निमंत्रण की औपचारिकता- और अगर वह औपचारिकता न प्रतीत हो तो!-31 जुलाई 2013

भारतीय संस्कृति

भारतीय आदतों के बारे में लिखते हुए मुझे उनकी एक और आदत का ध्यान आ रहा है: लोगों को अपने घर बुलाने की आदत।

जब भी आप अपने किसी जानकार से मिलते हैं, किसी विवाह या किसी और समारोह में, या यूं ही सड़क पर आपकी मुलाक़ात होने पर आपके बीच होने वाले वार्तालाप का एक खास स्वरूप होता है। शुरुआत होती है अभिवादन के साथ, आप एक दूसरे से पूछते है, आप कैसे हैं और इस पर एक दूसरे को संक्षिप्त में अपनी परेशानियों या खुशियों के बारे में बताते हैं। फिर आप अपने मित्रों और काम के बारे में एक-दो बातें करते हैं या फिर उस समारोह के बारे में जहां आप शामिल होने आए हैं। फिर आपके पास कहने के लिए कुछ नहीं रह जाता और आप एक दूसरे से विदा लेना चाहते हैं और तभी आप सामने वाले को निमंत्रित करते हैं, कभी घर आइये! और इससे बेहतर जवाब आपको नहीं मिल सकता: बिल्कुल, बिल्कुल। मैं ज़रूर आऊँगा। घर आकर मिलता हूँ जल्दी ही!

मज़ेदार बात यह कि दोनों ही यह जानते हैं कि न तो निमंत्रित व्यक्ति आने वाला है, न ही निमंत्रण देने वाले ने उसे वास्तव में बुलाया ही है। निमंत्रित करने वाला, बुलाते समय से ही यह जानता था कि वास्तव में उसका अर्थ सामने वाले को बुलाना नहीं है और निमंत्रित व्यक्ति भी शुरू से यह जानता है कि न तो सामने वाले ने बुलाया है न ही वह जाने वाला है, मगर दोनों ही इस आमंत्रण का अर्थ जानते हैं और उसके जवाब का भी।

लेकिन यह भी संभव है कि कोई व्यक्ति इस बारे में अधिक न जानता हो। तब क्या हो सकता है उसका किस्सा मैं आगे बयान कर रहा हूँ। मैं एक व्यक्ति को जानता हूँ जो वही काम कर रहा था जो मैं भी बहुत साल पहले किया करता था- यानी वह भी एक गुरु था। उसका एक परिचित था, उसी के शहर का बाशिंदा और जो स्थायी रूप से अमरीका में बस गया था। एक बार यह मित्र भारत आया और उससे मिला। बिदा लेते समय उसने भी यही वाक्य दोहराया: आप अमरीका आइये! आप हमारे यहाँ आएँ तो मुझे बड़ा अच्छा लगेगा!

फिर जब कुछ माह बाद उस गुरु को लगा कि अमरीका जाना चाहिए तो वह सीधे अमरीकी दूतावास पहुँच गया और लंबी कतार में खड़ा हो गया। कई घंटों के इंतज़ार के बाद उसका नंबर आया और उससे कहा गया कि अमरीका जाने के लिए वहाँ के किसी व्यक्ति के औपचारिक आमंत्रण पत्र की आवश्यकता होगी, जो न सिर्फ उसे आमंत्रित करे बल्कि उसकी आर्थिक स्थिति और कई दूसरी बातों की जमानत भी दे।

उस गुरु को लगा कि इसमें कोई समस्या नहीं आनी चाहिए, उसका एक मित्र अमरीका में रहता है और उसने उसे बुलाया भी था। तो उसने उस भारतीय को अमरीका में फोन किया और बताया कि वह अब अमरीका आना चाहता है और अमरीकन वीसा ऑफिस आपकी तरफ से मेरे लिए औपचारिक निमंत्रण पत्र चाहता है, जिसे आप तुरंत भिजवा दें! वह अमरीकी मित्र आश्चर्य में पड़ गया और अंततः उसे साफ-साफ कहना पड़ा: मैंने आपको यूंही अमरीका आने के लिए कह दिया था! मेरा मतलब आपको निमंत्रित करने का नहीं था। यह तो महज औपचारिकता थी!!

जब मैं ऐसी औपचारिकताओं की कहानियाँ सुनता हूँ तो मुझे हंसी आए बगैर नहीं रहती! आप देख सकते हैं कि इन औपचारिकताओं का मूल कहाँ हैं: मेहमानों का घर आना भारतीय लोग पसंद करते हैं और खुद किसी के मेहमान बनना भी! अतिथि-सत्कार उनके रक्त में होता है इसलिए वे उन्हें भी खाना खाने या चाय पीने के लिए घर बुला लेते हैं जिन्हें वे ठीक तरह से जानते तक नहीं। कुछ प्रकरणों में यह महज औपचारिकता होती है लेकिन कई मामलों में यह औपचारिकता गहरे पारिवारिक सम्बन्धों की भूमिका भी बन जाती है।

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