पूर्व और पश्चिम की दोनों संस्कृतियों में जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं उनके मस्तिष्क में परिवर्तन आने लगता है, एक तरह का विकास होता है। ये परिवर्तन दोनों संस्कृतियों के, भारतीय और पाश्चात्य, बच्चों में समान रूप से होते हैं। लेकिन जो परिवर्तन भारत में 16 की उमर में दिखाई देता है वो यहाँ पश्चिम में 11 साल में ही हो जाता है। यह 5-6 साल का अंतर है। और मुझे अच्छी तरह याद है कि मैं 14 साल की उम्र में क्या किया करता था। हम लोग बचपन की कहानियाँ एक-दूसरे को सुना रहे थे।
मैंने थॉमस और आइरिस को बताया कि जब मैं किशोर वय का था तब हमने बच्चों का एक गुट बना लिया था जो कई काम मिलजुलकर किया करता था। साल में एक बार वृंदावन और मथुरा में परिक्रमा का दिन आता था जिस दिन सब लोग परिक्रमा के रूप में तीन गावों का 50 किलोमीटर का चक्कर लगाया करते थे। हम सबेरे जल्दी निकल जाते थे और दोपहर बाद या शाम तक ही वापस आते थे। और मुझे याद है कि जब मैं 14 साल का था तब हम घर से तो जल्दी निकल जाते थे मगर आसपास कहीं रुककर हमारी परिचित लड़कियों के समूह के आने का इंतज़ार करते थे और फिर ठीक उनके पीछे-पीछे चल देते थे। और इस तरह हम उस दिन उन लड़कियों का पीछा किया करते थे, चुट्कुले सुनाते, चुहलबाजी करते हुए। लड़कियां भी इसका मज़ा लेती थीं और पीछे मुड़-मुड़कर हम लोगों को देखतीं और हँसती रहती थीं।
वापस वृंदावन पहुँचने से थोड़ा पहले हमने दो लड़कों से पूछा कि उनका 50 किलोमीटर का चक्कर कहाँ खत्म हो रहा है और तब हमें पता चला कि उनका 50 किलोमीटर का चक्कर कब का खत्म हो चुका था और सिर्फ लड़कियों के पीछे चलने की उमंग में वे 15 किलोमीटर अतिरिक्त चल चुके थे। और लड़कियां उनकी 50 किलोमीटर की यात्रा समाप्त होते ही बस पकड़कर वापस घर की तरफ रवाना हो चुकी थीं।
वह बहुत मस्त समय था और मैं ही जानता हूँ कि उस उम्र में हमने कितना मासूम और निष्कपट आनंद लूटा था। मैं उस समय को बार-बार याद करना चाहता हूँ और कई बार मुझे लगता है कि यहाँ के बच्चों के पास ऐसी यादें इकट्ठा नहीं हो पाएँगी क्योंकि वे तो हरदम जल्द से जल्द वयस्क होने की कोशिश में लगे रहते हैं।
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