भारत में बचपन की मासूम यादें – 14 जुलाई 2009

पूर्व और पश्चिम की दोनों संस्कृतियों में जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं उनके मस्तिष्क में परिवर्तन आने लगता है, एक तरह का विकास होता है। ये परिवर्तन दोनों संस्कृतियों के, भारतीय और पाश्चात्य, बच्चों में समान रूप से होते हैं। लेकिन जो परिवर्तन भारत में 16 की उमर में दिखाई देता है वो यहाँ पश्चिम में 11 साल में ही हो जाता है। यह 5-6 साल का अंतर है। और मुझे अच्छी तरह याद है कि मैं 14 साल की उम्र में क्या किया करता था। हम लोग बचपन की कहानियाँ एक-दूसरे को सुना रहे थे।

मैंने थॉमस और आइरिस को बताया कि जब मैं किशोर वय का था तब हमने बच्चों का एक गुट बना लिया था जो कई काम मिलजुलकर किया करता था। साल में एक बार वृंदावन और मथुरा में परिक्रमा का दिन आता था जिस दिन सब लोग परिक्रमा के रूप में तीन गावों का 50 किलोमीटर का चक्कर लगाया करते थे। हम सबेरे जल्दी निकल जाते थे और दोपहर बाद या शाम तक ही वापस आते थे। और मुझे याद है कि जब मैं 14 साल का था तब हम घर से तो जल्दी निकल जाते थे मगर आसपास कहीं रुककर हमारी परिचित लड़कियों के समूह के आने का इंतज़ार करते थे और फिर ठीक उनके पीछे-पीछे चल देते थे। और इस तरह हम उस दिन उन लड़कियों का पीछा किया करते थे, चुट्कुले सुनाते, चुहलबाजी करते हुए। लड़कियां भी इसका मज़ा लेती थीं और पीछे मुड़-मुड़कर हम लोगों को देखतीं और हँसती रहती थीं।

वापस वृंदावन पहुँचने से थोड़ा पहले हमने दो लड़कों से पूछा कि उनका 50 किलोमीटर का चक्कर कहाँ खत्म हो रहा है और तब हमें पता चला कि उनका 50 किलोमीटर का चक्कर कब का खत्म हो चुका था और सिर्फ लड़कियों के पीछे चलने की उमंग में वे 15 किलोमीटर अतिरिक्त चल चुके थे। और लड़कियां उनकी 50 किलोमीटर की यात्रा समाप्त होते ही बस पकड़कर वापस घर की तरफ रवाना हो चुकी थीं।

वह बहुत मस्त समय था और मैं ही जानता हूँ कि उस उम्र में हमने कितना मासूम और निष्कपट आनंद लूटा था। मैं उस समय को बार-बार याद करना चाहता हूँ और कई बार मुझे लगता है कि यहाँ के बच्चों के पास ऐसी यादें इकट्ठा नहीं हो पाएँगी क्योंकि वे तो हरदम जल्द से जल्द वयस्क होने की कोशिश में लगे रहते हैं।

Related posts

parenting

क्यों भारतीय युवा अपने माता-पिता से झूठ बोलते हुए ज़रा सा भी नहीं झिझकते? 18 जनवरी 2016

स्वामी बालेंदु भारतीय युवक-युवतियों की, विशेषकर महानगरों में रहने वाली युवतियों की एक परिस्थितिजन्य आदत के बारे में लिख रहे ...
working woman

भारत में महिलाओं के जीवनों में तब्दीली आ रही है लेकिन वहाँ नहीं, जहाँ कि सबसे अधिक ज़रूरत है – 14 जनवरी 2016

स्वामी बालेन्दु भारत के महानगरों के बारे में लिख रहे हैं जहाँ, कोई सोच सकता है कि, लोगों के विचारों ...
क्या आप भी सोचते हैं कि 'शादी से पहले सेक्स नहीं' - 13 जनवरी 2016

क्या आप भी सोचते हैं कि ‘शादी से पहले सेक्स नहीं’ – 13 जनवरी 2016

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि कैसे बहुत से नैतिक मूल्यों की जड़ में पुरानी, दक़ियानूसी परंपराएँ हैं, जिन्हें अब ...
pregnency test

महिलाओं पर बच्चा पैदा करने के दबाव के भयंकर परिणाम – 12 जन 2016

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि भारत में महिलाओं पर शादी के बाद बच्चे पैदा करने के कैसे-कैसे दबाव डाले ...
आपके विवाह के बाद जब आपकी सास आपकी माहवारी का हिसाब रखने लगती है - 11 जनवरी 2016

आपके विवाह के बाद जब आपकी सास आपकी माहवारी का हिसाब रखने लगती है – 11 जनवरी 2016

स्वामी बालेंदु भारतीय समाज, भारतीय परिवार और सास-ससुर द्वारा डाले जाने वाले दबाव के बारे में लिख रहे हैं, जो ...
भारतीय क्यों सोचते हैं कि बच्चों को अपने अभिभावकों से डरना चाहिए? 8 दिसंबर 2015

भारतीय क्यों सोचते हैं कि बच्चों को अपने अभिभावकों से डरना चाहिए? 8 दिसंबर 2015

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि कैसे स्कूली किताबें डरा-धमकाकर बच्चों का लालन-पालन करने की भारतीय संस्कृति को प्रतिबिंबित करती ...
चिल्लाएँ नहीं - बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार करें! 10 नवम्बर 2015

चिल्लाएँ नहीं – बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार करें! 10 नवम्बर 2015

स्वामी बालेंदु एक खूबसूरत शाम के बारे में बता रहे हैं, जो एक व्यक्ति द्वारा अपनी पुत्री पर की गयी ...
सेक्स, सेक्स और सेक्स - पश्चिम के विषय में भारत का विकृत नजरिया - 2 सितंबर 2015

सेक्स, सेक्स और सेक्स – पश्चिम के विषय में भारत का विकृत नजरिया – 2 सितंबर 2015

बहुत से भारतीय पुरुष और महिलाएँ यह विश्वास करते हैं कि पश्चिम में जो कुछ भी है, सिर्फ सेक्स है! ...
भूखे रह सकते हैं मगर झाड़ू-पोछा नहीं करेंगे - भारतीय समाज में व्याप्त झूठी प्रतिष्ठा की धारणा - 16 जुलाई 2015

भूखे रह सकते हैं मगर झाड़ू-पोछा नहीं करेंगे – भारतीय समाज में व्याप्त झूठी प्रतिष्ठा की धारणा – 16 जुलाई 2015

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि कैसे उनके स्कूली बच्चों के कुछ परिवार घरेलू काम वाली नौकरी नहीं करना चाहते ...

Leave a Reply