भारत में संडासों की समस्या-पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं, जो हैं उन्हें न तो साफ़ रखा जाता है और न पर्याप्त महत्व ही दिया जाता है! 21 अगस्त 2014

भारतीय संस्कृति

आज मैं एक ऐसे विषय पर लिखना चाहता हूँ, जिसे मैं बहुत महत्वपूर्ण मानता हूँ भले ही दूसरे इसे एक मामूली विषय समझें और सोचें कि मुझे इस विषय पर कलम चलाने की आवश्यकता नहीं है, उस पर एक पूरा ब्लॉग लिखने की तो बिल्कुल नहीं! जी हाँ, आज मैं भारत में बहुतायत से मौजूद शौच जाने की समस्या पर लिखना चाहता हूँ। जी नहीं, यह कब्ज़ या दस्त की समस्या के बारे में नहीं है-हालाँकि किसी दिन मैं उन समस्याओं पर भी लिखना चाहूँगा और हमारे आश्रम में अपनाए जाने वाले आयुर्वेदिक उपचारों से आपको अवगत भी कराऊँगा-लेकिन आज मेरे ब्लॉग का विषय है:संडास, बल्कि संडासों की कमी!

भारत में 46.9% लोगों के घरों में संडास नहीं हैं लेकिन 53.2% लोगों के पास मोबाइल फोन हैं!

एक मिनट इस पर विचार करें! लगभग 600 मिलियन यानी 60 करोड़ लोग इस विशाल देश में रोज़ खुली जगहों में पाखाना करते हैं। जब मैं 'खुली जगहों में' कहता हूँ तो अधिकतर मामलों में उसका अर्थ बिल्कुल खुली जगह होता है: खेतों में, सड़क के किनारे, रेल लाइनों पर, नालियों के ऊपर- 'खुली जगहों में' यानी बाहर, दूसरों की निगाहों के सामने!

दुर्भाग्य से, ज़्यादातर लोगों के सामने वास्तव में कोई दूसरा चारा भी नहीं है और भारत आने वाला हर पर्यटक और यात्री यह बात सबसे पहले नोटिस करता है। दर्शनीय स्थान देखने किसी शहर जा रहे हैं? होटलों और रेस्तारेंटों में संडास होना पर्यटकों के लिए बड़े राहत की बात होती है क्योंकि सार्वजनिक संडास बहुत कम हैं और जो हैं भी तो उनकी हालत बड़ी खस्ता है, वे बेहद गंदे और बदबूदार होते हैं। देश के अंदरूनी इलाकों के सफ़र पर हैं? महिलाओं के लिए तो यह दुस्वप्न की तरह है क्योंकि वे पेशाब करने पुरुषों की तरह सड़क के किनारे नहीं बैठ सकतीं! पेट्रोल पम्पों में संडास? भूल जाइए! और अगर हैं भी तो अकल्पनीय रूप से अस्वच्छ और बदबूदार!

पर्यटकों को भारत में सार्वजनिक संडासों की कमी की समस्या का सामना अकसर करना पड़ता है। और अगर कहीं इक्का-दुक्का मिल भी जाते हैं तो वहाँ भयानक गन्दगी होती है और साफ़-सफाई का ध्यान बिल्कुल नहीं रखा जाता। वे इस बात को अपने देश के अतीत को याद करते हुए समझ सकते हैं या पिछली पीढ़ी के मुख से सुनी कहानियों से जान सकते हैं कि संडासों के मामले में पहले उनके यहाँ भी यही स्थिति थी। लेकिन जो बात वे अकसर नहीं देख पाते वह है यहाँ के घरों की हालत-और मेरा दावा है कि उनकी सचाई जानने पर वे दहल उठेंगे!

इसके अलावा कि हमारे यहाँ इसकी आधारभूत सुविधाएँ ही मौजूद नहीं हैं और लोगों को पर्याप्त संडास उपलब्ध नहीं हैं, अधिकांश लोगों का इस मूलभूत आवश्यकता के प्रति अजीबोगरीब और उपेक्षापूर्ण रवैया भी इस समस्या के लिए ज़िम्मेदार है। साफ़-सफाई के लिहाज से देखें तो वास्तव में इस स्थान को कई बार साफ़ करने की ज़रुरत होती है क्योंकि वह बार-बार गन्दा होता रहता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उसे सबसे ज़्यादा साफ़ रखने की आवश्यकता है। लेकिन कुछ- बल्कि अधिकांश, भारतीय संडास को एक गन्दी और अपवित्र जगह मानते हैं, ऐसी जगह, जहाँ अंजाम दी जाने वाली क्रियाएँ अपवित्र हैं और इसलिए सोचते हैं कि उसे साफ़ करने की ज़रुरत ही क्या है! कई पुरातनपंथी आज भी हर बार संडास जाने के बाद नहाना आवश्यक समझते हैं! वे खुद अपने आप को दिन में कई बार साफ़ करते रहते हैं लेकिन उनके मन में एक बार भी उस जगह को साफ़ करने का विचार नहीं आता जहाँ वे अभी-अभी गंदगी फैलाकर आए हैं!

बहुत से भारतीय घरों में संडास के बाहर, दरवाजे पर आप एक रबर की चप्पल रखी देखेंगे। वह अक्सर पुरानी, टूटी चप्पल होती है और उसे पहनकर आपको संडास जाना होता है। यह इस गंदे काम के लिए ही प्रयुक्त होती है-और आप कल्पना कर सकते हैं कि यह चप्पल कभी साफ नहीं की जाती। हर कोई संडास जाते समय उसका इस्तेमाल करता है-जो खुद कभी-कभार ही साफ किया जाता है-और चप्पल लगातार अधिक से अधिक गंदी होती रहती है। स्वाभाविक ही ऐसे अनुभव के बाद आपको नहाने की ज़रूरत पड़ती है!

इसीलिए बहुत से लोग अपने घरों में संडास बनवाना ही पसंद नहीं करते! बनवाते भी हैं तो घर के बाहर, ज़रा हटकर या सीधे खेतों में ही!

संडास साफ़ करने वाले लोगों को भारत में 'अछूत' माना जाता है। समझा जाता है कि वे गंदे लोग हैं-और इसलिए गंदे काम भी करते हैं। भारतीयों की इस मानसिकता की यही समस्या है और यही जाति प्रथा की जड़ है: वे नहीं देखते कि यह कितना महत्वपूर्ण काम है-दैनिक जीवन में हर वक़्त काम आने वाले स्थान की सफाई, उसे बैठने लायक बनाना न कि उसे गंदा करना।

मुझे लगता है इस चर्चा के स्वास्थ्य सम्बन्धी पहलू पर मुझे ज़्यादा कुछ कहने की ज़रुरत है! खुले में पाखाना करने और अस्वच्छ संडासों के चलते पैदा होने वाली असंख्य बीमारियों के बारे में कौन नहीं जानता!

संक्षेप में यह कि भारत में अधिक से अधिक सार्वजनिक संडासों के निर्माण की ज़रूरत है और इसके अलावा संडासों के प्रति लोगों के रवैये में भी परिवर्तन की बड़ी आवश्यकता है। शायद संडासों की तस्वीर सुधारने हेतु याचिका लगाने की, कोई आन्दोलन शुरू करने की पहल भी होनी चाहिए। इस जगह को, इस महत्वपूर्ण कमरे को बेहतर बनाने के लिए एक अभियान की! शायद हमें अपने घरों के संडासों को साफ़-सुथरा रखते हुए उदहारण प्रस्तुत करना चाहिए कि कोई मेहमान आए तो वहाँ कुछ ज़्यादा देर बैठने में उसे परेशानी तो न हो! 🙂

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