पश्चिमी लोग भारतीयों को लज्जालु क्यों समझते हैं? – 27 जनवरी 2011

भारतीय संस्कृति

मैंने बताया था कि भारतीयों के मुकाबले पश्चिम में लोग करीबी रिश्ता बनाने में बहुत सकुचाते हैं। कुछ लोग जो भारत आकर यहाँ के जीवन का अनुभव प्राप्त कर चुके हैं प्रतिवाद करते हुए कह सकते हैं कि पश्चिम में पुरुष और स्त्रियाँ आपसी व्यवहार में अधिक आज़ाद-खयाल हैं और भिन्न लिंग के व्यक्ति अधिक सहजता से करीब सकते हैं, एक दूसरे को गले लगा सकते हैं। इस बात में सच्चाई है, इसमें कोई शक नहीं।

मैंने पहले बताया था कि पहली बार आने वाले टूरिस्टों की शुरू में कभी-कभी यह धारणा बन जाती है कि भारत में समलैंगिकों की तादाद कुछ ज़्यादा ही है। वे लड़कों को आपस में हाथों में हाथ डाले, गले लिपटते और आपस में चिपटकर घूमते देखते हैं तो सोचते हैं कि ये समलिंगी हैं क्योंकि पश्चिम में अमूमन लड़के ऐसा नहीं करते। बल्कि वहाँ लड़कियां हाथ में हाथ डाले घूमते मिलती हैं, या फिर स्वाभाविक रूप से जोड़े इस तरह से टहलते हुए दिखाई देते हैं।

भारत में किसी जोड़े को सड़क पर आप इस तरह चिपककर घूमते-फिरते नहीं देख सकते, दोस्तों और परिवार वालों के सामने घर पर भी नहीं। उनका शारीरिक संपर्क होता है जब वे अकेले होते हैं। आप अपने ही लिंग के व्यक्तियों के साथ हाथ में हाथ डाले घूम सकते हैं, अपने विपरीत लिंगी साथी के साथ नहीं। पश्चिमी लोग इसे बहुत ठंडा और शर्म का दिखावा मानते हैं।

कई और बातें भी हैं जो इस धारणा को मजबूती प्रदान करती हैं। यहाँ, केरल में टिकिट खरीदने की दो लाइनें लगती हैं। हमने जहां भी टिकिट खरीदे, कोचीन में, कन्याकुमारी नाव में घूमने के लिए, चाहे स्मारक में जाने के लिए प्रवेश पत्र खरीदना हो, हर जगह हमने दो कतारें दिखीं, एक पुरुषों के लिए और एक महिलाओं के लिए। मज़ेदार बात यह कि टिकिट बेचने वाला वही होता है, एक बार महिला को फिर पुरुष को टिकिट देता हुआ। सबसे हास्यास्पद बात तो यह थी कि जब हम कन्याकुमारी जाने के लिए बोट में प्रवेश करते वक़्त लाइफ जैकेट लेने पहुंचे तो वहाँ भी अलग अलग कतारें बनी हुई थीं। इससे अच्छा-खासा कोलाहल और अव्यवस्था फैली जब पति अपनी पत्नियों के पास बैठने के लिए इधर-उधर भाग-दौड़ करते देखे गए।

यह व्यवस्था, मेरी समझ के मुताबिक, इसलिए की गई है कि महिलाओं को पुरुषों की छेड़खानी और धक्कामुक्की से बचाया जा सके। भीड़-भाड़ में, जहां लोग एक दूसरे को धकेलते और धक्का-मुक्की करते हुए निकलना चाहते हैं औरतें स्वाभाविक ही असुविधा महसूस करती हैं और कई बार पुरुषों के अश्लील स्पर्श, जो पुरुषों के लिए मात्र मनोरंजन होता है, उन्हें सहन करने पड़ते हैं।

इसलिए कुछ पश्चिमी लोगों के लिए औरतों और मर्दों को विभाजित करने वाला यह भारतीय व्यवहार ठंडा और अनावश्यक हो सकता है मगर दूसरे नज़रिये से देखें तो वह उन्हें उतना अप्रिय भी नहीं लगेगा। फिर भी मैं समझता हूँ कि शिक्षा के प्रसार के साथ इसमें भी परिवर्तन आएगा और वह ऐसा नहीं रहेगा। दूसरी तरफ यह भी गौर करने वाली बात है कि केरल के लोग भारत के सबसे ज़्यादा पढे लिखे लोग हैं। पुरुषों और महिलाओं की निकटता के प्रश्न का मूल दरअसल हमारे सांस्कृतिक मूल्यों में स्थित है। समय के साथ और शिक्षा में तरक्की के बाद इसमें परिवर्तन होगा लेकिन तब तक पश्चिमी लोग भारतीयों को इसी तरह लज्जालुता के आडंबर में लिप्त समझते रहेंगे।

Leave a Comment