लड़की के लिए जींस और बहू के लिए साड़ी? – 30 अप्रैल 2013

भारतीय संस्कृति

कल मैंने एक शादीशुदा महिला और उसके सास-ससुर के बीच मौजूद समस्याओं के बारे में लिखना शुरू किया था। उनके बीच झगड़े और समस्याएं होना आम बात है और अक्सर हम देखते हैं की बहू के लिए यह ऐन मुमकिन होता है कि वह अपने पति को घर छोडकर परिवार और माँ-बाप से अलग रहने के लिए मना ले। कई मामलों में ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि महिला की पहले से परिवार तोड़ने की इच्छा थी लेकिन मेरे विचार में सारा दोष उस पर मढ़ना उचित नहीं है और ज़रा सास-ससुर और परिवार के दूसरे लोगों के व्यवहार पर नज़र डालना भी आवश्यक है।

मैंने अकसर एक बात देखी है जो किसी भी स्वस्थचित्त व्यक्ति को क्रुद्ध करने के लिए काफी है और वह यह कि वे अपनी बहू के मुकाबले अपनी बेटी के साथ बिल्कुल अलग और विपरीत व्यवहार करते हैं।

हो सकता है कि आप में से कुछ लोगों को बुरी सौतेली माँ द्वारा सौतेली लड़की की प्रताड़ना और अपनी सगी लड़की के साथ पक्षपात वाली परिकथा का ध्यान आ जाए मगर दुर्भाग्य से यह तुलना जितनी बेतुकी दिखाई देती है उतनी है नहीं। सास-ससुर और पति सहित उसका पूरा परिवार ही दरअसल अपनी लड़की और उस महिला के, जिसने अभी अभी उनके परिवार में कदम रखा है, संबंध में दोहरे मानदंड अपनाते हैं।

उन परी कथाओं की तरह बाहर से यह उतनी हृदयविदारक न लगे या दिखाई ही न दे मगर दोनों में कई सुस्पष्ट समानताएँ होती हैं। जैसे एक तो यही कि पारंपरिक परिवारों में शादीशुदा महिला साड़ी ही पहनती हैं। कई परिवारों में, जिन्हें मैं जानता हूँ, बहू को दूसरी तरह के कोई वस्त्र पहनने की इजाज़त नहीं दी जाती। खुद की लड़की, शादीशुदा हो या कुंवारी, जैसे कपड़े चाहे पहन सकती है-शलवार सूट या जींस-टीशर्ट भी। कोई उस तरफ ध्यान नहीं देता, न परवाह करता है।

साड़ी पहनने की पाबंदी के अलावा कई रूढ़िवादी परिवार उससे अपने पति के भाइयों, ससुर और बुजुर्ग मेहमानों के सामने अपना सिर और चेहरा ढंकने का आग्रह भी करते हैं। साड़ी बनी ही इस तरह होती है कि महिलाएं उसे अपने सिर पर और चेहरे पर पर्दे की तरह ओढ़ सकती हैं। इसे सम्मान का सूचक माना जाता है जिसे मैं, व्यक्तिगत रूप से निरर्थक मानता हूँ लेकिन जो उन अभिभावकों को बहुत महत्वपूर्ण लगता है जो पुरानी भारतीय संस्कृति को सुरक्षित रखना चाहते हैं। सिर्फ बहू के मामले में, अपनी लड़की के मामले में नहीं!

सामान्यतः यह दोहरा व्यवहार आप हमेशा देख सकते हैं। न सिर्फ वे अपने लड़के और लड़कियों को अलग तरह से पालते, बड़ा करते हैं बल्कि इन दो महिलाओं के बीच भी बहुत भेद करते हैं, भले ही वे दोनों एक ही उम्र की क्यों न हों। अपनी लड़की को वे बाहर जाने की, नौकरी करने की, बाहर निकलकर व्यवसाय करने, और पैसा कमाने की इजाज़त देते हैं, अर्थात, घर के कामों से इतर भी वह अपना समय गुज़ार सकती है, सहेलियों को घर बुला सकती है। मगर बहू को कहीं और काम करने की इजाज़त नहीं होती। अगर वह कभी इस बात की चर्चा करती है तो उसे समझाया जाता है कि यह उसकी ज़िम्मेदारी के बाहर की बात है और उसे घर संभालना चाहिए। वह कितना भी समझाने की कोशिश करे कि ऐसा वह अपनी खुशी, संतोष और मन बहलाव के लिए करना चाहती है मगर वे नहीं मानेंगे।

तो बहू अगर ऐसे घर में नहीं रहना चाहती, बाहर निकलना चाहती है, पति के साथ मिलकर परिवार से अलग अपनी गृहस्थी बनाना चाहती है, जहां उस पर कोई पाबंदी न हो, तो उसे दोष देना उचित नहीं होगा। यह उस घर के माहौल की तार्किक परिणति है और मेरी नज़र में पूरी तरह समझ में आने वाली बात है।

कई परिवारों में मैंने ऐसा होते देखा है। पहले बड़े लड़के का विवाह होता है और वह अपने परिवार को लेकर अलग हो जाता है। दूसरे लड़के के विवाह के बाद फिर वही कहानी दोहराई जाती है और आखिरी लड़के के साथ भी फिर वही। इससे ऐसा लगता है कि यह वर्तमान बहू का दोष है लेकिन अगर आप पूरी तस्वीर को गौर से देखें तो क्या आपको यह नहीं लगेगा कि महिला के सास-ससुर और देवर भी इस मामले में पर्याप्त दोषी हैं?

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