कर्म सिद्धान्त के अनुसार नेपाल के भूकंप पीड़ित सहायता के पात्र नहीं हैं – 29 अप्रैल 2015

कल मैंने आपको एक टिप्पणीकर्ता के बारे में बताया था, जिसका भरोसा है कि ईश्वर जो भी करता है, अच्छा करता है। अगर आपको लगता है कि कुछ बुरा हुआ है तो आपको समझना होगा कि यह उस व्यक्ति के कर्मों का फल है! भले ही वह नेपाल में आया भूकंप ही क्यों न हो! इस दृष्टिकोण से सोचने पर अंततः इस बात पर पहुँचकर भ्रमित रह जाएँगे: जब आप कोई काम करते हैं, तब आपको कैसे पता चले कि आप वह काम ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध नहीं कर रहे हैं?

अगर आप यह मानते हैं कि किसी व्यक्ति के साथ जो भी बुरा होता है, उसके पिछले कर्मों के नतीजे में होता है तो फिर जो भी होता है, वही होना भी चाहिए। बल्कि वह ईश्वर की इच्छा भी है क्योंकि वह जो भी करता है, सबके भले के लिए ही करता है। तब आप ऐसे पीड़ितों की मदद करते हैं तो वास्तव में ऐसा काम कर रहे होते हैं, जो ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध है!

ऐसी स्थिति में सवाल पैदा होता है कि फिर आप किसी पीड़ित की मदद करें ही क्यों? अपने कर्म की सज़ा भुगत रहे किसी व्यक्ति के लिए आप अपनी सहायता का हाथ क्यों बढ़ाएँ? अगर आप मदद नहीं करेंगे तो और उसका और भी बुरा हाल हो सकता है। सोचने वाली बात यह है कि कर्म-सिद्धान्त के अनुसार उस अतिरिक्त दंड का पात्र भी वह व्यक्ति होगा! क्या नहीं होगा? और अगर आप उसकी सहायता करते हैं तो आप उस संयोग में व्यवधान उपस्थित कर रहे होते हैं!

आप कैसे जानेंगे कि ईश्वर की इच्छा क्या है? हर एक को अच्छे और बुरे कर्म प्राप्त होते हैं और अगर आप किसी की मदद भी करते हैं तो सिद्धांततः आपको कुछ अच्छे कर्म प्राप्त होते हैं। लेकिन अगर आप ईश्वर की तयशुदा योजना के साथ छेड़खानी करते हैं और उस व्यक्ति को, उसके बुरे कर्मों का पूरा परिणाम भुगतने नहीं देते तो हो सकता है कि आप उतने भाग्यशाली न हों और अच्छे कर्मों की आपकी पोटली में कोई इज़ाफ़ा न हो! बल्कि आप ईश्वर के इरादों में रोड़े अटका रहे हैं और इस तरह तो निश्चय ही आपको बुरे कर्म ही प्राप्त हो रहे होंगे!

जी हाँ, मेरी नज़र में यह हास्यास्पद है। धार्मिक लोग अपने ही नियम और सिद्धांतों को तोड़ते-मरोड़ते रहते हैं और जिस बात के पक्ष में वे होते हैं, उसके समर्थन में उनका रुख मोड़ देते हैं। जादू के कमाल से अमीरों के लिए हवा में से सोना और गरीबों के लिए राख निकालने वाले सत्य साईं बाबा जैसे नकली गुरुओं पर मैंने एक बार लिखा था: कि जो सोना वे निकालते हैं, उससे उन्हें गरीबों के लिए भोजन की व्यवस्था करनी चाहिए। मुझे बताया गया कि गरीब अपने कर्मों के कारण गरीब हैं। और इसलिए उनके गुरु भी उनकी कोई सहायता नहीं कर सकते!

तो आप अपने सिद्धांत को अपनी मर्ज़ी से जिधर चाहें, मोड़ दें मगर मेरे लिए वह तर्क से परे ही होगा। और मेरी नज़र में तर्क तो यही कहता है कि आपका ईश्वर बड़ा ही क्रूर है। बेहद क्रूर! अच्छे कर्म से उसकी क्रूरता में कोई कमी नहीं आती। और हाँ, मुझे मेरे कर्मों के लिए आगाह करने की जगह आपको इस बात की चिंता करनी चाहिए कि किसी की मदद करके कहीं आप ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध तो कोई काम नहीं कर रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि दूसरों के लिए प्रार्थना करते-करते आप अपने लिए बुरे कर्मों का ज़खीरा न इकठ्ठा कर रहे हों-क्योंकि दूसरों की सहायता करना ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध है!

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