बच्चों को छेड़ना (चिढ़ाना) बंद करें – यह कोई मज़ाक की बात नहीं है कि वे डर रहे हैं! 16 अप्रैल 2014

भारतीय संस्कृति

कभी-कभी ऐसा लगता है, खासकर भारत में, कि जैसे लोग बच्चों कि प्रतिक्रिया को समझ ही नहीं पाते। या फिर उनकी भावनाओं की परवाह नहीं करते। दरअसल वे सिर्फ अपने मन-बहलाव के लिए बच्चों की प्रतिक्रिया अर्जित करने का प्रयास करते हैं, बिना यह सोचे कि इससे बच्चों पर क्या असर होगा। वे बच्चों को डराने की कोशिश करते हैं, उन्हें चिढ़ाते हैं: डरे हुए या चिड़चिड़ाए बच्चे की प्रतिक्रिया पर हंसने के लिए, उसका मज़ाक उड़ाने के लिए। लेकिन इससे उन पर होने वाले नकारात्मक असर का क्या किया जाए? कभी आपने इस बात पर सोचा है?

बच्चों को चिढ़ाने और उन्हें परेशान करने के इन तरीकों के बारे में मैंने पहले भी लिखा है। भारत में यह आम बात है लेकिन हाल ही में घटित एक घटना के बाद मैंने सोचा कि इसी अनुभव को मैं अपने अगले उदाहरण के रूप में प्रयुक्त करूँ!

अपनी माँ और अपने एक चाचा के साथ अपरा हमारी एक मित्र से मिलने अस्पताल गई थी। इस मित्र ने कुछ दिन पहले ही एक सुंदर बच्चे को जन्म दिया था और स्वाभाविक ही अपरा उसे देखने के लिए बेताब थी। जैसे ही वे अस्पताल पहुंचे उनकी मुलाक़ात एक महिला डॉक्टर से हो गई। थोड़ी सी बातचीत के बाद यह डॉक्टर अपरा से पूछने लगी: ‘क्या तुम भी बच्चे को देखने आई हो?’ अपरा ने हाँ में सिर हिलाया। ‘क्या तुम अपने मम्मी-पापा के साथ आई हो?’ अपरा ने कहा, नहीं, अपने चाचा के साथ। ‘ओह, अपने चाचा के साथ! तुम्हें पता है, हम तुम्हारे चाचा को अपने यहाँ रख लेंगे! ठीक है?’

ये क्या? आप अभी-अभी पहली बार मेरी बेटी से मिले हैं, वह आपको नहीं जानती और आप भी उसे नहीं जानते और न ही उसके चाचा को- आप कैसे इस तरह की बात कर सकती हैं? मगर मैं जानता हूँ कि क्यों ऐसी बातें की जाती है: आप मेरे बच्चे की प्रतिक्रिया देखना चाहते हैं और अगर वह डर जाए तो आपको मज़ा आता है। अपरा को कुछ समझ में नहीं आया और उसने सिर्फ इतना कहा, ‘चलो, चलकर बच्चे को देखते हैं।’

जब वह उस नवजात शिशु के पास पहुंची तो उसे देखकर दंग रह गई। उसने उसके नर्म गालों को हल्के से थपथपाया और उसका नन्हा सा हाथ अपने हाथों में ले लिया। वह थोड़ा झुकी और शिशु के माथे पर हल्का सा चुंबन लिया। उसकी हरकतें इतनी प्यारी और मासूम थीं कि कमरे का हर व्यक्ति भावुक हो उठा। मगर तभी शिशु की माँ ने ऐसा कुछ कहा कि अचानक अपरा का मूड खराब हो गया: ‘तो अब तुम यहीं रहोगी और तुम्हारी माँ और चाचा चले जाएंगे।

इसका वर्णन करना बहुत मुश्किल है कि यह सुनकर रमोना को कितना बुरा लगा। सारा प्रेम और कोमल भावनाएँ, शिशु के लिए अपरा की आँखों में आया विस्मय एक झटके में गायब हो गया। वह अब वहाँ एक मिनट भी रुकने के लिए तैयार नहीं थी। उसकी जगह उसने रमोना का हाथ पकड़ा और कहा, ‘चलो, घर चलें!’ उसकी आँखें अपने चाचा को ढूँढ़ने लगीं, जो दरवाजे के पास खड़ा फोन पर किसी से बात कर रहा था। मगर शिशु की माँ की ओर से एक और झटका मिलना बाकी था: ‘तुम्हारे चाचा तो चले गए। कार भी ले गए- अब तुमको यहीं रहना पड़ेगा!’

अब रमोना कितना ही उसे समझाती रही कि कार बाहर खड़ी है और चाचा भी बाहर फोन पर बात कर रहे हैं, कि वे लोग पैदल घर जा सकते हैं या बाहर निकलकर रिक्शा ले सकते हैं और यह भी कि वह उसे कभी, कहीं छोड़कर नहीं जाएगी, अपरा पल भर के लिए भी वहाँ रुकने के लिए तैयार नहीं थी। शिशु में उसकी कोई रुचि नहीं रह गई थी, बस एक ही बात: चलो घर चलो!

अब इस बात पर विचार कीजिए कि आपने उस दो साल की बच्ची पर अपनी क्या छाप छोड़ी! आपने जीवन का एक चमत्कारिक कौतुक उससे छीन लिया, उसे उस अनमोल अनुभव का पूरा आनंद नहीं लेने दिया और उसके स्थान पर अपनी झूठी बातों से उसे डराने की कोशिश कर रही हैं। हाँ, यह एक झूठ था, जिसे वह सीख रही है और जब वह कुछ बड़ी हो जाएगी तो इस मज़ाकिया झूठ को अपने जीवन में आजमाएगी। लेकिन फिलहाल वह सोच रही है कि आप उसे ज़बरदस्ती वहां रोकना चाहती हैं, उसकी माँ से और उसके चाचा से उसे दूर करना चाहती हैं। यही आप चाहती भी थीं- लेकिन इसमें मज़ाक की क्या बात है? वह अपनी माँ और अपने चाचा को छोड़कर आपके साथ इस अस्पताल में क्यों रहना चाहेगी, जो आप ऐसा कह रही हैं?

जब वे उस कमरे से बाहर, उस महिला से दूर हुए तभी अपरा का मूड ठीक हुआ। वह अपनी माँ की गोद से नीचे उतरी और कुछ देर अस्पताल के बगीचे में खेलती भी रही। लेकिन हमारे दिलों में एक फांस गड़ी रही, इस बात का एहसास कि हम इतने खूबसूरत मौके का पूरा आनंद लेने से वंचित रह गए। इतने दिनों बाद, आज भी यह ब्लॉग लिखते हुए मेरा दिल भर आया है। यह सोचकर कि मेरी नन्ही बच्ची को उस वक़्त कैसा लगा होगा! आप लोग बच्चों की कोमल भावनाओं के प्रति संवेदनशील क्यों नहीं हैं?

अगर आपने कुछ न कहा होता, सिर्फ इतना किया होता कि अपना मुंह बंद रखा होता और चुपचाप दोनों नन्हें बच्चों को आपस में खेलता देखते रहते तो हमारी बेटी पर बहुत खूबसूरत स्थाई प्रभाव पड़ सकता था। तब वह चमकती आँखों और उत्साह से वहाँ की सारी बातें हमें बताती। उस सुन्दर भावना को आपने नष्ट कर दिया, उस अनुभव का आपने सत्यानास कर डाला।

एक अनावश्यक मजाक के लिए! अपने पल भर के मनोरंजन के लिए! अपनी इस बेहूदा आदत के चलते। और सबसे दुखद बात यह कि आपको इसका एहसास भी नहीं है।

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