति की याचना है जिसमें आपको सिर्फ इतना करना है कि गंगा के पवित्र मगर बेहद गंदे पानी में डुबकी लगाएँ और कर्ज़ मुक्त हो जाएँ। आपके कर्मों का बैंक बैलेंस इस स्नान के बाद निश्चय ही धनात्मक हो जाएगा और आप स्वर्ग जा सकेंगे और ज़्यादा से ज़्यादा समय गुज़ार सकेंगे।

तो आपने देखा कि इस पवित्र गंगा स्नान के पीछे मुक्ति कामना नहीं है। मुक्ति तो आपको तब मिलती है जब किसी तरह के, अच्छे या बुरे अनुभव और अहसास की आपकी सारी इच्छाएँ समाप्त हो जाती हैं। आप कह सकते हैं कि कुम्भ मेले में स्नान करने वाले सभी लोग स्वर्ग जाना चाहते हैं, उनकी मुक्ति की कोई इच्छा नहीं है, जन्म-मृत्यु के चक्र से वे छूटना नहीं चाहते, दो जन्मों के बीच कुछ वक्त स्वर्ग में गुज़ारना चाहते हैं।

लेकिन रुकिए, यह भी पूरी तरह सच नहीं है। कुछ लोग ऐसे हैं जो वाकई गंगा में नहाकर मुक्ति की कामना करते हैं। और हाँ, धर्म-ग्रंथों में भी यह लिखा है! यहाँ तक लिखा है कि गंगा को सिर्फ देखने से भी आप मुक्त हो सकते हैं। या, इससे भी एक कदम आगे जाकर यह भी लिखा है कि अगर आप गंगा से हजारों किलोमीटर दूर कहीं रहते हैं तो सिर्फ गंगा नदी का स्मरण कर लीजिये, आपको मुक्ति प्राप्त हो जाएगी!

आप कुम्भ नहाने के इस सारे विचार को अपनी मरज़ी के अनुसार घुमा-फिरा या तोड़-मरोड़ सकते हैं, जो चाहें पा सकते हैं, स्वर्ग पा सकते हैं या मुक्ति पा सकते हैं। हिन्दू धर्म इतना लचीला है कि आपको सब कुछ प्रदान कर सकता है। लेकिन एक और समस्या है, अगर आप मुक्ति की कामना से भी गंगा में डुबकी लगाते हैं तो भी आखिर आपकी एक कामना, यही मुक्ति की कामना तो बची रह ही जाती है। और यह लिखा हुआ है कि मुक्ति तभी संभव है जब आप, आपकी सभी कामनाओं से दूर हो चुके हों। अब क्या किया जाए?

मैं तो आपको यही सलाह दूँगा कि आप धर्मों को और उन्हें समझने की कोशिश को भी तिलांजलि दे दीजिये। आप उन्हें कभी समझ नहीं पाएंगे, बल्कि और अधिक दिग्भ्रमित होते जाएंगे। कर्म के बारे में और धर्मों की भ्रमित करने वाली शिक्षाओं और दार्शनिक बातों और उनके परिणामों के बारे में अभी और भी बहुत सी बातें हैं जो मैं अगले हफ्ते भर पोस्ट करता रहूँगा।

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