भारत के बाहर भारतीय आतिथ्य सत्कार – 22 जनवरी 2009

आज शाम को हमें एक भारतीय ने अपने छोटे से रेस्तरां में खाने पर आमंत्रित किया। पिछली बार जब मैं लकजेमबर्ग में था, वह और उसकी पत्नी मेरे पास उपचार के लिए आए थे। वह लंदन में पैदा हुआ था और पला-बढ़ा था और उसकी मुलाकात अपनी पत्नी से, जो पुर्तगाली थी, यहाँ लकजेमबर्ग में हुई थी। दस साल से वे लकजेमबर्ग में ही रह रहे थे। उन्होंने मेरा खाना मेरे नियमबद्ध आहार को ध्यान में रखते हुए बड़े प्रेम से बनाया था। रोजर और मैडी को भी बुलाया गया था इसलिए हम सब साथ में उनके यहाँ पहुंचे। हमारा मेजबान हम सबको मेहमान के रूप में पाकर बड़ा खुश था।

उसके यहाँ शानदार भोजन का मज़ा ले लेने के बाद मैंने उन्हें एक संस्मरण सुनाया जो मेरे साथ पेरिस में घटित हुआ था। मैं अपने एक मित्र के साथ सड़क पर चला जा रहा था और हम दोनों बहुत भूखे थे। हम लोग किसी अच्छे रेस्तरां की तलाश कर रहे थे और संयोग से हमें एक भारतीय रेस्तरां मिल गया। मैं बड़ा खुश हुआ और हम भीतर आ गए। रेस्तरां के मालिक ने मुझे देखा और बहुत सम्मान के साथ हमारा अभिवादन किया। मैंने सीधे पूछा कि क्या अपनी खास ज़रूरत के अनुसार मुझे बिना प्याज़, मिर्ची और लहसुन वाला खाना मिल सकता है? उसने कहा, ‘बिल्कुल! कृपया बैठ जाएँ और बताएं कि आपको क्या चाहिए। हम आपके लिए तुरंत, ताज़ा बनाकर ले आते हैं।’

वह अपने परिवार के साथ रेस्तरां की दूसरी मंज़िल पर रहता था। वह ऊपर गया और अपनी पत्नी से मेरा खास खाना बनाने के लिए कहा और कुछ देर में ही बहुत बढ़िया भोजन तैयार हो गया। डिनर के बाद मेरे मित्र ने बिल मँगवाया। लेकिन रेस्तरां का मालिक छाती पर अपने हाथ जोड़कर हमारे सामने खड़ा हो गया और बोला, ‘मैं इस भोजन का पैसा नहीं ले सकता। स्वामी जी मेरे यहाँ पधारे यह मेरे लिए सम्मान की बात है। यह मेरा धंधा है मगर मैं आपसे सिर्फ आशीर्वाद चाहता हूँ, रुपया नहीं।’ जब उसे मेरे आश्रम का और उसमें चल रहे बच्चों के चैरिटी कार्यक्रमों का पता चला तो उसने मुझे कुछ बच्चों के लिए दान भी दिया।

आज रात मैंने उन्हें यह कहानी सुनाई और बताया कि यह एक भारतीय प्रथा है। एक मेहमान को भगवान की तरह देखा जाता है और उसका उसी तरह सम्मान किया जाता है और एक आध्यात्मिक गुरु का घर आना और उसे घर में भोजन कराना तो और भी ज़्यादा सम्मान और सौभाग्य की बात मानी जाती है। उसे खिलाकर वे आशीर्वाद और दुआओं की अपेक्षा करते हैं, व्यापार की नहीं। इस तरह का अनुभव मुझे सिर्फ पेरिस में ही नहीं, जर्मनी, इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया में भी हो चुका है।

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