भारतीय आदतें: भ्रम पैदा करने की हद तक औपचारिक और शालीन- 24 जुलाई 2013

भारतीय संस्कृति

पिछले हफ्ते मैंने जर्मन और अमरीकनों की कुछ खास चारित्रिक विशेषताओं का ज़िक्र किया था। जी हाँ, हम यहाँ उनके बीच रूढ़ और घिसी पिटी आदतों का ही ज़िक्र कर रहे हैं लेकिन वे भी उनके बीच सामान्य रूप से मौजूद आदतों और संस्कृति से ही उद्भूत होते हैं। उनके साथ कुछ समय रहकर और उनके साथ उन देशों की यात्राएँ करके आप उन्हें समझ सकते हैं। भारत में भी, उन लोगों को, जो यहाँ के निवासी नहीं हैं, भारतीयों की कुछ आदतें और रवैये बड़े भ्रामक, अजीबोगरीब और हास्यास्पद लग सकते हैं। क्योंकि मेरी पत्नी जर्मन है और भारत में रहती है, वह ऐसी कुछ बातों के बारे में आपको बता सकती है।

उनमें से एक यह है कि भारतीय अक्सर नम्र और शालीन दिखाई देना चाहते हैं लेकिन वे चाहते कुछ और हैं और कहते कुछ और। इस वजह से यह पता करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि वाकई वे वही चाहते हैं जो कह रहे हैं या उसका बिल्कुल विपरीत। वे ठीक-ठीक बताएँगे बशर्ते आप अधिक आग्रह पूर्वक कहें। मैं एक उदाहरण देता हूँ:

मेरी पत्नी एक मित्र के साथ डॉक्टर के पास जाने के लिए सहमत हो गई। बारिश का मौसम था और उस दिन बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। तय समय पर उसकी मित्र का फोन आया, "तेज़ बारिश हो रही है; चलना है या स्थगित कर दें?" रमोना ने कहा, "बिल्कुल जाएंगे! क्या तुम्हें लेने ले लिए कार भेजूँ?" उसकी मित्र ने जवाब दिया, "नहीं, नहीं। उसकी कोई ज़रूरत नहीं है, मैं रिक्शे से आ जाऊँगी!" "आ जाओगी न?" "जी, बिल्कुल!" और मेरी पत्नी ने फोन रख दिया।

मैं और यशेंदु, दोनों, वहीं पास ही बैठे थे और यशेंदु ने पर्दा खोलकर बाहर इशारा करते हुए कहा कि मूसलाधार बारिश हो रही है। रमोना ने सोचा कि उसका मतलब यह है कि उसे अपनी मित्र के लिए कार भेज देना चाहिए था और विरोध करते हुए कहा, "मैंने तो उससे दो बार पूछा था मगर उसने हर बार यही कहा कि वह रिक्शा से आना चाहती है! मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि वह बारिश में तरबतर डॉक्टर के पास क्यों जाना चाहती है!"

मुझे हंसी आ गई और मैंने समझाया कि उसकी मित्र का पानी में डॉक्टर के पास जाने का कोई इरादा नहीं है-इसीलिए सबसे पहले उसने यही पूछा था कि जाना चाहिए या नहीं! वह चाहती थी कि कोई उसे ले चले-सही जवाब होता: "तुम रुको, मैं आकर तुम्हें ले लेती हूँ!" "पूछो मत, उसे व्यर्थ शालीन दिखाई देने का मौका मत दो!"

यही बात रमोना ने तुरंत फोन करके उससे कही और उसकी मित्र खुश हो गई। लेकिन, वापसी में फिर वही बात पेश आई और रमोना ने उससे मुसकुराते हुए कहा, "एक बात कहूँ, पता नहीं मैं कैसे कहूँ? कितनी बार मुझे यह कहना पड़ता है, वह भी सख्ती के साथ!… कार खड़ी है, पंकज (हमारा ड्राईवर) तुम्हें घर छोड़ आएगा लेकिन अगर तुम चाहो तो बारिश में नहाते हुए घर जा सकती हो! तुम्हारी मर्ज़ी, खुशी से भीगते हुए जा सकती हो!"

झूठी नम्रता के, दिखावटी इंकार के, ऐसे कितने ही वाकये होते रहते हैं, जिनके कारण आप उलझन में पड़ जाते हैं। यह भोजन के वक़्त भी होता है, जब खाने वाला अतिरिक्त कुछ लेने से मना करता रहता है जब कि वह अभी कुछ और भी खाना चाहता है और परोसने वाला बार-बार पूछता है कि कुछ और रख दूँ, कुछ चाहिए? ऐसी दोतरफा औपचारिकता में ज़्यादा खाने का बहुत इमकान होता है! क्योंकि अगर आप अपने मेहमान से अतिरिक्त लेने का आग्रह नहीं करेंगे तो हो सकता है कि वह शालीन दिखाई देने के चक्कर में भूखा ही रह जाए!

समय बीतने के साथ और शायद सालों विभिन्न संस्कृतियों के बीच रहने के अपने अनुभव की वजह से मैं बहुत सी भारतीय औपचारिकताओं से मुक्त हो चुका हूँ। लेकिन वह अलग किस्सा है, जिसे मैं अगले कुछ दिनों में बयान करूंगा।

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