भारत में जुआ, शराब और सेक्स जैसी समस्याओं के लिए पश्चिमी संस्कृति जिम्मेदार नहीं – 16 जनवरी 13

भारतीय संस्कृति

कल मैंने आपको बताया था कि कई लोग भारत में होने वाले सभी यौन/लैंगिक अपराधों के लिए पश्चिमी सभ्यता के असर को जिम्मेदार मानते हैं। सिर्फ यौन/लैंगिक समस्या ही नहीं बल्कि दूसरी अन्य दिक्कतों के लिए भी पश्चिम को बलि का बकरा बना दिया गया है! लोग जब भी दूसरों को जुआ खेलते देखते हैं तब पश्चिम को कोसते हैं, जब भी किसी के परिवार का सदस्य शराब पीने लगता है तब भी उनके निशाने पर पश्चिम ही होता है। और हां, जब भी टीवी पर कामुकता से भरे दृश्य दिखाई देते हैं, या दुर्दांत किस्म के लैंगिक (सेक्सुअल) अपराधों को देखकर बच्चे सेक्स के बारे में पूछते हैं, तब भी इनमें से ज्यादातर लोग पश्चिम से क्रोधित होते हैं। लेकिन मैं आपको समझाता हूं कि इन सभी समस्याओं के लिए पश्चिम को जिम्मेदार ठहराना क्यों पूरी तरह से अनुचित है।

हमें जुए की समस्या से शुरुआत करनी चाहिए। भारत में जुआ खेलना गैर-कानूनी है। इस देश में आप सिर्फ गोवा में ही जुआघर (केसिनो) पा सकते हैं। इस सुदूरवर्ती स्थान पर आप चाहें तो भाग्य के इस खेल में कानूनी तौर पर हाथ आजमा सकते हैं। हालांकि लाखों नहीं तो हजारों लोग नियमित रूप से ताश के खेल में या शर्तों में पैसे लगाते हैं। कभी-कभी वे जीत जाते हैं लेकिन ज्यादातर बार वे हारते ही हैं। लेकिन इस उम्मीद में कि किसी न किसी दिन उनके हाथ जैकपॉट लग सकता है, वे लाखों रुपये जीत कर बहुत ज्यादा धनी बन सकते हैं वे इसके आदी हो जाते हैं। लेकिन इसके बजाए आमतौर पर वे हारे हुए खिलाड़ी की तरह ही इस खेल से बाहर जाते हैं। उनमें से कई लोग इतना ज्यादा हारते हैं कि अपनी जिंदगी तक दांव पर लगा देते हैं और अपने परिजनों को भी दुख पहुंचाते हैं। ऐसे में ज्यादातर धार्मिक लोग आरोप लगाते हैं कि भारत में इस व्यसन को पहुंचाने वाला पश्चिम ही है।

ऐसा ही शराब और इसे पीने वालों के बारे में भी है। चाहे किसी भी तरह की शराब हो, उससे होने वाली दिक्कतों के बारे में सभी जानते हैं। इसके बावजूद लोग पीते हैं, ऐसा बर्ताव करते हैं जैसे उनका खुद पर नियंत्रण नहीं रहता और यहां तक कि वे उग्र हो जाते हैं, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं, अपने परिवारवालों को पीटते हैं और अपराध करते हैं। भारत में सिर्फ उन्हीं दुकानों पर शराब बेची जा सकती है जिनके पास लाइसेंस है और यहां शराब या सिगरेट के प्रचार के लिए टीवी पर विज्ञापन भी नहीं दिखाया जाता, इसकी इजाजत नहीं है।

मैं मानता हूं कि ये सभी चीजें गलत हैं। मैं मानता हूं कि लोगों को ना तो जुआ खेलना चाहिए और ना ही शराब पीनी चाहिए। लेकिन इसके लिए पश्चिमी सभ्यता पर आरोप लगाए जाने से मैं सहमत नहीं हूं। पश्चिमी आधुनिक सभ्यता ना तो भारत में शराब लेकर आई और ना ही जुआ खेलना सिखाया। जुआ यहां के लिए नया नहीं है, और कोई ऐसी कल्पना भी नहीं है कि यह दुनिया के विभिन्न स्थानों में नहीं खेला जा सकता। जब हिन्दू धर्म ग्रंथ रचे जा रहे थे तब भी लोग जुआ खेलते थे और शराब पीते थे। महाभारत काल में भी जुआ अस्तित्व में था और उसका यहां वर्णन हुआ है। अन्य धर्म ग्रंथ 64 कलाओं की व्याख्या करते हैं जिनमें मानव आगे बढ़ सकता है और उनमें से एक है जुआ। इसी तरह, वेद बताते हैं कि भगवान को चढ़ावे के तौर पर भी शराब चढ़ाई जाती थी।

लेकिन जब बात सेक्स तक पहुंचती है, तब मेरे मूल विचार उन धार्मिक लोगों से बहुत अलग हो जाते हैं जो भारतीय मूल्यों में आ रही गिरावट के लिए पश्चिम पर आरोप मढ़ते हैं, जो पश्चिम के खुलेपन को यौन अपराधों के लिए दोषी ठहराते हैं। मेरा मानना है कि आपको अपनी प्रवृतियों को नहीं छुपाना चाहिए और सेक्स को सामान्य तौर पर प्राकृतिक रूप में ही लेना चाहिए। मैं इस विचार का विरोध करता हूं कि यह सब केवल एक पश्चिमी अवधारणा है, पूरे भारत के मंदिरों में बनाई गई उत्तेजक मूर्तियों के इंजीनियर और शिल्पकार कौन थे? खजुराहो, कोणार्क और अन्य जगहों के मंदिरों की दीवारों पर इन मूर्तियों को उकेरने की कल्पना किसने की? वे लोग पश्चिम से नहीं आए थे, वे भारतीय थे। शायद सबसे पुराने और सबसे चर्चित कामुक पुस्तक के लेखक वात्स्यायन भी अमेरिका या यूरोप से नहीं आये थे।

जुए और शराब का हमारी संस्कृति पर बहुत बुरा असर पड़ा है। सेक्स अपने आप में कोई समस्या नहीं है लेकिन इसके बावजूद यहां काफी यौन शोषण और यौन अपराध होते हैं। इन समस्याओं की जड़ें कम से कम पश्चिम में नहीं हैं। वास्तव में, भारत में आज हम जो समस्याएं देखते हैं वे पश्चिम की तुलना में अपने यहां ज्यादा खराब हैं। आप पश्चिम पर आरोप लगाते हैं कि लोग वहां खुलेआम जुआ खेलते हैं और यहां तक कि इसके लिए जुआघर भी बनाते हैं। जबकि हकीकत ये है कि वहां काफी कम संख्या में लोग अपने पूरे पैसे जुआघरों में गंवाते हैं। काफी लोग वहां जाते हैं, अपनी जेब में निर्धारित रकम रखते हैं और अगर वह रकम हार जाते हैं तो घर चले जाते हैं। शराब भी वहां एकदम दूसरे तरीके से इस्तेमाल की जाती है। आप देखेंगे कि वहां के लोग नियमित रूप से एक पैग या एक बोतल बीयर पीते हैं, लेकिन कभी खुद पर से नियंत्रण खोकर जानवरों जैसा बर्ताव नहीं करते। सेक्स भी खुलेआम होता है लेकिन वहां के लोग बसों में या भीड़ में महिलाओं को छूना शुरू नहीं कर देते।

मुझे गलत मत समझियेगा, मैं यहां ना तो शराब या जुए का प्रचार कर रहा हूं, ना ही पश्चिमी सभ्यता की नकल करने का हिमायती हूं। वहां की कमियों और लोगों की दिक्कतों को साफ तौर पर देखते हुए मैं पश्चिमी सभ्यता की प्रशंसा भी नहीं करता। मैं तो सिर्फ इस विचार का विरोध करना चाहता हूं कि भारत में शराब, जुए और लैंगिक अपराध पश्चिम से लाये गये हैं। यह सच नहीं है।

आप पश्चिमी सभ्यता को कोस रहे हैं, ये कह कर कि इससे आपकी संस्कृति और देश का पतन हो जाएगा, आप वहां से आने वाली हर चीज को कोस रहे हैं। अगर आपकी यही सोच है तो कृपया ठीक से सोचें कि आप कहते क्या हैं और करते क्या हैं। सबसे पहले अपनी पैंट और शर्ट उतार फेंकिये और धोती पहनिये। जो आप पहन रहे हैं वो पश्चिमी पहनावा है, भारतीय नहीं। फेसबुक से निजात पाईये और आई फोन बेच दीजिए-वो निश्चित रूप से भारतीय नहीं है। आप आधुनिक दुनिया में रह रहे हैं – अगर आप पश्चिम से आने वाली हर चीज का विरोध करेंगे तो आपको काफी चीजों का परित्याग करना होगा। देखिए कि आधुनिक विज्ञान ने आपको क्या दिया है, देखिए कि चिकित्सा के क्षेत्र में क्या-क्या संभव है, वो सिर्फ इसलिए कि पश्चिम में शोध हुआ है। निसंदेह, भारत में भी शोधकर्ता, वैज्ञानिक और प्रतिभाशाली लोग हैं लेकिन इनमें से ज्यादातर लोग अपने समारोह और धार्मिक क्रियाकलापों में ही कहीं ज्यादा व्यस्त होते हैं। और जिन्होंने इस दुनिया को ज्यादा आधुनिक बनाने में मदद की है वे कभी भी पश्चिम के योगदान की आलोचना नहीं करेंगे।

अपनी आंखें और दिल खोलिए और इस बात को स्वीकार कीजिए कि बुराई और खोट हर देश में होता है। सकारात्मक चीजों की ओर ध्यान केंद्रित कीजिए और बदलाव लाने की कोशिश कीजिए।

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