सवाल ये है कि द्वार खटखटाएँ या न खटखटाएँ – 10 नवंबर 2009

मैं संस्कृतियों के बीच पाए जाने वाले अंतर के बारे में और उन चीजों के बारे में लिखता रहा हूँ जो किसी दूसरे देश, जैसे भारत, आने के बाद लोग महसूस करते हैं। आम तौर पर ये इस तरह की बातें होती हैं जैसे टेबल पर या खाना खाते वक्त आप किन बातों को अच्छा या बुरा मानते हैं। इसी तरह एक और बात जो मैंने पश्चिम में देखी है मगर भारत में किसी काम की नहीं है, वह है: प्रवेश करते समय द्वार खटखटाना।

आश्रम में मैंने हमेशा देखा है कि आश्रम के बच्चे और दूसरे कर्मचारी मेरे ऑफिस में बिना दरवाजा खटखटाए चले आते हैं जबकि हमारे मेहमान हमेशा दरवाजा खटखटाकर बाहर खड़े इंतज़ार करते हैं। हम हमेशा अपने बच्चों को समझाकर भेजते हैं कि मेहमानों को भोजन के लिए बुलाते समय पहले उनके कमरे का दरवाजा अवश्य खटखटाना। दुर्भाग्य से वे इतने बड़े हो जाने के बाद भी इस बात को समझ नहीं पाए और हमेशा इस बात को भूल जाते हैं।

इससे कई बार बहुत मज़ेदार वाकयात पेश आते हैं और हम हमेशा अपने मेहमानों को यह आगाह करते हैं कि यहाँ पर लोग प्रवेश करने से पहले बहुधा दरवाजा नहीं खटखटाते। और फिर दूसरी तरफ मेरी माँ हैं जिन्हें लगातार कहना पड़ता है, ‘अंदर आ जाइए’, ‘हाँ!’ या ‘चले आइये’। जब वह कमरे में होती हैं तो जल्द ही लोगों की इस खटखटाहट से थक जाती हैं। मेरे माता-पिता के कमरे में कई काम चलते रहते हैं; मुख्य फ्रिज वहीं है जिसमें सब्जियां और दूसरी छोटी-मोटी चीज़ें रखी होती हैं जिनका रोज़ इस्तेमाल होता है और सबको मालूम होता है कि वे चीज़ें कहाँ प्राप्त होंगी। तो, हर कोई वहाँ आता-जाता रहता है और जैसा कि मैंने कहा यह उनके लिए बहुत तकलीफदेह बात होगी अगर हर आने वाला दरवाजा खटखटाकर ही भीतर आए।

इस तरह मैं यह देखता हूँ कि संस्कृतियों में अंतर होता है और उन रीति-रिवाजों, शिष्टाचारों में भी, जिन्हें सीखते हुए लोग बड़े होते हैं और अपने रोज़मर्रा के जीवन में व्यवहार करते हैं। और जब कोई यहाँ आता है या अगर हम वहाँ जाते हैं तो सभी को खुले मन से दूसरे की जीवन पद्धति को समझना और स्वीकार करना चाहिए।

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