धर्म और दहेज परंपरा लड़कियों को अवांछित बना देते हैं – 29 मार्च, 2011

भारतीय संस्कृति

कल मैंने आपको भारत में प्रचलित दहेज प्रथा के बारे में बताया था कि कैसे वह भारत की बहुत सी समस्याओं का प्रमुख कारण है। उदाहरण के लिए दहेज के कारण ही बहुत से दंपति संतान के रूप में लड़का ही चाहते हैं, लड़की नहीं। मैं इसे विस्तार से समझाता हूँ।

यह एक सामान्य बात है कि शादी के बाद लड़की अपना घर छोडकर अपने पति के घर चली जाती है। इस तरह विवाह एक बहुत बड़े उत्सव की तरह होता है और लड़की के माता-पिता उस दिन अपनी लड़की को हमेशा हमेशा के लिए बिदा करते हैं। मैंने आपको पहले ही बताया था कि दूल्हे को दिये जाने वाले तोहफे कैसे पहले से तयशुदा नगदी में बदल गए। मैंने विस्तार से वर्णन किया था कि एक अमीर लड़की का परिवार कई कारें, सोने के जेवरात और ऊपर से बहुत सी नगदी दूल्हे और उसके परिवार को दे सकता है। जब अमीर परिवार अपने बच्चों का विवाह करते हैं तो यह एक आश्चर्यजनक दृश्य होता है। मगर क्या होता है जब लड़की का परिवार उतना अमीर नहीं होता?

भले ही लड़की का परिवार अमीर न हो तब भी वे कोशिश करते हैं कि अपनी लड़की के लिए अच्छा, खाता-पीता वर खोजें। वे वास्तव में यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनकी लड़की का जीवन सुखी हो और क्योंकि अच्छा दहेज लड़की के लिए सुख के पर्याप्त साधन जुटा सकने वाली अच्छी नौकरी करने वाला पति उपलब्ध करा सकता है, वे दहेज में अच्छी रकम देने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।

जब बच्चा पैदा होता है और वह लड़की है तो अभिभावक शुरू से रुपये बचाना शुरू कर देते हैं। इस परंपरा के चलते कई कंपनियां बचत की योजनाएं लेकर उनके पास आती हैं। लेकिन कुछ लोग ज़्यादा बचत करने में असमर्थ रहते हैं और इसलिए जब विवाह का दिन नजदीक आता है पर्याप्त धन इकट्ठा करने के लिए वे जगह-जगह से उधार ले लेते हैं। कुछ लोग अपनी पुश्तैनी जायदाद बेच देते हैं क्योंकि यह उनकी लड़की के जीवन का एकमात्र ऐसा मौका होता है। इसलिए अगर पैदा होने वाला बच्चा लड़की है तो वे समझते हैं कि उन्हें तुरंत बचत करना शुरू कर देना चाहिए और अगर लड़का है तो खुश होते हैं कि आगे चलकर उसके विवाह के वक़्त ‘बच्चे की कीमत’ लगाकर वे अच्छा धन प्राप्त कर सकते हैं। लड़के अपने ही परिवार में रहते हैं, अक्सर अपने पिता का कारोबार संभालते हैं, पारिवारिक नाम धारण करते हैं और इस तरह अपने परिवार की परंपरा का निर्वाह करते हैं। पुत्र और उसका परिवार अपने माता-पिता की वृद्धावस्था में उनकी देखभाल करने के लिए तत्पर रहते हैं। इन सब महत्वपूर्ण बातों के अलावा सबसे बड़ी बात यह कि उन्हें लड़की द्वारा लाया जाने वाला दहेज प्राप्त होता है!

यहाँ तक कि हिन्दू धर्म भी लड़के पैदा करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहता है कि इसके बगैर दो जन्मों के बीच स्वर्ग की यात्रा वे नहीं कर पाएंगे। आपका वंश लुप्त हो जाएगा और मरने पर आपके शरीर को अग्नि देने वाला कोई नहीं होगा क्योंकि सिर्फ पुरुषों को अपने पूर्वजों का अंतिम संस्कार करने की इजाज़त है। हिन्दू धर्म में इस तरह की बहुत सी भ्रांतियाँ हैं जिनके कारण लोग लड़का ही पैदा करना चाहते हैं लड़की नहीं।

लड़कों के लिए इस प्राथमिकता के चलते डॉक्टरों द्वारा अल्ट्रासाउंड मशीनों की सहायता से गर्भस्थ शिशु के लिंग की जांच को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है। इस कानून से सिर्फ लिंग की बिना पर गर्भस्थ कन्या-भ्रूणों के गर्भपात को रोका जा सकेगा।

तो इसलिए भारतीय माँ-बाप बार-बार कोशिश करते हैं कि उन्हें पुत्र की प्राप्ति हो कन्या की नहीं। दुर्भाग्य से महिलाओं पर इस बात का बड़ा दबाव रहता है और उनके पास इस बात का कोई उपाय नहीं होता कि वे हर हाल में लड़का पैदा करने में ‘सफल’ हो जाएँ। अगर वह किसी प्रेमपूर्ण और समझदार परिवार में ब्याही नहीं गई है और लड़की को जन्म देती है तो वह तुरंत अपने सास-ससुर की कोपभाजन बन जाती है। उनका यह गुस्सा कटु वचनों में प्रकट होता है और हिंसक भी हो सकता है।

यह एक और कारण है कि समाज से दहेज की प्रथा का समूल उच्चाटन किया जाए।

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