हम झगड़ नहीं रहे हैं – हिन्दी महज एक भावोत्तेजक भाषा है! – 9 नवंबर 2009

कल मैं संस्कृतियों के बीच एक अंतर की बात कर रहा था:कि भारत में बच्चे वयस्क हो जाने के बाद घर से बाहर निकलना पसंद नहीं करते। एक और अंतर जो बारम्बार नज़र आता है, वह है: हिन्दी भाषा एक बहुत भावोत्तेजक भाषा है। जिन्हें हिन्दी भाषा सुनने का अवसर नहीं मिला है और जो भारत पहली बार आए हैं, वे आश्चर्य करते हैं कि भारत के लोग चिल्ला-चिल्लाकर बात करते हैं और बहुत ज़्यादा वाद-विवाद करते हैं।

ऐसा लोगों को तब भी महसूस हो सकता है जब हमारी विदेश यात्राओं के दौरान वे मेरे और यशेंदु के बीच चल रही आपसी बातचीत के दौरान मिलने आते हैं या यहाँ आश्रम में भी हमें बात करता हुआ देखते हैं। हमारे कई मित्र बता चुके है कि वे यशेंदु और मेरे आसपास खड़े थे और यह देखकर घबरा गए थे कि कहीं हम लोग आपस में झगड़ तो नहीं रहे हैं। वे समझ रहे थे कि हम लोगों के बीच किसी बात पर कोई विवाद हो गया है। और तब हम दोनों ठहाका मारकर हंस पड़ते थे और उन्हें पहले थोड़ी उलझन होती थी मगर बाद में वे चिंतामुक्त भी हो जाते थे।

रमोना ने भी बताया था कि जब उसने हिन्दी सीखना शुरू किया तब उसे समझ में आया कि हम लोग लड़ाई नहीं किया करते थे क्योंकि हमारी बातों में ‘दूध’, ‘चाँवल’ और ‘भोजन’ जैसे शब्द हुआ करते थे और तब उसे बड़ा मज़ा आता था और वह हँसे बगैर नहीं रह पाती थी। मतलब, हिन्दी सीखने से पहले जब हम भोजन के बारे में बात करते थे तब वह समझती थी कि हम लड़ रहे हैं! तो, हिन्दी भाषा बहुत उत्कटता के साथ बोली जाने वाली भाषा है और कोई भी भाव हो उसे बड़ी भावप्रवणता के साथ कहा जाता है। और इस तरह यह शांत ज़बान नहीं है, यह बहुत जीवंत और कुछ तीखी भी है, जिसके पश्चिमी लोग अभ्यस्त नहीं होते।

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