हम लोग नोएमी के योग केंद्र में हैं और जैसा कि मैंने बताया यहाँ एक रसोईघर है जहाँ इस समय आयुर्वेदिक भोजन पकाया जा रहा है,जिसने सारे कक्ष को एक अद्भुत सुगंध से भर दिया है| नोएमी इस समय योग प्रशिक्षण दे रही है और जितने भी छात्र आये हैं उनका कहना है कि इस सुंदर सुगंध के कारण उन्हें फिर से भूख लगने लगी है| रात्रि के भोजन से पहले मैं अपने कोलोन के व्याख्यान के बारे में और लिखूंगा| कल और परसों मैं पहले ही लिख चूका हूँ कि कर्मयोग क्या है,जब आप अपने कर्म के फल की आशा नहीं रखते|
अगर आप कर्म के परिणाम की आशा रखते हैं तो आप को फल मिलेगा| अगर आप कर्मयोग का पालन करते हैं तो आप अपने कर्म और उसके फल को भगवान को अर्पित कर देते है| अगर नहीं, तो आप को फल मिलेगा, चाहे वो जैसा भी हो| और फिर इस से अंतर नहीं पड़ता कि फल अच्छा है या बुरा, वो आपको बंधन में डाल देता है| आप फल चाहते थे तो आप को फल मिला, चाहे वो अच्छे कर्म का था या बुरे कर्म का|
ये फल आप को जंजीरों में जकड देता है| बुरे कर्मो का फल लोहे की जंजीरों जैसा है और अच्छे कर्म का सोने की जंजीरों जैसा| लोहे की जंजीरों से मुक्ति पाना फिर भी सहज है| सोने को नष्ट करना अपेक्षाकृत कठिन है और साथ ही जब आप सोने कि जंजीरों को देखेंगे तो उनसे मोह हो जायेगा और आप उनसे मुक्त होना ही नहीं चाहेंगे| वो जंजीर इतनी सुंदर लगने लगेगी कि आप सोचेंगे कि आप ने कौन से अच्छे कर्म किये कि वो आप के भाग्य में आयीं| इस तरह अच्छा और बुरा, दोनों ही फल आप को बंधनों में बांध देता है| कर्म ही आप के सांसारिक बंधन का कारण है, ये आप को मुक्त नहीं होने देता| इसलिए ये आवश्यक है कि आप जो भी करते हैं उसे अर्पित करते चलें| इस प्रकार आप बुरे फल से मिलने वाली निराशा से बचे रहेंगे और कर्ता होने के अहंकार से भी, जो अच्छे फल के साथ बढ़ता जाता है|
मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि आश्रम का भोजन आज फिर किसी के द्वारा प्रायोजित किया गया है| और मैं आप सब का धन्यवाद करना चाहता हूँ जो बिना अपेक्षा के बाल शिक्षा के इस अभियान में सहयोग दे रहे हैं| आप इन बच्चों को कपडे, भोजन और सब से बढ़कर एक अच्छे भविष्य कि आशा दे रहे हैं, यह सराहनीय है और अद्भुत भी|
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