जब भी बाहर से लोग भारत आकर कुछ दिन यहाँ रहना चाहते हैं तो वे कुछ हिन्दी शब्द सीखने की कोशिश करते हैं। और स्वाभाविक ही, जिन्हें वे सबसे महत्वपूर्ण समझते हैं और अपनी भाषा में अधिकाधिक उपयोग करते हैं उनके अर्थ जानना ज़रूरी समझते हैं। इसलिए वे अक्सर पूछते हैं: 'Thank you' के लिए हिन्दी में कौन सा शब्द है? और हम पहले तो उन्हें 'Thank you' का समानार्थी शब्द बता देते हैं मगर तुरंत ही यह भी बताते हैं कि यह शब्द सीखने की उन्हें कोई ज़रूरत नहीं है। क्यों?
सिर्फ इसलिए नहीं कि आजकल वैसे भी सब लोग 'Thank you' का अर्थ जानते हैं बल्कि इसलिए भी कि भारत में यह शब्द क्वचित ही सुनाई देता है। आप दुकान में जाइए, पैसा दीजिए, अपना सामान उठाइए और चल दीजिए-भारत में दुकानदार की सेवाओं के लिए कोई 'Thank you' नहीं कहता। आप किसी टेबल पर बैठे हैं और ख़ास भारतीय तरीके से खाना परोसा जा रहा है; जब आपकी प्लेट में खाना रखा जाता है तो परोसने वाले को कोई भी 'Thank you' कहने की आवश्यकता नहीं समझता।
मैं उनसे कहता हूँ कि भारतीय अपनी कृतज्ञता अपने दिल में रखे रहते हैं, बार-बार उसे व्यक्त करने की ज़रूरत नहीं समझते। यह हर कोई समझता है कि आप कृतज्ञ हैं और इसकी अपेक्षा भी सबको होती है लेकिन उसे कहने की ज़रूरत नहीं है। अपनी कृतज्ञता वे दूसरे तरीके से व्यक्त करते हैं, जैसे यह बताकर कि आपका दिया उपहार उन्हें कितना अच्छा लगा। कई बार वे यह भी सोचते हैं कि जब उन्होंने उन्हें प्राप्त चीजों और सेवाओं की कीमत अदा कर दी है तो फिर 'Thank you' किस बात का?
मैं यह भी बताता हूँ कि भारतीय इस मामले में बहुत औपचारिक नहीं हैं। बहुत से दूसरे क्षेत्रों में वे औपचारिक हैं मगर 'Thank you' कहने के मामले में नहीं। उनकी भाषा में ही, जैसे छींक आने पर 'Bless you!' – 'Thank you!' कहने की परंपरा नहीं है इसलिए वैसी तयशुदा शब्दावलियाँ भी नहीं हैं। ऐसे शब्द, जो पश्चिमी देशों में आदतों में शुमार हो गए हैं, यहाँ उन पर कोई विचार तक नहीं करता इसीलिए अधिकतर मामलों में उन्हें इसका कोई एहसास भी नहीं होता। ऐसे किसी रिवाज का ज़िक्र होने पर उसे महज औपचारिकता कहकर उपेक्षा की जाती है।
इसके विपरीत पश्चिमी लोग आश्रम आते हैं और जब वे वापस होते हैं तो यहाँ बिताए अपने सुखद समय और हमारे काम के लिए हमेशा शुक्रिया अदा करके जाते हैं। और वे सिर्फ कहते नहीं हैं बल्कि वास्तव में महसूस करते हैं। यह सिर्फ उनकी आदत ही नहीं होती, वे वास्तव में कृतज्ञ होते हैं क्योंकि हम अपने काम में अपने दिल का पूरा प्रेम उंडेल देते हैं। लोग आश्रम आते रहें और हम चाहें तो अपने आश्रम को एक निर्जीव, रुक्ष तरीके से या कम सहृदयता के साथ चला सकते हैं। अपने परिवार के साथ उनके संपर्क को सीमित कर सकते हैं या बहुत से कामों के लिए, जिन्हें अभी अक्सर हम खुद करते हैं, कर्मचारी लगा सकते हैं। इसके विपरीत हम अपना काम पूरी दिली तल्लीनता और उत्साह से करते हैं और हमारे यहाँ आने वालों को मित्र और मेहमान मानते हैं न कि महज पर्यटक।
अपने बिन्दु पर वापस आते हुए यह कि 'Thank you' कहना मात्र इस बात का प्रमाण नहीं है कि आप वास्तव में कृतज्ञ हैं। यह भी संभव है कि आप कहें मगर अपने दिल में महसूस न करें। इसके विपरीत आप न कहें और फिर भी भीतर से कृतज्ञ हों!
निष्कर्ष यह कि भारत में 'Thank you' कहना लोगों की आदत में शुमार नहीं है। विशेष रूप से, छोटी-छोटी बातों के लिए तो कतई नहीं, जैसे आपने पानी पिला दिया तो आपको 'Thank you' कहें ही यह आवश्यक नहीं।
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