हठधर्मी रूढ़िवादी समाज में स्वाभाविक बदलाव का विरोध करते हैं – 10 मई 2013

भारतीय संस्कृति

कल मैंने विस्तार से बताया था कि आजकल के भारतीय युवा अधिक से अधिक संख्या में अपने अभिभावकों द्वारा पसंद किए गए लड़के या लड़की को अस्वीकार करते हुए अपने प्रेमियों से ब्याह करना पसंद करते हैं और यह भी कि इसमें पश्चिम का ज़रा भी दोष है, मैं इस सोच को ठीक नहीं मानता। जिन्हें अपनी परंपराओं और संस्कृति पर कुछ ज़्यादा ही गर्व है मेरी इस मान्यता का तीखा विरोध करते हैं और कहते हैं कि उनकी संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट किया जा रहा है। यह ब्लॉग उन लोगों को संबोधित है जो यह मानते हैं कि ऐसे परिवर्तन उनकी संस्कृति के अंत की शुरुआत हैं।

आप विश्वास करते हैं कि ये आयोजित विवाह आपकी संस्कृति का अटूट हिस्सा हैं। आप को डर लगता है कि अगर ये परंपराएँ खत्म हो गईं तो आप अपनी जड़ों से कट जाएंगे, आपका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। आप डरते हैं कि आप अपनी पहचान को देंगे या कि आपके बच्चे ऐसी किसी संस्कृति के अनुयायी हो जाएंगे जो निकृष्ट है और आपसे उसका कोई संबंध नहीं होना चाहिए। आपको इन आशंकाओं से पीछा छुड़ाना होगा और असलियत से आँखें मिलानी होंगी। दुनिया बदल रही है और अगर आप एक ऐसे बच्चे की तरह जो अपने पुराने खिलौनों से चिपका रहता है, अतीत से चिपके रहे तो आप आगे नहीं बढ़ सकते। इसलिए आपको अतीत के प्रेतों से अपना पीछा छुड़ाना ही होगा। अपने आसपास हो रही तब्दीलियों और विकास पर गौर कीजिये और इस बात को समझिए कि यह एक सामान्य बात है कि दुनिया में चीज़ें बदलती ही हैं।

जिन बातों के आप आदी हैं उनके प्रति अपने अड़ियल रवैये से आप बहुत सी बेहूदी बातों का भी न सिर्फ बचाव करते हैं, उनका समर्थन भी करने लग जाते हैं। आप जानते हैं कि ये परंपराएँ आपके लिए पहले भी आत्मघाती सिद्ध हुई हैं मगर आप इस बात को स्वीकार नहीं करते क्योंकि आप डरते हैं कि ऐसा करने से आप गलती से कहीं अपनी संस्कृति के खात्मे की वकालत तो नहीं कर रहे हैं। आप चीख-चीखकर कहते हैं कि सब कुछ ठीक-ठाक है और अंतरात्मा की क्षीण आवाज़ आपको सुनाई नहीं देती जो कह रही होती है, 'इसमें नुकसान भी बहुत से हैं!'

इस तरह आप हर तरह के परिवर्तन का विरोध करने लगते हैं, किसी भी नए विचार का जो किसी पुरानी बात का खंडन करता हैं आप विरोधी हो जाते हैं। यह नहीं देखते की वह नया विचार कितनी सारी संभावनाएं लेकर आया है, आप सिर्फ उसकी बुरी बातों को देखते हैं। बुरी बातें भी होती हैं, मैं अच्छी तरह से जानता हूँ! कोई भी बात, कोई भी विचार सिर्फ अच्छा ही अच्छा नहीं होता, कुछ नकारात्मक बातें भी उनमें हो सकती हैं।

भारत में व्यक्तिवाद बढ़ता जा रहा है। युवा धीरे-धीरे अपनी खुशियों और इच्छाओं को समाज की मान्यताओं पर तरजीह दे रहे हैं। वे ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में आयोजित विवाहों की जगह प्रेम-विवाह करना पसंद करते हैं। व्यक्तिवाद के इस दबाव ने पश्चिम में क्या गुल खिलाए हैं हम देख चुके हैं: वहाँ भी सम्मिलित परिवार हुआ करते थे, यह वहाँ भी एक सामान्य बात थी। भारत की तरह लोग वहाँ भी एक साथ रहा करते थे। व्यक्तिवाद के प्रसार के साथ घर-परिवार टूटते चले गए और अब लोगों के पास अपने माँ-बाप और परिवार के बड़े-बूढ़ों के लिए भी वक्त नहीं होता। मैं यहाँ पश्चिमी संस्कृति की वकालत करने नहीं बैठा हूँ। व्यक्तिवाद के चलते वहाँ के अकेलेपन, अवसाद और दूसरी नई-नई समस्याओं के बारे में मैं अच्छी तरह वाकिफ हूँ और यह हमारे यहाँ भी शुरू हो चुका है।

लेकिन ये नकारात्मक प्रभाव इस बात का कारण नहीं होने चाहिए कि हम उनकी अच्छाइयों को भी छोड़ दें, अपने विकास को अवरुद्ध कर लें। सच्चाई यह है कि कितना भी आप कोशिश कर लें आप विकास की धारा को रोक भी नहीं सकते। आपका देश अपनी संस्कृति सहित क्या स्वयंमेव नहीं बदल कर रहा है? वह 100 साल पहले का भारत तो नहीं है! वह 10 या 20 साल पहले का भारत भी नहीं है! जब मैं छोटा था प्रेम-विवाह इतने दुर्लभ हुआ करते थे कि सारा कस्बा उसकी चर्चा में लीन हो जाता था। आज भी आयोजित विवाह ही सामान्यतः होते हैं मगर प्रेम-विवाहों की संख्या भी बढ़ रही है और उन्हें अब समाज कुछ खास तवज्जो नहीं देता।

दुनिया बदल रही है और आप उसके विकास को रोक नहीं सकते। आप ऐसा करने की कोशिश करके अपने आपको दुखी भर कर सकते हैं। हमें दूसरे राष्ट्रों के इतिहास पर नज़र डालनी चाहिए और उससे कुछ सीख लेनी चाहिए। उन संस्कृतियों के अनुभवों का लाभ उठाते हुए हमें यह प्रयास करना चाहिए चाहिए कि जो गलतियाँ उन्होंने कीं उन्हें हम न दोहराएँ। अपनी ऊर्जा को किसी बेहतर निर्माण में लगाएँ न कि बदलाव को रोकने के निष्फल प्रयत्न में उसे ज़ाया करें!

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