कई प्राचीन परंपराएँ आपके सम्मान की हकदार नहीं हैं! – 13 मई 2013

भारतीय संस्कृति

अपेक्षानुसार, आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) से संबंधित अपनी डायरियों पर मुझे बहुत सी प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुई हैं। इस विषय पर और ऐसे ही दूसरे विषयों पर यह एक टिप्पणी अवश्य होती है: 'आपको अपनी प्राचीन परंपराओं का आदर करना चाहिए न कि उनका अपमान!' मेरा छोटा सा जवाब होता है कि नहीं, मैं ऐसा नहीं करूंगा! विस्तृत जवाब चाहिए तो ठीक है; लीजिये, हाजिर है!

आयोजित विवाहों के एक बड़े समर्थक ने यह तर्क पेश किया: 'प्रेम क्या है? अगर आपने कोई कुत्ता पाल रखा है तो साथ रहते रहते उससे भी आप प्रेम करने लगते हैं।' उनका मतलब यह है कि विवाह से पहले प्रेम भी हो, यह आवश्यक नहीं है। आप किसी के साथ भी लंबे समय तक रहें तो परस्पर प्रेम करने लगेंगे। माफ करें, मैं उस परंपरा का कोई सम्मान नहीं कर सकता जो एक पालतू कुत्ते और पत्नी में कोई भेद नहीं करता। यह हमारी भारतीय संस्कृति है, हमारे पूर्वजों द्वारा निर्मित परंपराएँ हैं जो जानवरों की तरह महिलाओं, बेटियों और पत्नियों का सौदा करती हैं। प्रेम महत्वपूर्ण नहीं है, वह साथ रहते-रहते हो ही जाएगा! हो सकता है।

अगर ऐसा ही है तो फिर आजकल संभावित दूल्हे और दुल्हिन को विवाह से पहले आपस में मिलने ही क्यों दिया जाता है? अगर प्रेम हो ही जाना है तो फिर सशरीर किसी को देखने की आवश्यकता ही क्या है? क्या आप वाकई मानते हैं कि प्राचीन परंपरा यही थी? आपके परदादाओं के जमाने में तो विवाह से पहले दूल्हा और दुल्हन एक दूसरे को देखते तक नहीं थे। ऐसे खयाल को तुरंत नामंजूर कर दिया जाता था क्योंकि उसे संस्कृति और परंपरा का अपमान माना जाता था।

अधकचरे आधुनिक लोग मुझसे कहते हैं कि वे मॉडर्न हैं लेकिन फिर भी परंपराओं का सम्मान करते हैं। मैं ऐसा नहीं मानता। आप अपने बच्चों को सलाह देते हैं कि वे प्रेम तो कर सकते हैं मगर अपनी जाति या उपजाति में ही! क्या आप ऐसे आयोजनों में इतने दक्ष हैं कि अपने बच्चों को ठीक-ठीक निर्देश दे सकें कि किससे प्रेम किया जाए? क्या आप वाकई ऐसा मानते हैं कि यह संभव है? आपको मालूम होना चाहिए कि यह आपका भ्रम है अन्यथा आपका दूसरा वाक्य धमकी और अस्वीकार से भरा नहीं हो सकता: 'मैं किसी दूसरी जाति, धर्म या देश की लड़की या लड़के को स्वीकार नहीं कर सकता!'

अगर आप ऐसा करते हैं तो क्या आप वाकई अपनी 'प्राचीन परंपराओं' का निर्वाह कर रहे हैं? प्रकट रूप में आपकी महान संस्कृति बच्चों का अपनी मर्ज़ी से प्रेम करना बर्दाश्त नहीं करती मगर आप यह भी जानते हैं कि आप परिवर्तन को रोक नहीं सकते और इसलिए आप परंपरा की बेड़ियों को थोड़ा ढीला भर कर देते हैं। एक कदम आगे जाकर मैं कहूँगा कि वास्तविकता यह है कि आप स्वयं ही जस का तस अपनी परंपराओं का सम्मान नहीं कर रहे हैं। आप उसमें ढील ही तो दे रहे हैं!

आपकी महान संस्कृति कहती है कि प्रेम करना अपराध है। आप अपनी बेटियों को सीख देते हैं कि अपने साथ पढ़ने वाले लड़कों से बात तक मत करो लेकिन अपेक्षा करते हैं कि वह एक अजनबी के साथ विवाह कर ले और उसके साथ हमबिस्तर होने के लिए मजबूर हो जाए। क्या यह गलत नहीं है?

अगर आप अपने बच्चों के विवाह आयोजित करते हैं तो आप सिर्फ शरीरों का सौदा कर रहे हैं। आप अगर अपने बच्चों को अपनी जाति के लड़के या लड़की से प्रेम करने की इजाज़त दे भी देते हैं तब भी आप अपने बच्चों को एक दकियानूसी और पूरी तरह गलत जाति प्रथा में बांधकर ही रखना चाहते हैं। अगर आप दहेज लेते हैं या देते हैं तो आप महिलाओं का अपमान करते हैं। अगर आप किसी लड़की या लड़के के शरीर को देखकर उसका चुनाव करते हैं तो आप मनुष्यता का अपमान करते है। आखिर एकाध घंटे की मुलाकात में आप इतना ही तो देख पाते हैं। आप इतने समय में किसी भी व्यक्ति की आत्मा, उसके विचार या उसकी भावनाएं नहीं जान सकते। और इस तरह यह महज शरीर का लेन-देन भर बनकर रह जाता है। किसी अनजान परिवार में अपनी लड़की या लड़के को बेचना। एक विवाह, जोकि सामान्य रूप से एक सुखकर अवसर होना चाहिए, प्रेम से लबालब होना चाहिए, एक व्यापार और दौलत का दिखावा भर बनकर रह जाता है।

पुरुष-सत्तात्मक भारतीय समाज इन परंपराओं से चिपका हुआ है क्योंकि वे पुरुषों की ताकत को बरकरार रखती हैं, वे जाति प्रथा की समाप्ति में अवरोध का काम करती हैं और क्योंकि वे पुरुषों को इस बात की इजाज़त देती हैं कि वे महिलाओं से घोड़ों जैसा व्यवहार करें, उन पर दांव लगाएँ और उनकी लगाम अपने हाथों में रख सकें जिससे महिलाएं अपनी ऊर्जा का उपयोग अपनी बेहतरी के लिए न कर सकें। अगर आप परंपराओं की बात करते हैं तो हमारे देश में और हमारी संस्कृति में बहुत सी ऐसी परंपराएँ हैं जो पहले भी गलत थीं और आज भी गलत हैं। कई परंपराएँ पहले ही खत्म हो चुकी हैं मगर कई आज भी मौजूद हैं, जैसे दहेज की परंपरा, प्रिय व्यक्ति के देहावसान पर भोज का आयोजन, महिला भ्रूणहत्या और जाति प्रथा। हाँ, मैं मानता हूँ कि मैं ऐसी किसी परंपरा का सम्मान नहीं कर सकता और उनका निरादर भी करता रहूँगा जो मनुष्य को मनुष्य नहीं मानती और उसका हर तरह से अपमान करती हैं। और यह मैं जीवन भर करता रहूँगा। अगर आपको यह ठीक नहीं लगता तो मेरा कहना है कि मैं इसकी बिल्कुल परवाह नहीं करता!

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