बलात्कार के लिए स्त्री के वस्त्र और व्यवहार को दोष देना बलात्कारिक मानसिकता का नमूना है – 8 जनवरी 13

कल मैंने आपसे दिल्ली में पिछले दिनों हुए सामूहिक बलात्कार की घटना पर बात की थी और सरकारी राजनेताओं व अन्य महत्वपूर्ण लोगों के बयान पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी। ऐसे बयानों की बाढ़ सी आ गई है कि ऐसा क्यूं हुआ और क्या किया जाना चाहिए ताकि ये दुबारा न हो। मैंने एक राजनेता को सुना जिनके अनुसार स्त्रियों को शाम में घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। कई और राजनेताओं ने कहा कि स्त्रियों को भड़काऊ वस्त्र नहीं पहनना चाहिए और इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे अकेली बाहर न जाएं। एक ने तो यह तक कहा कि देश भर की सभी स्त्रियों के लिए एक ड्रेस-कोड बनाया जाना चाहिए।

ये बातें मूर्खतापूर्ण तो हैं हीं साथ ही निराश भी करती हैं कि हमारे राजनेता बलात्कारी पर ऊंगली उठाने की बजाए पीड़ित को ज़िम्मेदार ठहराने लगते हैं। स्त्रियों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे क्या पहनती हैं, कहां जाती हैं, अकेली जाती हैं, ये सब कहने का तो मतलब यह हुआ न कि लड़की के अपने दोष की वजह से उसका बलात्कार हुआ न कि बलात्कारियों की वजह से? उसने उन्हें बलात्कार के लिए उकसाया। मैंने पहले भी इन मुद्दों पर बहुत लिखा है और यह मानता हूं कि जो पुरुष ऐसी सोच रखते हैं उन्हें ख़ुद पर शर्म आनी चाहिए। आप पुरुष हैं, यही है आपका पुरुषार्थ? एक सुन्दर स्त्री को देखते ही आप अपना नियंत्रण खो बैठते हैं लेकिन लेक्चर ये देते हैं कि स्त्रियों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं! अपनी पतलून पर ताला क्यूं नहीं डाल लेते या, अगर आपके शरीर का कोई अंग आपके नियंत्रण में नहीं तो उसे काटकर फेंक क्यूं नहीं देते! कमज़ोर कौन है, दूसरे की त्वचा देख लेने भर से कौन अपना नियंत्रण खो बैठता है? ऐसी बयानबाज़ी का मतलब है कि आप यह मानते हैं कि एक स्त्री अगर आपके पैमाने के हिसाब से ग़लत वस्त्र पहनती है तो उसका बलात्कार एक सहज घटना है। यह ठीक बलात्कारियों वाली मानसिकता है, जो अपने किए-धरे के लिए उल्टा दूसरे को दोष देता है।

ठीक यही सोच एक अन्य लोकप्रिय व्यक्ति की है: आसाराम बापू, एक प्रसिद्ध भारतीय गुरू जो अतीत में भी समाचारों में कई विवादों की वजह से आते रहे हैं, ने एक बयान दिया जिसे हजम कर पाना लोगों के लिए टेढ़ी खीर थी! उन्होंने स्पष्ट लहजे में कहा: “पीड़िता बेटी इस घटना के लिए बराबर की ज़िम्मेदार है…अगर उसने दोषियों को भाई कहकर पुकारा होता और उन्हें मना करने के लिए गिड़गिड़ाती…तो उसकी इज़्ज़त और ज़िंदगी दोनों बच जाती” यह एक ऐसा शर्मनाक बयान है जो अपने आप में इस व्यक्ति की बीमार मानसिकता को बताने के लिए काफ़ी है।

अख़बार की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत में होने वाले 93% बलात्कार उन लोगों के द्वारा किया जाता है जिन्हें पीड़ित जानती हैं। परिजन, रिश्तेदार, दोस्त, पड़ोसी या सहकर्मी। वैसे लोग जिन्हें लड़की पहले से जानती थी और जो लड़की को पहले से जानते थे। अब बताइए कि ऐसे में कौन-सा वस्त्र या कैसी हरकतें इसके लिए ज़िम्मेदार हैं? सब कुछ घर पर होता है, वो किसी ख़तरनाक परिवेश में नहीं गई, उसने कुछ ऐसा नहीं पहना जो मां-बाप को नागवार गुज़रे। उसे बस इस बात की क़ीमत चुकानी पड़ रही है कि वह एक स्त्री है और कुछ पुरुषों को साबित करना है कि स्त्रियों पर उनका स्वामित्व है।

अख़बारों की रिपोर्ट बताती हैं कि कैसे पिता, ससुर, जेठ, भाई और चाचा न सिर्फ़ व्यस्क स्त्रियों का बल्कि छोटी बच्चियों तक का बलात्कार करते हैं! अगर आपको लगता है कि बलात्कार के लिए वस्त्र ज़िम्मेदार है तो बताइए कि दो साल की इन बच्चियों ने ऐसा क्या पहना था जिससे वे इतने उत्तेजित हो गए कि उनका बलात्कार करने के अलावा उन्हें कुछ और सूझा ही नहीं? वे कहां गए थे, किस बार में, कौन-से डिस्को में?

इस चलन को रोकना होगा जिसमें लोग स्त्रियों और लड़कियों को ही उन अपराधों के लिए ज़िम्मेदार ठहरा देते हैं जिनकी यातना भी उन्हें स्वयं ही भुगतनी पड़ती है। बलात्कार को सह पाना ही बहुत है, अब उन्हें इस बात के लिए ज़िम्मेदार मत ठहराइए कि इसकी वजह भी वे खुद ही थीं, कि उन्होंने बलात्कारियों को उकसाया। मेरे विचार में धर्म और संस्कृति में निस्संदेह ऐसी कई चीज़ें हैं जिन्हें दोष दिया जाना चाहिए! मैं आगे इस पर भी लिखूंगा।

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