वादा न निभाना: भारत की एक और समस्या – 30 जुलाई 2013

भारतीय संस्कृति

समय को देखने का भारतीय नज़रिया जितना मज़ाकिया है, बार-बार वादा तोड़ने की उनकी आदत उतनी ही शर्मनाक और उनकी प्रतिष्ठा पर काले धब्बे जैसी है।

यह एक बात है कि आप ग्यारह बजे मिलने का वादा करते हैं और बारह बजे तशरीफ लाते हैं और यह बिल्कुल दूसरी कि आप आते ही नहीं हैं। मैं कई लोगों को जानता हूँ जिन्होंने मुझे पाँच-पाँच बार फोन करके कहा कि वे आएंगे और फिर नहीं आए।

इससे मेरा कुछ खास नहीं बिगड़ा मगर मेरे मन में उनकी एक खास तरह की छवि बन गई। मुझे एहसास हो गया कि वे अपनी कही हुई बात को गंभीरता से नहीं लेते और उस पर कायम रहना ज़रूरी भी नहीं समझते। और अधिकांश विदेशियों के बीच भारतीयों की यही छवि बनी हुई है, बड़े-बड़े व्यापारिक सम्बन्धों में भी!

मेरे कई पश्चिमी मित्र हैं जो अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों में काम करते हैं। उनके साथ विभिन्न मुलाकातों में वे अपने भारतीय साझीदारों द्वारा धोखा दिये जाने के ऐसे-ऐसे किस्से सुनाते हैं कि आँखें शर्म से झुक जाती हैं। जैसे एक मित्र ने बताया कि उसके के साझीदार ने उससे कहा कि वह कोई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ तुरंत भेज देगा और मेरा यह विदेशी मित्र इंतज़ार करते-करते थक गया मगर वह दस्तावेज़ उसे नहीं मिल पाया। ऐसे ही एक ऑनलाइन कौन्फ्रेंस हो रही थी जिसमें सबको उम्मीद थी कि वह भारतीय कंपनी भी हिस्सा लेगी मगर उनके यहाँ से कोई प्रतिनिधि नहीं आया। बड़े-बड़े समझौते इन भारतीयों की इन हरकतों के चलते टूट जाते हैं जिसकी वजह से न सिर्फ उन भारतीय कंपनियों को बल्कि भारत की जनता को भी हानि उठानी पड़ती है।

मैं अपने भारतीय मित्रों से पूछना चाहता हूँ कि आप खुद अपने साथ, अपनी छवि के साथ और दुनिया भर में भारतीयों की मर्यादा के साथ यह खिलवाड़ क्यों करते हैं? बहुत छोटी सी बात है कि जो काम आप नहीं करना चाहते या नहीं कर सकते उसके बारे में आपको कोई वचन नहीं देना है। आप अपने उत्साही तेवरों से उन पर यह झूठा प्रभाव क्यों डालना चाहते हैं कि आप वह कार्य तुरत-फुरत कर देंगे जब कि आपका उसे करने का कोई इरादा ही नहीं है!

मैं जानता हूँ कि कुछ लोगों कि यह आदत होती है कि किसी एक वक़्त में उनके मन में जो आता है, बिना आगा-पीछा देखे बोलते चले जाते हैं। हो सकता है कि यह एक आम भारतीय प्रवृत्ति हो कि किसी परिवर्तन पर या किसी नयी योजना पर तुरंत निर्णय ले लिया जाए। इससे होता यह है कि वे एक साथ कई योजनाएँ हाथ में ले लेते हैं और उनमें से किसी के साथ न्याय नहीं कर पाते। ऐसी हालत में योजनाओं में बार-बार, और कई बार ऐन वक़्त पर, परिवर्तन करना पड़ता है या उन्हें बाद में छोड़ देना पड़ता है। भारतीयों की इस चारित्रिक विशेषता ने मेरी जर्मन पत्नी को शुरू-शुरू में बिल्कुल हतप्रभ कर दिया था। उसे हमेशा शक रहता था कि जो काम उसने हाथ में लिया है वह पूरा होगा भी या नहीं!

हम सभी को यह पता है कि जर्मन्स को भी अपने सख्त दैनिक नियोजन, भले ही वह दिन हफ्तों बाद का कोई दिन हो, से हटकर कभी-कभी थोड़ा तनावमुक्त भी होना चाहिए, लेकिन हमें यह भी समझना चाहिए कि अचानक किया जाने वाला मनमाना परिवर्तन न सिर्फ उस कार्य में व्यवधान उपस्थित करता है बल्कि दूसरों को उसके बारे में भ्रमित भी कर देता है कि आखिर हो क्या रहा है!

अंत में, यह सोचकर कि आप तो सुधरने से रहे, आपके इस व्यवहार को भी, दूसरे लोग स्वीकार कर ही लेंगे मगर आप भी कभी नहीं चाहेंगे कि लोगों की नज़र में आपकी ऐसी छवि बने जो आपके ऐसे व्यवहार से बन रही है।

तो इस बारे में सोचें और अगर आप दूसरों की नज़रों में अपनी छवि बदलना चाहते हैं तो अपने व्यवहार में परिवर्तन करें। इसके लिए आपको ज़्यादा कुछ नहीं करना है: सिर्फ यह कि किसी से वादा करते समय सोचें कि क्या आप वह काम समय पर और सुचारु रूप से कर पाएंगे या नहीं। अगर आप किसी कारण से उस काम को समय पर नहीं कर पा रहे हैं या उसमें कोई परिवर्तन करना चाहते हैं तो उसे समय रहते दूसरों को बताएं। इतनी सी बात है मगर है बहुत कारगर!

मैं किसी भी कटु विवाद से बचना चाहता हू इसलिए यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि सभी भारतीय इस एक ढांचे में फिट नहीं होते। इसलिए मेरी ऊपर लिखी बातों को शब्दशः अपने आप पर लेकर अपमानित महसूस न करें। मगर सभी जानते हैं कि भारत में अधिकांश लोग इसी आदत के शिकार हैं और इस बात को सभी को स्वीकार करना चाहिए।

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