भारतीय अपनी औरतों से इतनी अपेक्षा क्यों रखते हैं? – 23 अप्रैल 2013

भारतीय संस्कृति

मेरी पत्नी, रमोना ने एक दिन अप्रत्याशित रूप से कहा, "मैं बहुत खुश हूँ कि मैं भारतीय नहीं हूँ." मुझे लगा कि उसके मन में कुछ उद्विग्न हलचल है इसलिए मैंने उससे पूछा कि क्यों? "भारतीय अपनी औरतों से बहुत सारी अपेक्षाएँ रखते हैं लेकिन यह ठीक है कि मुझे उनका सामना नहीं करना पड़ता क्योंकि मैं भारतीय नहीं हूँ!" जब मैंने यह कथन फेसबुक के अपने पेज पर पोस्ट किया तो वाद-विवाद शुरू हो गया। तब उसने अपने कथन को ज़रा और स्पष्ट करते हुए अपनी बात रखी। मुझे लगता है कि वृंदावन में बिताए इन छह वर्षों के उसके अनुभव के निचोड़ को आप भी समझना पसंद करेंगे:

"जो मैंने कहा वह वृंदावन में अपने मित्रों, अपने कर्मचारियों और हमारी पाठशाला के विद्यार्थियों के अभिभावकों के साथ हुए अपने अनुभवों से उपजा है। हम किसी बड़े मेट्रो में नहीं रह रहे हैं जहां सशक्त महिलाएं बड़ी-बड़ी कंपनियों में प्रशासनिक पदों पर विराजमान हैं! अगर मैं किसी बड़े शहर में रहती तो शायद मेरे अनुभव बहुत अलग होते। यहाँ बहुत से लोग यह समझते हैं कि अगर कोई महिला बाहर निकलकर कोई काम करती है तो अवश्य ही उसका परिवार बहुत गरीब होगा। इतना गरीब कि महिला काम न करे तो परिवार पर अस्तित्व का संकट उपस्थित हो जाए।

मैं बात कर रही हूँ महिलाओं से की जाने वाली उन अपेक्षाओं की जो उनके व्यवहार, उनके पहनावे, उनके बात करने के ढंग कि जब वे कुछ ‘खास’ विषयों पर बात करें तो शर्माते, झिझकते हुए करें, पुरुषों से बात करते वक़्त सिर्फ मौन प्रतिक्रिया दें और जहां तक हो सके अपने विचारों को प्रकट न करें। बालिग महिलाएं भी अपनी मर्ज़ी से यह निर्णय नहीं कर ले सकतीं कि उन्हें काम करने के लिए बाहर निकलना चाहिए या नहीं, उन्हें कितनी तनख्वाह मिलनी चाहिए और काम पर जाने और वापस लौटने का उचित वक़्त क्या हो।

वे रोजगार के लिए इंटरव्यू देने भी अपने पति, बड़े भाई या पिता के साथ आती हैं और अंतिम निर्णय के लिए पूरी तरह उन पर निर्भर रहती हैं। हमारे यहाँ की शिक्षिकाएँ कहती हैं, ‘मैं छह माह काम करूंगी फिर मेरी शादी हो जाएगी’ और जब मैं उनसे पूछती हूँ कि शादी के बाद तुम काम क्यों नहीं करना चाहती तो वे कहती हैं, ‘मेरे सास-ससुर चाहेंगे तो करूंगी…’! 25-30 साल की बालिग, पढ़ी-लिखी, समझदार महिलाओं को भी हमारे स्कूल के उन कार्यक्रमों में आने की इजाज़त नहीं होती जो शाम 7 बजे के बाद समाप्त होने वाले हों। और ये ‘कामकाजी महिलाएं’ कहलाती हैं!

व्यक्तिगत जीवन में भी उनसे बहुत सारी अपेक्षाएँ की जाती हैं और पाबंदियाँ भी बहुत होती हैं। अगर कोई बालिग, मित्र लड़की, मुझसे मिलने आश्रम आती है और आधा घंटा भी देर हो जाती है तो उसका मोबाइल बजने लगता है, ‘तुम कहाँ हो? क्या कर रही हो?’ जब मैं अपने ससुर के साथ बात करती हूँ और उनकी बात पर मैं कोई प्रतिवाद करती हूँ तो आसपास बैठे लोग आश्चर्य से चौंक उठते हैं और अनमने से मुस्कुराने लगते हैं। मेरे ससुर को कोई शिकायत नहीं होती मगर दूसरे लोग सोचते हैं, ‘ओह इस विदेशी महिला को समझ नहीं है…’

मैं एक वाक्य में यही सब कहना चाहती थी। मैं जानती हूँ कि मेट्रोज़ में बदलाव आ रहा है और कई बहुत मजबूत महिलाएं हैं जो इन अपेक्षाओं की परवाह न करने का साहस रखती हैं-लेकिन यहाँ, वृंदावन में मैं जो रोज़ देखती हूँ वह बहुत उत्साहजनक नहीं है।

लेकिन मुझे गलत न समझें-मुझे भारत से और भारतीय जनता से प्रेम है और सबसे ज़्यादा मैं अपने परिवार से प्रेम करती हूँ जो किसी भी सख्त परंपराओं को मनाने वाला नहीं है और जो मुझसे कोई अपेक्षा नहीं रखता। यह मेरा घर है और मैं यहाँ अपनी निजता और अपने व्यक्तित्व के साथ स्वतंत्र हूँ।

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