मैं अपनी बेटी को एक सामान्य भारतीय लड़की की तरह क्यों नहीं पालना चाहता?-24 अप्रैल 2013

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

जब मैंने 'अपेक्षा' विषय पर रमोना का बयान फेसबुक पर पोस्ट किया और कल पढ़ने को भी दिया, मैंने एक पंक्ति अपनी तरफ से भी जोड़ दी थी जो इस प्रकार थी:'मैं यह तो चाहता था कि मेरी बेटी अपरा यहाँ पैदा हो मगर मैं कभी भी नहीं चाहूँगा कि वह वैसी भारतीय महिला बने जिससे लोग इतनी ज़्यादा अपेक्षाएँ रखते हैं.' और मैं उसे इस तरह कभी नहीं पालूँगा। एक 'स्मायली' लगाकर जब मैंने उसे पोस्ट किया तो बहुत से लोगों ने मेरी मंशा पर शक ज़ाहिर करते हुए मुझसे पूछा कि क्या मैं एक भारतीय भी हूँ? मैं क्यों अपनी बेटी को एक भारतीय नहीं बनाना चाहता और अगर मेरा दिमाग ठीक है तो ऐसी बात करना कहाँ तक उचित है?

लोगों ने मुझे बताया, जैसा कि रमोना को भी बताया था, कि भारत के कई बड़े शहरों में ऐसी औरतें हैं जो ऐसी अपेक्षाओं के बोझ तले नहीं जीतीं। मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि भारत की अधिकांश जनता मुंबई, दिल्ली और बैंगलोर जैसे मेट्रोज़ में नहीं रहती। अधिकतर लोग छोटे-छोटे गावों में रहते हैं जहां की संस्कृति इन शहरों की उच्च और उच्च-मध्य वर्ग की संस्कृति से बिल्कुल भिन्न है! आप किसी अंतर्राष्ट्रीय कंपनी में किसी उच्च पदस्थ प्रबंधक की बुद्धिमत्ता और उसकी विचार-प्रक्रिया से एक गाँव की महिला की बुद्धि और उसकी विचार-प्रक्रिया की तुलना नहीं कर सकते। एक सामान्य, पारंपरिक भारतीय परिवार में आप देख सकते हैं कि किस तरह सारा समाज एक महिला से उसके व्यवहार को लेकर बहुत अधिक अपेक्षा रखता है।

क्या आप जानते नहीं कि एक ही परिवार में लड़के और लड़की को पालने में कैसा भेदभाव किया जाता है? एक बार मैंने इसी विषय पर एक डायरी लिखी थी। एक लड़की पर कितनी पाबंदियाँ होती हैं? 'बॉयफ्रेंड' बनाने और अपना जीवन साथी खुद अपनी स्वतंत्र इच्छानुसार चुनने की बात छोड़िए, उन्हें यह आज़ादी भी नहीं होती कि वे क्या पहनें, वे कहाँ जा सकती हैं या नहीं जा सकती! उनके लिए स्पष्ट आदेश होते हैं कि वे क्या कर सकती हैं और क्या नहीं और यह बिल्कुल बचपन से ही शुरू हो जाता है, और जैसे-जैसे वे बड़ी होकर किशोरावस्था प्राप्त करती हैं पाबंदियाँ बढ़ती जाती हैं और विवाह से कुछ पहले अपने चरम पर पहुँच जाती हैं। तब वे विवाह के लिए और नए घर में कदम रखने के लिए तैयार होती हैं जहां उन्हें उस नए घर और परिवार की अपेक्षाओं के बारे में पता चलता है, थोड़ी अलग सी मगर उतनी ही कठोर, कष्टकर और पाबंदियों वाली अपेक्षाएँ।

किसी ने यह कहते हुए कि 'ईश्वर ने स्त्री को अलग बनाया है' इन भेदभावों को जायज़ ठहराने की कोशिश की, बिना यह सोचे कि फिर तो पुरुष भी ईश्वर द्वारा अलग ही बनाए गए हैं! भारतीय अभिभावकों के यहाँ यह बहुत सामान्य सा विचार है और बहुत से पश्चिमी मित्र समझ नहीं पाते कि वे अपनी लड़कियों के लिए जानबूझकर कुछ बुरा नहीं सोचते! वे उनसे ईमानदारी के साथ पूरे दिल से प्रेम करते हैं लेकिन वे विश्वास करते हैं कि यह उनका फर्ज़ है कि लड़कियों को इसी तरह पाला जाए। वे पूरी शिद्दत के साथ यह मानते हैं कि लड़कियां और महिलाएं अलग हैं और वे उसी के अनुसार उन्हें अपना जीवन जीने के लिए तैयार करने की कोशिश करते हैं। वे यह नहीं सोच पाते कि हमेशा दूसरों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की शिक्षा देकर वे उन्हें ज़िम्मेदारियाँ उठाने में अक्षम बना रहे होते हैं।

और इस बहस में यहाँ आकर मैं अपने अंतिम नतीजे पर पहुंचा: मैं किसी भी हालत में अपनी बेटी को उस तरह नहीं पालूँगा जिस तरह एक सामान्य भारतीय परिवार अपनी लड़कियों को पालता है। मैं नहीं चाहूँगा कि मेरी बेटी से भी समाज वही अपेक्षाएँ रखे जो वह एक सामान्य भारतीय लड़की से रखता है। मैं एक भारतीय हूँ मगर उसका यह अर्थ नहीं है कि मैं अपनी खुली आँखों से सच का सामना न करूँ और बदलाव की शुरुआत न करूँ। अपनी बेटी को इस तरह पालते हुए कि वह एक मजबूत व्यक्तित्व की मालिक बने, जो खुद सोच सके और अपने निर्णय ले सके, इस बदलाव का श्रीगणेश करना चाहता हूँ।