आज एरिक का जन्मदिन था। वह लक्सम्बर्ग का रहने वाला है और एक माह से हमारे आश्रम में रह रहा है और विद्यार्थियों की मदद करता है। हमने उसका जन्मदिन मनाया और केक और उपहारों के साथ उसे शुभकामनाएँ दीं तो वह भौंचक्का रह गया। वह खुश हुआ तो मुझे भी अच्छा लगा।
मेरे मित्र रोजर और मैडी कस्बे की तरफ घूमने निकल गए। जब वे एक नाई की दुकान की फोटो खींचने लगे तो नाई ने हाथ देकर उन्हें रोका और पैसे मांगने लगा क्योंकि उन्होंने फोटो लिए थे! रोजर ने कहा कि अगर वह पैसे चाहता है तो उसे कुछ काम भी करना पड़ेगा; चलो, मेरी दाढ़ी बना दो। तो इस तरह रोजर ने जीवन में पहली बार किसी दूसरे से दाढ़ी बनवाने का मज़ा लिया। एलेक्ट्रिक शेवर से नहीं, बल्कि ब्लेड से। दाढ़ी बनवाने के बाद और मसाज करवाने के बाद रोजर ने उससे दाम पूछा तो नाई ने उससे 100 रुपए मांगे जोकि आम तौर पर 5 रुपए से ज़्यादा का काम नहीं होता। चलो ठीक है, रोजर ने दे दिये क्योंकि उसे पता ही नहीं था कि इतने काम का वास्तविक मेहनताना कितना होता है और उसे लगा कि सिर्फ 2 यूरो तो देना है! जब हमने बताया कि उसने 95 रुपए ज़्यादा दे दिये हैं तो वह खूब हंसा। उसने कहा, ‘शायद इससे वह नाई एक दिन के लिए काफी अमीर हो गया होगा और मैं इतने से गरीब नहीं हो जाने वाला!’ उसकी यह भावना मुझे प्रभावित कर गई लेकिन दूसरी तरफ मुझे लगा कि भारत में किसी चीज़ के दाम बड़े विचित्र होते हैं। कोई विदेशी आता है, जो अपने सफ़ेद रंग से आसानी से पहचान लिया जाता है तो उससे दुगने से ज़्यादा दाम वसूल किए जाते हैं। हालांकि, यूरोप के मुकाबले यह फिर भी सस्ता ही है। और ऐसे ही यह चलता है। उनको मोलभाव करना होगा और उसके बावजूद उनको उस कीमत पर कोई चीज़ नहीं मिलेगी जो एक भारतीय को मिलती है।
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