गन्दगी (कचरा) साफ़ करने के लिए पहले उसे देखना होगा – भारत की कुछ कमियां – 13 मार्च 2014

भारतीय संस्कृति

भारतीय अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों की पिटाई किए जाने के संदर्भ में कई दिनों से इतना कुछ लिखने के बाद स्वाभाविक ही था कि मुझे उन पर बहुत सारी टिप्पणियाँ प्राप्त होतीं और यह भी कि सभी मेरे विचारों के समर्थन में नहीं होतीं। कई भारतीय मित्रों द्वारा मुझ पर यह आरोप लगाया जाता है: आप हमेशा भारत के विषय में बुरा ही बुरा लिखते हैं! इस महान देश और उसकी अद्भुत संस्कृति के विरुद्ध ऐसी नकारात्मकता फैलाना बंद करें!

चलिए, इसी प्रतिक्रिया पर एक बार फिर यह ब्लॉग समर्पित कर देता हूँ।

सर्वप्रथम तो यह कि यह आक्षेप सही नहीं है। मैंने भारत, उसकी संस्कृति और इतिहास, वहाँ के लोगों, भारत की नैसर्गिक सुंदरता की तारीफ में भी बहुत सी बातें लिखी हैं। लेकिन यह मेरा देश है और यहाँ रहते हुए अपने आसपास की सभी बातों पर मेरी नज़र रहती है! सभी चीजों को रंगीन चश्में से देखने का कोई लाभ नहीं है। यह अपने आपको धोखा देने जैसा होगा, सचाई से आँखें चुराना होगा। इस असंभव बात को सही मानना पाखंड होगा कि: इस देश में जो कुछ भी है, जो कुछ भी हो रहा है वह सब बढ़िया है।

बहुत से लोग, जिनमें उपरोक्त प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले लोग भी शामिल हैं, यही करते हैं: वे बहुत बढ़ा-चढ़ाकर भारत और उसकी महान संस्कृति की बड़ाई करते हैं और भारतियों की मेहमाननवाज़ी, आध्यात्मिकता और निश्चय ही, धार्मिकता के पर्दे के पीछे यहाँ की सारी गंदगी को छिपाने की कोशिश करते हैं।

जब मैं उन बातों पर लिखता हूँ, जो ठीक नहीं हैं तब मैं अपनी भीतरी जानकारी के आधार पर अपनी बात कहता हूँ कि वास्तव में क्या हो रहा है। विदेशी लोग भारत की वास्तविक हालत जानना चाहते हैं। इसका अर्थ यह कि वे उन भयानक समाचारों, जिन्हें वे अपने समाचार चैनलों पर अक्सर देखते-सुनते हैं और उनके विपरीत "सब कुछ अच्छा है" की भारतीय गर्वोक्तियों के मध्य कहीं स्थित वास्तविकता से रूबरू होना चाहते हैं!

वास्तविकता को इस तरह से छिपाने पर मेरे लिखने का और मेरे पाठकों द्वारा उसे पढ़ने का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। दरअसल यह बहुत गलत बात होगी अगर मैं ईमानदारी के साथ सच्चाई का बयान न करूँ। अगर मैं कोई ऐसी बात देखूँ, जिसे मैं मानता हूँ कि वह गलत है और मुझे उद्वेलित कर रही है तो मैं उसके बारे में लिखकर साझा करता हूँ। मूलतः वह मेरा व्यक्तिगत आलेख होता है, मेरे अपने लिए होता है लेकिन अगर दूसरे उसे पढ़ते हैं, उस विषय में सोचते हैं और संभवतः अपने जीवन में उससे कोई परिवर्तन ला पाते हैं तो वह उस आलेख का सकारात्मक प्रभाव होता है, अतिरिक्त लाभ होता है। चीजों में वास्तविक परिवर्तन लाया जा सकता है अगर इस तरह सोचने वाले ज़्यादा से ज़्यादा लोग हों और वे एकजुट हो जाएँ।

और मैं उन आलोचकों से, जो मेरे ब्लॉग्ज बहुत समय से नहीं देख रहे हैं, कहना चाहूँगा कि जब मैं विदेश-यात्रा पर होता हूँ तो वहाँ होने वाले अपने अनुभवों को नोट करता रहता हूँ। सकारात्मक हों या नकारात्मक, आप मेरे उन अनुभवों की और मेरे मन पर पड़ने वाले उनके असर की झलक इन ब्लोग्ज़ में देख सकते हैं।

अंत में यह कि अगर आप मेरे ब्लॉग पढ़कर उद्वेलित होने से बचना चाहते हैं तो आप एक और काम कर सकते हैं: उन्हें पढ़ना बंद कर दीजिए। अगर आप उन्हें पढ़ते रहेंगे तो आप तभी उन्हें सकारात्मक रूप से समझ पाएंगे जब मैं आपके मन के तारों को छेड़ पाऊँगा, अगर आपके और दूसरों के भीतर उसकी कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया होगी-क्योंकि संभवतः वही परिवर्तन की पहली सीढ़ी होगी।

अगर आप कमरे में फैले कचरे को फर्श पर बिछे कालीन के नीचे छिपाएंगे तो आप कमरे को कभी साफ नहीं कर सकते। आपको उस कचरे की तरफ बारीकी से देखना होगा, उसे खोज-खोजकर निकालना होगा और फिर उसे उठाकर बाहर फेंकना होगा!

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