कुख्यात आई एस टी – भारतीय मानक समय – 29 जुलाई 2013

भारतीय संस्कृति

मैं भारतीय लोगों की आदतों के बारे में लिखता रहा हूँ, और सोचता हूँ कि एक ब्लॉग आई एस टी यानी भारतीय मानक समय (जिसे हिन्दी में गर्व से इंडियन स्टैंडर्ड टाइम भी कहा जाता है!), पर भी बनता है। यह एक अनाधिकारिक समय का मानक है जो आपकी घड़ी के वास्तविक समय से, परिस्थिति-अनुसार आधे घंटे से तीन घंटे तक के विलंब का हो सकता है। समय और भारतीय चरित्र, वाकई इनके बीच का संबंध एक खोज का विषय हो सकता है!

यह अच्छा होता है कि किसी बाहिरी व्यक्ति के नज़रिये से किसी सामाजिक व्यवस्था पर गौर किया जाए। भारत भ्रमण पर आया हुआ कोई भी यात्री, जिसका संपर्क अभी स्थानीय लोगों अधिक नहीं हुआ है, वह बहुत जल्द समझ जाता है कि यहाँ "समय का पाबंद" होने का अर्थ सापेक्ष है। मैंने जर्मन लोगों को, जो समय के बड़े पाबंद होते हैं, अक्सर ऐसा महसूस करते हुए देखा है।

मेरी पत्नी, जैसा कि आप जानते हैं, जर्मन है। कुछ वर्ष पहले उसे इसी तरह का एक अनुभव हुआ और उस अनुभव ने उसे उस अंतर से वाकिफ कराया जो समय को लेकर उसके और भारतीयों के बीच मौजूद है।

कस्बे में एक मेला लगा था जिसमें कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ विभिन्न स्कूलों के बच्चों के नृत्य का आयोजन भी किया गया था। हमारे स्कूल के बच्चों ने भी एक नृत्य तैयार किया था और आयोजको द्वारा वितरित विस्तृत निमंत्रण पत्र पर साफ दर्ज था की सांस्कृतिक कार्यक्रम 2 बजे दोपहर से शुरू होंगे और हमारे स्कूल के बच्चों का नंबर 3 बजे तक आएगा। समय पर पहुँचने की गर्ज़ से रमोना ने शिक्षिकाओं के साथ तय किया था कि सब लोग आश्रम से डेढ़ बजे निकल चलेंगे । उसने सोचा, ऐसा करने से उन्हें मेले में पहुँचकर नर्तकों को कहाँ इंतज़ार करना है, कहाँ अपने वस्त्र बदलकर नृत्य के लिए तैयार होना है, आदि बातों का पहले से पता चल जाएगा और वे बिना किसी हड़बड़ी के अपना नृत्य समय पर प्रस्तुत कर सकेंगे।

रमोना, तीन शिक्षिकाएँ और पाँच या छह बच्चे डेढ़ बजे आश्रम से कार में रवाना हुए। वे पंद्रह मिनट बाद कार्यक्रम स्थल पर पहुँच गए, कार से उतरे और मुख्य शामियाने के पास जाकर खड़े हो गए, जहां सारे सांस्कृतिक कार्यक्रम होने थे। मगर यह क्या, अभी तो स्टेज ही तैयार नहीं था, स्टेज की सजावट करने वाले फूल मालाएँ और पोस्टर लिए सजावट कर रहे थे, दर्शकों के लिए लाई गई कुर्सियों का ढेर एक ओर बिखरा पड़ा हुआ था और सबसे बड़ी बात आयोजकों या उनके प्रतिनिधियों कहीं अता-पता नहीं था!

संक्षेप में कहें तो वे वहाँ तीन बजे तक तो कार्यक्रम ही शुरू हुआ और आखिर रो-गाकर उनका नम्बर लगभग डेढ़ घंटे बाद यानी साढ़े चार बजे के बाद आया और तब उन्होंने अपना नृत्य प्रस्तुत किया। इस बात से रमोना को यह सीख मिली कि: जब कोई भारतीय यह कहे कि कार्यक्रम 7 बजे से शुरू होने वाला है आप वहाँ आराम से 9 बजे तक भी पहुँच सकते हैं और कोई आपसे यह पूछने वाला नहीं होगा कि आप 2 घंटा विलंब से क्यों पहुंचे हैं।

अगर किसी भारतीय के साथ आपकी मुलाक़ात तय है तो उसके आधा घंटा विलंब से आने पर आश्चर्य न करें क्योंकि इसे भारत में विलंब माना ही नहीं जाता! अगर आपकी बिजली का कोई उपकरण सुधारने वाला कहे कि वह कल सुबह आएगा तो आप समझकर चलिए कि वह दोपहर तक ही आएगा। और तब भी न आए और आप उसके मोबाइल पर फोन करके उससे कहें कि कहाँ हो भाई, कब तक आओगे, तो वह जवाब देगा, बस, पहुँच ही गया, आपके चौराहे पर ही खड़ा हूँ। लेकिन वह आएगा घंटे भर बाद ही और आप सोचते ही रह जाएंगे कि चौराहे से घर तक की 500 मीटर की दूरी तय करने में इस महानुभाव को एक घंटा कैसे लग गया!!

अधिकांश विदेशियों के लिए सबसे मज़ेदार बात यह होती है कि भारतीय इसे बिलकुल स्वाभाविक सी जायज़ बात मानते हैं। अगर कोई जर्मन सिर्फ 5 मिनट भी देर से आए तो बड़े अफसोस के साथ माफी माँगेगा और पूछेगा कि कहीं आपको बहुत देर उसका इंतज़ार तो नहीं करना पड़ा! एक भारतीय आधा घंटा देर से आएगा और सोचेगा कि वह बिल्कुल ठीक वक़्त पर आ गया है जैसे यही मुलाक़ात का वक़्त तय था।

इस दृष्टिकोण से आपको इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि भारत में दो घड़ियाँ एक सा समय नहीं बतातीं। आजमाकर देख लीजिए: अपने आसपास के दस लोगों से समय पूछिए-मेरा दावा है आपको अलग-अलग जवाब मिलेंगे!

यह एकदम सामान्य बात है। इसे हँसकर भुगतिए वरना परेशान हो जाएंगे! 🙂

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