कर्म के तीन प्रकार-संचित,प्रारब्ध एवं क्रियमाण – 14 May 08

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मैं आप को अगले सू त्र के बारे में भी बताना चाहूँगा जिसकी मैंने कल के व्याख्यान में व्याख्या कि थी| तीसरे अध्याय के सूत्र की सहायता से मैं यह स्पष्ट करूँगा कि पूर्व का दर्शन कैसा है और पतंजलि का लेखन किस प्रकार का है| कितने अद्भुत रूप से इस व्यक्ति ने सब कुछ इन सूत्रों से स्पष्ट किया है| यदि आप इसका शब्दशः अनुवाद करेंगे तो यह आप को हास्यप्रद लगेगा और संभवतः आप भ्रमित हो जायेंगे| सूत्र है कि-
“यदि आप अपने कर्मों को जान लें तो आप अपनी मृत्यु का समय जान सकते हैं|”

तो आप को क्या लगता है? हाँ यह आश्चर्यजनक है और इसकी सैकड़ो व्याख्याएं हैं| आइये इसके पीछे छुपे दर्शन को समझते हैं| पूर्व का समस्त दर्शन कर्म पर आधारित है किन्तु पश्चिम में यह अपने सही रूप में नहीं आया| यहाँ बहुत से भ्रम हैं क्यों कि दर्शन के मूल सिद्धांत के स्थान पर किसी व्याख्या को अपना लिया गया|

वास्तव में ऐसा कहा जाता है कि कर्म तीन प्रकार के होते हैं-संचित,प्रारब्ध और क्रियमाण| संचित का अर्थ है-संपूर्ण,कुलयोग| अर्थात मात्र इस जीवन के ही नहीं अपितु पूर्वजन्मों के सभी कर्म जो आपने उन जन्मों में किये हैं| आपने इन कर्मों को एकत्र करके अपने खाते में डाल लिया है|

‘प्रारब्ध’,‘संचित’ का एक भाग है,इस जीवन के कर्म| आप सभी संचित कर्म इस जन्म में नहीं भोग सकते क्यूंकि यह बहुत से पूर्वजन्मों का बहुत बड़ा संग्रह है| इसलिए इस जीवन में आप जो कर्म करते हैं, प्रारब्ध, वो आप के संचित कर्म में से घटा दिया जायेगा| इस प्रकार इस जीवन में आप केवल प्रारब्ध भोगेंगे,जो आप के कुल कर्मों का एक भाग है|
तीसरा कर्म क्रियमाण है,वो कर्म जो आप इस जीवन में प्रतिदिन करते हैं| और क्रियामान कर्म से ही संचित कर्मों का निर्माण होता है| तो यह जोड़ घटाना कैसे चलता है?
हमने पहले ही कर्म के प्रति आसक्ति और अनासक्ति के बारे में बता चुके हैं|
और जो भी कर्म हम पूर्ण चैतन्यता से नहीं करते वो क्रिया नहीं प्रतिक्रिया है|
जिसके प्रति आप चैतन्य नहीं हैं वो क्रिया नहीं हो सकती| और जब हम बिना चैतन्यता के कर्म करते हैं,जैसा प्रायः दैनिक जीवन में होता है तो हमारे संचित कर्म बढ़ जाते हैं| यदि कोई आप का अपमान करे और आप क्रोधित हो जाएँ तो आपके संचित कर्म बढ़ जाते हैं| परन्तु,यदि कोई अपमान करे और आप क्रोध ना करें तो आप के संचित कर्म कम होते हैं|
इसे मैं एक योगी के उदाहरण से और अधिक स्पष्ट करता हूँ| वो एक वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न थे कि तभी एक व्यक्ति वह आया और उनका बहुत अपमान किया| वो शांत रहे| कोई प्रतिक्रिया नहीं हुयी,ना वाह्य रूप से ना अंतर्मन में,उन्हें क्रोध भी नहीं आया| बाद में उनके शिष्यों ने,जो सब कुछ देख सुन रहे थे,पूछा कि आप को क्रोध नहीं आया? तो उन्होंने उत्तर दिया कि संभवतः पूर्वजन्म में मैंने उसका अपमान किया था, वास्तव में मैं प्रतीक्षा में था कि वो आकर मेरा अपमान करे| अब मेरा हिसाब बराबर हो गया| अगर मैं क्रोध करता तो फिर कर्म संचित हो जाते|

यही कर्म का सम्पूर्ण दर्शन है| यदि आप चैतन्य रहें, प्रतिक्रिया ना करें तो अपने संचित को नष्ट कर सकते हैं| और इसके लिए आप के अंतर्मन में शांति होनी चाहिए| क्रोध का शमन नहीं करना है अपितु क्रोध उत्पन्न ही नहीं होना चाहिए| और इस प्रकार चैतन्य रहते हुए जब आप अपने संचित को नष्ट करते रहेंगे तो एक दिन वो शून्य हो जायेगा| जब वो समाप्त हो जायेगा तब आप को इस जीवन मरण के चक्र में फिर पड़ने कि आवश्यकता नहीं होगी| हम जन्म क्यों लेते हैं? हम बार बार शरीर धारण क्यों करते हैं? अपने संचित कर्मों को भोगने के लिए| जब तक हमारा हिसाब पूरा नहीं होता तब तक हमें जन्म लेकर अपने कर्मों को भोगना पड़ता है| और जब इस सब का अंत होता है तब सारी इच्छायें और तृष्णायें मिट जाती हैं और पुनः जन्म लेने कि आवश्यकता नहीं रह जाती| यही वास्तविक अंत है, अन्यथा हम यूँ ही जन्म मरण के चक्र में फंसे रहेंगे|

इसलिए,पतंजलि को समझने का प्रयास करें| वह सामान्य मृत्यु के बारे में बात नहीं कर रहे हैं| यह चक्र चलता जायेगा और आप क्रियमाण के द्वारा संचित कर्म का निर्माण करते रहेंगे| परन्तु जब आप अपने संचित को भोग लेंगे और आपका हिसाब पूरा हो जायेगा, तब वह वास्तविक मृत्यु होगी, वास्तविक अंत| और इस तरह यदि आप को अपने कर्मों का ज्ञान है तो आप अपनी मृत्यु का समय बता सकते हैं|

आज हम मुंस्टर शहर में थे,खिली धूप और सुहाने मौसम का आनंद हमने बाज़ार में खरीदारी और उद्यान में टहल कर उठाया| यह एक सुंदर शहर है और काफी हरियाली है| कल की दैनन्दिनी मैं वुपरटाल में लिखूंगा,जहाँ हम कल सुबह जा रहे हैं|

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