महज़ बुजुर्ग होना आपको बुद्धिमान नहीं बनाता इसलिए थोड़ी नम्रता प्रदर्शित कीजिए! 22 सितम्बर 2014

भारतीय संस्कृति

आज से मैं एक नए विषय पर लिखने की शुरुआत करना चाहता हूँ, जो हम सबके लिए बहुत महत्वपूर्ण है चाहे वे किसी भी उम्र के हों। विषय है: युवा और वृद्धों के बीच सम्बन्ध-हमसे पहले वाली पीढ़ी, हमारी पीढ़ी और हमारे बाद आने वाली पीढ़ी के आपसी संबंधों के बारे में। आज मैं विशेषकर बुज़ुर्ग पुरुषों और महिलाओं के बेहद नकारात्मक रवैये के बारे लिखकर इस विषय का आगाज़ करूँगा: वे सोचते हैं कि सिर्फ उम्रदराज़ होने के कारण न सिर्फ वे दुनिया के सबसे अधिक समझदार व्यक्ति हो गए हैं बल्कि उन्हें यह अधिकार भी मिल गया है कि दूसरे सभी लोगों को मूर्ख घोषित कर दें।

मुझे लगता है कि अक्सर भारत के बुजुर्गों का जीवन तुलनात्मक रूप से दुनिया के दूसरे बुज़ुर्गों से बेहतर है। सम्मिलित परिवारों की परंपरा आज भी काफी हद तक जीवित है और युवा पीढ़ी आज भी मानती है कि अपने माता-पिता और दादा-दादियों की देखभाल करने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की है। इसीलिए अधिकतर मामलों में वे सामान्य रूप से अपने बाल-बच्चों और नाती-पोतों के साथ जीवन व्यतीत करते हैं और इस तरह खाना बनाने, बच्चों की देखरेख जैसे घर के छोटे-मोटे कामों में और अपने ज्ञान और अनुभव के द्वारा शक्ति भर परिवार के मददगार होते हैं।

इसके अलावा भारत में बुजुर्गों का आदर एक बहुत महत्वपूर्ण मूल्य के रूप में स्थापित है और बिल्कुल बचपन से ही जिस तरह उसे घुट्टी में पिलाया जाता है वह पश्चिमी देशों में अक्सर देखने को नहीं मिलता। इस विषय में अक्सर दिखाई देने वाली दिक्कतों का ज़िक्र करने से पहले मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ वास्तव में मैं इस परम्परा का समर्थक हूँ और इस पर मुझे बहुत गर्व भी है। मुझे लगता है कि निश्चय ही हमें उन लोगों के साथ एक घर में परिवार सहित रहना चाहिए, जो जीवन की राह में हमसे लम्बी यात्रा करके यहाँ तक पहुँचे हैं। लेकिन बुजुर्गों को भी चाहिए कि वे भी युवा पीढ़ी का आदर करें!

दुर्भाग्य से अक्सर ऐसा नहीं होता। भारत में यह एक सामान्य बात है कि माँ-बाप जब समझते हैं कि बच्चे कोई गलत कदम उठा रहे हैं तो खुले आम निस्संकोच उन्हें आगाह करते हैं। आदर्श स्थिति में बेटा अपने पिता की बात ध्यान से सुनता अपनी गलती को स्वीकार करता और स्वयं को बदलने का प्रयास करता है। साथ ही बच्चों की गलतियों पर उन्हें टोकने, उन्हें डाँटने-फटकारने का अधिकार सिर्फ खून के रिश्ते वालों तक ही महदूद नहीं है! सांस्कृतिक परंपरा से ही आपसे उम्र में बड़ा कोई भी व्यक्ति ‘आपको सुधारने’ की ज़िम्मेदारी वहन कर सकता है और अपने ज्ञान और अधिकार का रुतबा आप पर झाड़ सकता है। यह भी भारतीय संस्कृति और परंपरा का हिस्सा है कि आप अगर उम्र में छोटे हैं तो जो कहा जा रहा है उसे चुपचाप सुनें और उसके विरुद्ध कुछ न कहें। यह उम्र में आपसे बड़े उस व्यक्ति का घोर अपमान माना जाता है!

परन्तु समस्या यह है कि यह आवश्यक नहीं कि उम्र बढ़ने के साथ हर व्यक्ति समझदार या ज्ञानी भी हो जाए। या फिर नम्र। कुछ समय पहले मुझसे एक बुज़ुर्ग पारिवारिक मित्र ने कहा कि मेरी उम्र अभी राजनीति पर बात करने की नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि मुझे अपने राजनीतिक विचारों के लिए शर्मिंदा होना चाहिए। मेरे लिए यह अपमान की बात थी मगर वे सोच रहे थे कि उम्र में मुझसे बड़े होने के कारण उन्हें यह अधिकार प्राप्त है। यह अपने आपमें ही हास्यास्पद बात है, विशेष रूप से तब जबकि भारत में वोट देने की उम्र 18 वर्ष निर्धारित की गई है और मैं लगभग 43 का हो चुका हूँ और वोट देने की उम्र कुछ साल पहले ही पार कर चुका हूँ।

आज मैं उन सभी लोगों से, जो यह ये पंक्तियाँ पढ़ रहे हैं एक अपील करना चाहता हूँ: यह मत समझिए कि सिर्फ अधिक उम्र होने से ही आप बेहतर हो गए, ज्यादा बुद्धिमान हो गए या आपको किसी का अपमान करने का अधिकार मिल गया है। अगर आप बड़े हैं तो आप अपनी समझदारी, ज्ञान और अनुभव अपने से छोटी उम्र के लोगों के साथ साझा कर सकते हैं मगर नम्रता के साथ। लेकिन किसी भी हालत में यह न सोचिए कि सामने वाला सिर्फ इसलिए मूर्ख है कि उसका जन्म आपसे कुछ साल या कई साल बाद हुआ है!

अगर आप उम्र में छोटे हैं और आपको नम्रतापूर्वक कोई सलाह दी जा रही है तो उसे आदर के साथ ध्यानपूर्वक सुनिए, सोचिए कि क्या उनकी बात आज के आधुनिक समय में भी प्रासंगिक और कारगर है और फिर उनकी सलाह का शुक्रिया अदा कीजिए। अगर आपने सलाह मांगी नहीं थी, अगर वह अपमानजनक है और आपको लग रहा है कि उससे आपको मदद मिलने की जगह सलाह के बहाने आप पर धौंस जमाई जा रही है तो उन्हें साफ़ साफ़ बता दीजिए। इस विषय में संकोच मत कीजिए कि लोग आपको मुँहफट कहेंगे!

आदर दोनों ओर से होना चाहिए और अधिक उम्र किसी को दूसरों का अपमान करने का अधिकार नहीं देती!

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