बुजुर्गों के लिए सबसे अच्छा निवास: संयुक्त परिवार – 23 सितम्बर 2014

भारतीय संस्कृति

कल मैंने बताया था कि, विशेष रूप से भारत में, बहुत से बुजुर्ग अक्सर युवा पीढ़ी के लोगों व्यर्थ ही ताने देते रहते हैं। स्वाभाविक ही यह भारतीय संयुक्त परिवारों में भी होता है, जहाँ अलग-अलग पीढ़ियों के लोग एक साथ रहते हैं। इसके बावजूद मैं मानता हूँ कि बुज़ुर्गों के लिए यही सबसे अच्छी व्यवस्था है!

भारतीय परंपरा में यह एक सामान्य बात है कि सम्मिलित परिवार में लोग इस तरह मिलजुलकर रहें: एक या कई बेटे अपने माता-पिता के घर में रहते हैं और वहीं अपना परिवार भी स्थापित कर लेते हैं और फिर एक दिन वह घर उनका हो जाता है। अभिभावक जब बूढ़े हो जाते हैं तब भी अपने बच्चों की मदद करते रहते हैं और अपने पोतों की देखभाल करते हैं।

दुर्भाग्य से संयुक्त परिवारों की यह संस्कृति भी समाप्त होती जा रही है। विशेष रूप से बड़े शहरों में आजकल ऐसी जगहें देखने को मिल जाती हैं जिन्हें सबसे पहले मैंने पश्चिम में देखा था और मुझे लगा था कि बुज़ुर्गों के लिए ये संस्थान अपने विचार में ही वे बेहद भयावह हैं। आजकल युवाओं को अपने अभिभावकों के साथ रहना पसंद नहीं है और जब वे बूढ़े हो जाते हैं तो उनके लिए कोई न कोई दूसरा इंतज़ाम करना ज़रूरी हो जाता है। मैं सिर्फ आशा ही कर सकता हूँ कि यह प्रवृत्ति भारत में उस सीमा तक नहीं पहुँचेगी जहाँ तक वह आज पश्चिमी समाजों में व्याप्त है।

जर्मनी में मैं कई ऐसे लोगों से मिला हूँ जो इस बात पर अफसोस ज़ाहिर करते हैं कि उन्हें अपने अभिभावकों या दादा-दादियों को बुज़ुर्गों के लिए निर्मित घरों में रहने के लिए भेजना पड़ा। इसके बावजूद कि वे उसी संस्कृति में पले बढ़े हैं, वे महसूस करते हैं कि यह व्यवहार बुज़ुर्गों को अपने लोगों से अलग-थलग कर देता है और उन्हें अपने प्रियकरों की स्नेहिल बाहों की जगह अपरिचितों के साथ सारा जीवन गुज़ारना पड़ता है। अभी हाल ही में मैं कुछ मित्रों से मिला हूँ, जिनके पास इस विषय में कुछ अलग करने का जज़्बा है। वे जल्द ही अपने माता-पिता के साथ रहना शुरू करना चाहते हैं, उनकी देखभाल करना चाहते हैं, जिससे उनके जीवन की संध्या खुशगवार हो सके, प्रेम के आलोक में उद्दीप्त हो सके।

एक बात निश्चित है: ज़्यादातर बुज़ुर्ग अपने परिवार के साथ रहकर मानसिक और शारीरिक रूप से अधिक सक्रिय रहते हैं। हमारे आश्रम में ही इसका सबसे अच्छा उदाहरण मौजूद है: मेरी नानी। उसकी उम्र 90 साल से भी अधिक है मगर आज भी वह पूरी तरह चुस्त-दुरुस्त है, रोज़ रसोई में जाकर जायज़ा लेती है कि वहाँ क्या चल रहा है, हर बच्चे पर उसकी नज़र रहती है, उसे आश्रम में होने वाली गतिविधियों का पूरा हाल विदित होता है और पूरे समय खिड़की के पास अपने पलंग पर बैठे हुए उसकी नज़र प्रवेश द्वार पर और सामने वाले हाल पर लगी होती है। उसका मस्तिष्क पूरी तरह चैतन्य है और कुल मिलाकर उम्र सम्बन्धी कुछ परेशानियाँ छोड़कर वह आज भी काफी स्वस्थ है।

स्पष्ट ही आश्रम में रहते हुए सोचने और करने के लिए उसके पास इतनी सारी बातें होती हैं कि उसके शरीर और मस्तिष्क को उस स्थिति में पहुँचने का मौका ही नहीं मिल पाता जहाँ पश्चिम में रहने वाले बहुत से बुजुर्गों को पहुँचा हुआ मैंने अपनी आँखों से देखा है। जैसे ही वे बुजुर्गों के लिए निर्मित घरों में पहुँचते हैं, भले ही पहले वे मानसिक रूप से कितने भी स्वस्थ क्यों न हों, अक्सर सोचना कम देते हैं और उनकी मानसिक सक्रियता कम से कमतर होती जाती है और इसका कारण यह होता है कि पहले से वहाँ रहने वाले बुज़ुर्ग भी इसी हालत में होते हैं। वे निठल्लों की तरह अपनी व्हील चेयर या आराम कुर्सी पर बैठे शून्य में कहीं देखते रहते हैं या अपने आप से बातें करते रहते हैं। जब कोई सामान्य समझदार व्यक्ति उनमें शामिल होता है और उसे बात करने वाला कोई नहीं मिलता तो आश्चर्य नहीं कि वह भी उनके जैसा ही हो जाता है!

मैं इस विषय पर अक्सर लिखता रहा हूँ और वही बात पुनः दोहराता हूँ: क्या आप नहीं समझते कि अपने प्रियकरों की प्यार भरी देखरेख में रहकर वे ज्यादा प्रसन्न होंगे? अपरिचितों के बीच नहीं, भले ही वे उनके समवयस्क हों, भले ही देखभाल और स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों के लिए पैसे देकर वहाँ नर्स और पेशेवर डॉक्टर उपलब्ध हो जाते हों?

नहीं, मेरी नज़र में बुजुर्गों के लिए संयुक्त परिवार हर तरह से उपयुक्त हैं और मेरा विश्वास है कि अपने मित्र के साथ हुई मेरी बातचीत भविष्य में सत्य होकर रहेगी: कि पश्चिम में भी स्थिति में परिवर्तन होगा और लोग एक-दूसरे की मदद करते हुए एक साथ रहना शुरू करेंगे और बुजुर्गों के लिए सुख-सुविधा युक्त विशालकाय इमारतें बनाकर अपने कर्तव्य और प्रेम की इतिश्री नहीं समझेंगे!

संभव है, आप सोच रहे हों कि कुछ लोगों की फितरत ही अलग होती है और वे उस माहौल में परिवार के साथ रहने के लिए तैयार ही नहीं होंगे। कल के ब्लॉग में मैं इसी विषय पर लिखना चाहूँगा।

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