कल हमें वापस भारत के लिए रवाना होना है और आज हम उस यात्रा की तैयारी में व्यस्त हैं। हम अब वापसी के लिए उतावले हो रहे हैं और हमारा बोरिया-बिस्तर तैयार है!
कल मैंने एक साधु का उदाहरण देते हुए समझाया कि अनासक्ति का क्या अर्थ होता है। आज मैं एक साधु के जीवन के बारे में कुछ विस्तार से बताना चाहता हूँ कि उससे भारतीय संस्कृति के बारे में क्या पता चलता है और हम कितने कम साधनों में जीवन गुज़ार सकते हैं। आज भी लाखों लोग हैं जो इस प्रकार का जीवन जीते हैं। जैसा कि मैंने कल बताया उनकी किसी चीज़ में कोई आसक्ति नहीं होती। लोगों से नहीं, किसी स्थान से नहीं या किन्ही भौतिक चीजों से भी नहीं। अगर आप किसी साधु से पूछें कि आप कहाँ के रहने वाले हैं या आपके माता-पिता कौन हैं तो वे नाराज़ हो जाएंगे, बल्कि अपमानित महसूस करेंगे। सभी जानते हैं कि वे ऐसी बातों के बारे में बात करना पसंद नहीं करते और इन सब बातों से अनासक्त हो चुके हैं।
एक कहावत है: वे पेड़ के नीचे रहते हैं और हाथ में खाते हैं। खासकर वृंदावन में यह एक पवित्र परंपरा है और जब कोई साधु आपके द्वार पर आता है तो उसे अच्छी से अच्छी चीज़ें खाने को दी जाती हैं। बचपन में एक साधु अक्सर हमारे घर आया करता था। साधु आपके घर आता है और दरवाजा खटखटाता है लेकिन वह अंदर नहीं आता। अगर आ जाए तो घर का मालिक इतना कृतकृत्य हो जाता है जैसे ईश्वर ही चलकर उसके यहाँ आ गए हों। फिर उसके हाथ में अधिक से अधिक वस्तुएं रख दी जाती हैं क्योंकि वह थाली में कोई चीज़ नहीं लेता। मेरी माँ हमेशा उसके हाथ पर सबसे पहले रोटी रखती थीं फिर उस पर चाँवल फिर सब्जी और दाल परोसती थीं। वह अधिक से अधिक जितना उसके हाथ में आ सकता था रखती जाती थीं और वह अपने हाथ से सीधे खा लेता था। और मेहरबानी करके याद रखें, इसे भीख मांगना नहीं माना जाता! उसे खिलाकर सभी को खुशी होती है। वे ऐसा जीवन जीते हैं कि उन्हें भोजन से भी कोई आसक्ति नहीं होती। उनका सिर्फ एक काम होता है, ईश्वर को अपना जीवन समर्पित कर देना और आध्यात्मिक रूप से ध्यानमग्न होकर ईश्वर के साथ एकात्म हो जाना। उनके पास कोई सामान नहीं होता; वह ऐसे ही रहते हैं, किसी तालाब या नदी में नहा लेते हैं। साधु अपनी आवश्यकताओं को एक एक करके कम करते जाते हैं और गाँव-गाँव घूमते रहते हैं जिससे किसी एक स्थान से उन्हें लगाव या मोह न हो जाए। और कोई भी इस जीवन का चुनाव कर सकता है। मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूँ जो एक सफल वकील थे, काफी अमीर थे कि जो चाहते प्राप्त कर सकते थे; मगर एक दिन अचानक वे साधु हो गए। वे अपना घर-बार छोडकर और ईश्वर में ध्यान लगाते हुए जीवन बिताने के अपने निर्णय से बहुत खुश थे। मैंने स्वयं भी अपने जीवन का काफी समय साधु बनकर इसी तरह गाँव-गाँव घूमते हुए गुज़ारा है। मैं समझता हूँ कि अपना सर्वस्व अपने ईश्वर, यानी प्रेम को समर्पित करते हुए आज भी मैं वही साधु का जीवन जी रहा हूँ। हमने आखिरी दिन एक अनुष्ठान का आयोजन किया और यूरोप की अपनी यात्रा सम्पन्न की।
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