कुछ दिन पहले मैं संस्कृति के संबंध में बात कर रहा था। हर प्राचीन संस्कृति की जड़ें बहुत गहरी होती हैं और अगर आप उसे वाकई जानना, समझना चाहते हैं तो उसमें समय लगता है। इसके लिए आपको उस संस्कृति के बीच काफी वक़्त गुज़ारना होगा।
कभी-कभी जब मैं ऐसे व्यक्तियों को, जो कुछ हफ्ते भारत रहकर आए हैं, कहते सुनता हूँ कि वे भारतीय संस्कृति को जानते हैं तो मुझे बेसाख्ता हंसी आ जाती है। खासकर तब, जब वे वहाँ किसी 5 स्टार होटल में समय बिताकर आते हैं।
ये होटल बड़ी-बड़ी कंपनियों के होते हैं और हर जगह, चाहे वह लंदन हो, न्यूयॉर्क हो या दिल्ली हो, एक से होते हैं। यहाँ तक कि अक्सर वहाँ अंदरूनी सजावट भी एक सी होती है। तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि आप यहाँ हैं या वहाँ? अगर आप वाकई किसी जगह की संस्कृति से वाकिफ होना चाहते हैं तो आप वहाँ के मूल निवासियों के साथ रहिए और उनके साथ समय बिताइए। अधिक आत्मीय संबंध कायम कीजिये। जिसे हम हिन्दी में कहते हैं कि वहाँ की मिट्टी की खुशबू लीजिये।
आज एक बहुत साधारण दिन था और हमने शानदार भोजन का इंतज़ाम किया था। हमें पता चला है कि कल का व्यंजन लगभग 25 पराठों के लिए है, इसका मतलब है कि वह 10 व्यक्तियों के लिए पर्याप्त होगा। यानी अगर आप अपने अकेले के लिए भोजन बना रहे हैं तो आपको सारी वस्तुएं अनुपात में कम रखनी होंगी।
आश्रम के बच्चों ने भी आज बढ़िया भोजन प्राप्त किया जिसमें मेंगों शेक भी था। लक्ज़ेंबर्ग की जोकुबस क्रौजेलिस ने अपने जन्मदिन के उपलक्ष्य में उसे प्रायोजित किया था। मेरे दिमाग में और कुछ कहने को नहीं है इसलिए आज की डायरी को संक्षिप्त ही रहने दे रहा हूँ।
बच्चों के दोपहर भोजन के चित्र देखने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये
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