नए ज़माने के भारतीय युवाओं: क्या आप अपने परिवार के तथाकथित पिछड़ेपन पर शर्मिंदा हैं? 23 दिसंबर 2014

कुछ अर्सा पहले एक भारतीय युवक ने मुझसे संपर्क किया कि उसके कुछ प्रश्नों का मैं कोई हल सुझाऊँ। कुल मिलाकर वह जानना चाहता था कि अपने परिवार वालों की परंपरागत जीवन-पद्धति और उनके रूढ़िवादी विचारों के साथ एक आधुनिक, खुले विचारों वाले युवा के रूप में वह किस तरह तालमेल बिठाए। मैं जानता हूँ कि यह सिर्फ इस युवक की ही समस्या नहीं है इसलिए आज के ब्लॉग में मैं इन्हीं प्रश्नों की चर्चा कर रहा हूँ।

उस व्यक्ति ने जो बताया वह मैं पहले बहुत से लोगों से भी सुन चुका था। वे लोग अक्सर बड़े विश्वविद्यालयों में पढ़ने जाते हैं, जो अधिकतर बड़े शहरों में स्थित होते हैं, जहाँ उन्हें ‘आधुनिक संसार’ की बहुत सी चीजें देखने को मिलती हैं, वे बहुत पढ़ते-लिखते हैं और वैश्विक मीडिया से भी उनका अच्छा ख़ासा परिचय हो जाता है। यहाँ तककि उनका विदेशियों से भी सम्पर्क हो सकता है, जिसके कारण वे भारत के बाहर के लोगों के विचारों से परिचित हो जाते हैं। जब वे अपने छोटे से गाँव या कस्बे में लौटते हैं तब पहले से बिल्कुल बदल चुके होते हैं। कुछ लोगों के साथ यही बात तब भी होती है जब वे अपने घर पर ही होते हैं! इंटरनेट ने सारी दुनिया को इस तरह खोलकर रख दिया है कि उसके बारे में जानकारी हासिल करने के लिए आपको बाहर तक निकलना नहीं पड़ता!

इस तरह ये युवा ऐसे विचार विकसित कर लेते हैं जिस दिशा में उनके परिवार वालों ने कदम भी नहीं रखा होता। युवा लड़के और लड़कियों के मित्र भी वैसे ही होते हैं, आधुनिक और धर्म के पुराने रीति-रिवाजों, कर्मकांडों और उनकी सीमाओं से मुक्त। जब वे घर पर होते हैं तो अपने परिवार वालों को उन्हीं सब रीति-रिवाजों और कर्मकांडों का अनुपालन करते देखते हैं और उन्हें लगता है कि उनके करीबी रिश्तेदार, जिन्हें वे इतना चाहते हैं, बहुत अंधविश्वासी हैं। कि वे जाति-प्रथा को, जिसे वे बेहद बुरा समझते हैं, उचित मानते हैं। वे महिलाओं के साथ व्यवहार से सम्बंधित सभी बुरी भारतीय परंपराओं का पालन करते हैं!

वे अपने घर में इनके विरुद्ध तर्क-वितर्क करते हैं, बहस करते हैं मगर कोई नतीजा नहीं निकलता। वे वहाँ अल्पमत में होते हैं-और आखिर वे अपने परिवार के सदस्यों से प्रेम भी करते हैं लिहाजा वे उन्हें अपमानित भी नहीं करना चाहते! लेकिन वे ऐसे माहौल में असुविधा महसूस करते हैं, शर्म महसूस करते हैं। परिवार के विषय में वे अपने मित्रों से बात करना भी पसंद नहीं करते। नए ज़माने के अपने दोस्तों को घर बुलाते हुए उन्हें असुविधा होती है, वे उन्हें अपने परिवार से मिलवाना नहीं चाहते। दोस्त उनके परिवार के बारे में क्या सोचेंगे, करीबी रिश्तेदारों का उन पर क्या असर होगा, ये प्रश्न उन्हें हॉन्ट करते हैं।

सबसे पहले तो मैं कहूँगा कि आप अपने परिवार के लिए शर्मिंदा होना छोड़ें। आप उनके विचारों, उनके कामों और उनकी आस्थाओं के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं। सिर्फ उन्हें इतना बता दीजिए कि आप क्या सोचते हैं, क्यों आप उन बातों पर विश्वास नहीं करते, जिन पर वे करते हैं और उन परम्पराओं का अनुपालन भी नहीं करना चाहते, जिन पर चलना उन्हें आवश्यक लगता है। बातचीत अवश्य कीजिए, जिससे भले ही परिवार वाले उन्हें न समझ पाएँ, कम से कम वे उन्हें जान तो लें। हो सकता है, आपको बार-बार अपनी बात समझाना पड़े लेकिन आखिर वह आपका परिवार है। वे आपसे प्रेम करते हैं और आपको उनके साथ तालमेल बिठाने के लिए कोई न कोई समान आधार ढूँढ़ना ही चाहिए। एक-दूसरे के प्रति सहिष्णु बने रहिए-न तो वे आपको विभिन्न समारोहों और कर्मकांडों में, जिन्हें आप पसंद नहीं करते या जिन पर चलना आपके लिए असंभव है, शामिल होने का दबाव डालें और न ही आप यह अपेक्षा करें कि वे आपके कहे अनुसार चलने लगेंगे। एक बार यह स्पष्ट कर देने के बाद कि क्यों आप उन बातों को अनुचित मानते हैं, आप उन्हें उनकी अपनी मर्ज़ी के अनुसार चलने के लिए स्वतंत्र छोड़ दीजिए। अगर वे पूजा-पाठ करते हैं या उपवास करते हैं तो आपको इसमें क्या परेशानी हो सकती है?

जहाँ तक आपके मित्रों का सवाल है, मैं वही सलाह दुंगा: बातचीत करते रहिए। अपने परिवार के बारे में उन्हें खुलकर बताइए और इस मामले में आप क्या सोचते हैं, यह भी। मुझे पक्का विश्वास है आप ऐसे अकेले व्यक्ति नहीं होंगे! बस, बात कीजिए और उन्हें अपने और अपने परिवार के बारे में अच्छी तरह जानने दीजिए। अगर वे आपके सच्चे मित्र हैं तो आपके परिवार की आस्थाओं और उनके विचारों के आधार पर आपके प्रति उनके व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। इसके विपरीत वे आपको बेहतर समझ पाएँगे, समझ सकेंगे कि आप किस पृष्ठभूमि से आते हैं।

लेकिन कुछ आस्थाओं के साथ बहुत गंभीर समस्याएँ भी हैं, जिन्हें न तो अनदेखा किया जा सकता है और न ही बर्दाश्त। कभी-कभी ये आस्थाएँ या परंपराएँ सीमा के बाहर हो जाती हैं, जहाँ हम कह सकते हैं कि वास्तव में वे आपके मित्रो को दुःख (नुकसान) पहुँचा रही हैं या उन्हें अपमानित कर रही हैं। यह एक अलग विषय है, जिस पर कल मैं विस्तार से लिखूँगा।

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