पढ़े-लिखे उच्च वर्ग में भी लड़की के जन्म पर निराशा व्यक्त की जाती है! 14 जनवरी 2015

भारतीय संस्कृति

कल मोनिका के बारे में लिखते हुए मैं उसकी पारिवारिक स्थिति पर पुनः विचार करने को मजबूर हो गया। मुझे उसकी माँ के अतीत का खयाल आया, जिसकी दो लड़कियों को दत्तक दे दिया गया क्योंकि वे लड़के नहीं, लडकियाँ थीं। रमोना ने कुछ समय पहले अपनी स्त्री-रोग विशेषज्ञ (गाइनकालजिस्ट) से बात की-और जो उसने बताया उससे एक बार फिर यह साबित हो गया कि बहुत से उच्च वर्ग के लोगों की ज़िंदगी का यह आज भी एक कटु सत्य बना हुआ है!

जिस अस्पताल में रमोना की स्त्री-रोग विशेषज्ञ (गाइनकालजिस्ट) काम करती है, वहीं अपरा का जन्म हुआ था और वहीं इस वक़्त मोनिका का इलाज चल रहा है। जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूँ, वह एक बहुत अच्छा अस्पताल है। अर्थात, यहाँ डॉक्टर जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं, यहाँ के कर्मचारी बहुत दोस्ताना और निपुण हैं और स्वाभाविक ही आप इन सेवाओं की अच्छी-ख़ासी कीमत भी अदा करते हैं। जब कोई डॉक्टर वहाँ भर्ती (बच्चे को जन्म देने वाली) किसी महिला के बारे में बताता है तो स्वाभाविक ही वह किसी अच्छे खाते-पीते, पढ़े-लिखे, उच्च वर्गीय खानदान की सदस्य होती है। वे अच्छी ख़ासी पढ़ी-लिखी होती हैं और अक्सर कोई न कोई काम करती हैं और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया से उनका संपर्क होता है, आधुनिक जीवन और आचार-व्यवहार को वे अच्छी तरह जानती हैं। इसके अलावा वे पुराने दक़ियानूसी मूल्यों की सच्चाई के बारे में भी अच्छी तरह वाकिफ होती हैं।

लेकिन दुर्भाग्य से, जो डॉक्टर ने बताया वह बड़ा निराशाजनक था। उसने बताया कि अक्सर ये महिलाएँ भी बड़ी अंधविश्वासु होती हैं और पुराने, भद्दे, दक़ियानूसी मूल्यों की गुलाम और विचारों से बहुत गँवार होती हैं। उसे अकसर ऐसे अनुरोध प्राप्त होते रहते हैं, जिनमें महिलाएँ विनती करती हैं कि उनका सी-सेक्शन ठीक उनके द्वारा बताए गए ‘मुहूरत’ पर हो, जिसे ग्रहों और नक्षत्रों की अवस्थिति के अनुसार किसी पंडित ने निश्चित किया होता है, जिससे होने वाले बच्चे की बढ़िया से बढ़िया कुंडली तैयार हो सके।

इतना ही नहीं, स्वाभाविक ही ऐसी हालत में, लड़की पैदा करने वाली महिलाओं को सांत्वना देना भी उसका फर्ज़ बन जाता है। बहुत सी उच्च शिक्षा प्राप्त डिग्री धारी महिलाएँ, लड़के की अभिलाषा में लंबी प्रसव-पीड़ा सहन करती हैं और लड़की पैदा होने पर आँसुओं में डूब जाती हैं। ये आँसू पीड़ा-मुक्ति की खुशी के आँसू नहीं होते और न ही थकान के कारण बह रहे होते हैं बल्कि निराशा और अवसाद के कारण पैदा होते हैं। ‘लड़की पैदा हुई है’ वाक्य उनके अंदर किसी तरह की खुशी या उत्साह पैदा नहीं कर पाता!

अब आप ही देखिए कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि महिला पढ़ी-लिखी है या नहीं, पहले उसका कोई लड़का है या नहीं, उसकी धारणा भी यही होती है कि लड़की के मुक़ाबले लड़का अधिक मूल्यवान है। उसकी परवरिश इसी माहौल में हुई है, वह यही सुनते हुए बड़ी हुई है और वह जानती है कि उसका परिवार उससे एक लड़का पैदा करने की अपेक्षा कर रहा होगा।

जब हम बच्चों से उनके परिवार के विषय में कुछ पूछते हैं, जैसे यह कि क्या उनके चाचा या मौसी के बच्चे हैं तो वे इस तरह जवाब देते हैं: ‘उनकी तीन लड़कियाँ हैं, लड़का एक भी नहीं है’। लड़कियाँ अक्सर आपस में कहती रहती हैं कि हमारे घर की हालत बहुत खराब है क्योंकि ‘हम इतनी सारी बहनें हैं’। जब रमोना गर्भवती थी तब कम से कम दस लोगों ने कहा था: ईश्वर करे, लड़का ही हो’!

भारत विकास और प्रगति कर रहा है लेकिन ऐसे भयावह विचारों, रवैयों और मूल्यों से मुक्ति पाने की दिशा में अभी बहुत काम किया जाना बाकी है!

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