आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिला रोज़ अपने पति से मार खाती है-मगर उसी के साथ रहती है – 1 दिसंबर 2014

कल जब मैं अपनी 2006 में संपन्न आस्ट्रेलिया यात्रा का ज़िक्र कर रहा था तो मुझे कई बार याद आया कि भारत में लोग-अधिकतर महिलाएँ- ऐसे संबंधों को लगातार जारी रखते हैं भले ही उन्हें अस्वस्थ, तकलीफदेह और खतरनाक व्यक्ति के साथ ही सारा जीवन क्यों न बिताना पड़े। पश्चिम में भी मैंने कभी-कभी ऐसा होते देखा है मगर यहाँ, भारत में अधिकतर ऐसा ही होता है। कभी-कभी तो इसके कारण बड़े स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं मगर कई बार उतने स्पष्ट नहीं होते।

पश्चिम में तलाक अक्सर बहुत मामूली बातों पर भी हो जाते हैं। पति और पत्नी को लगता है कि वे एक-दूसरे के प्रति विरक्त हो गए हैं या उनके बीच कुछ ज़्यादा ही दूरी पैदा हो गई है तो वे साथ रहना बंद कर देते हैं! वे तलाक ले लेते हैं और अपना-अपना अलग जीवन बिताते हैं। यह अक्सर होता है, इसे बहुत बड़ी बात नहीं माना जाता।

भारत में मामला बिल्कुल दूसरा है। तलाक जैसी चीज़ साधारणतया किसी शादीशुदा व्यक्ति के मन में कभी आती ही नहीं है। भविष्य के लिए यह विकल्प पूरी तरह रद्द है, चाहे वैवाहिक संबंधों में कितनी भी समस्याएँ क्यों न हों। वे हर बात बर्दाश्त कर लेंगे लेकिन उनके मन में अलग होने का विचार तक नहीं आएगा। शायद आपको विश्वास नहीं होगा! स्कूल में हाल ही में संपन्न ‘अभिभावक-शिक्षक मीटिंग’ में रमोना और हमारे स्कूल की एक लड़की की माँ के बीच हुई इस बातचीत को पढ़ें:

रमोना ने उससे उनके घर का हालचाल पूछा और उसे पता चला कि वह आम भारतीय परिवारों जैसा ही है: लड़की अपनी दो बहनों और माता-पिता और पिता के भाइयों के परिवारों के साथ अपने दादा-दादी के घर में रहती है। जब उसने पूछा कि लड़की का पिता क्या करता है तो उसे बताया गया कि वह कुछ नहीं करता। सिर्फ पत्नी ही बाहर काम करके भोजन, कपडे-लत्ते और दूसरी जीवनोपयोगी आवश्यक वस्तुएँ खरीदने के लिए पैसे कमाकर लाती है। वही परिवार का भरण-पोषण करती है जबकि वह कुछ भी नहीं करता। इसके विपरीत वह अपनी पत्नी के पैसे चुरा लेता है, शराब पीकर सारे परिवार के साथ लड़ाई-झगड़ा और गाली-गलौज करता है। हफ्ते में कई बार वह अपनी पत्नी और बच्चों को मारता-पीटता भी है।

हालाँकि हमारे स्कूली बच्चों के घरों में रमोना कई बार पहले भी ऐसी कहानियाँ सुन चुकी है, इस कहानी में थोड़ा अंतर था: यह महिला आर्थिक सुरक्षा के लिए वहाँ नहीं रह रही थी! रमोना जहाँ भी अब तक गई थी, अधिकतर परिवारों में, महिलाओं के साथ यह आर्थिक सुरक्षा मुख्य कारण था! और यह स्वाभाविक ही है कि आर्थिक सुरक्षा का मसला किसी भी माँ को उसी परिवार के साथ रहने के लिए मजबूर कर सकता है जहाँ उसके साथ बुरा सुलूक किया जाता है क्योंकि उसके पास खुद कुछ कमाने का ज़रिया नहीं होता। लेकिन यहाँ मामला दूसरा था।

रमोना ने पुछा: 'तुमने कभी उसे छोड़ने के बारे में सोचा? 'छोड़ना' शब्द सुनकर वह गफलत में पड़ गई और जब उसकी बेटी ने समझाया कि रमोना का मतलब अलग रहने या तलाक से है तो उसका स्पष्ट उत्तर था कि नहीं! स्पष्ट था कि उस महिला के मन में यह विचार वास्तव में कभी आया ही नहीं था!

और क्यों नहीं आया? रमोना ने मन में सोचा कि इसके माता-पिता की इसे हर तरह की मदद है, स्वाभाविक ही ससुराल वालों से ज़्यादा, और परिवार में यही खुद अकेली कमाने वाली है! वह अपने लिए अलग घर का इंतज़ाम भी कर सकती है-और फिर उसका पति किसी काम का भी नहीं है, न तो कमाता है और न ही उसका व्यवहार उसके या बच्चों के प्रति अच्छा है!

आज भी भारत में वैसे तो तलाक को ही बुरी नज़र से देखा जाता है लेकिन महिलाओं के लिए तलाक एक तरह का लांछन माना जाता है। तलाक को स्त्री की प्रतिष्ठा पर एक तरह का धब्बा या कलंक माना जाता है-भले ही तलाक का कारण कुछ भी हो! तलाकशुदा स्त्री को जीवन के हर क्षेत्र में बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है!

अब आप ही बताइए, क्या किसी व्यक्ति की मानसिक शांति, भावात्मक प्रसन्नता और चारित्रिक सत्यनिष्ठा का इससे बढ़कर कोई मोल नहीं है? क्यों आज भी यह समाज एक ऐसी महिला को, जो स्वतंत्र और मज़बूत हो सकती है, न सिर्फ खुद को बल्कि उसके छोटे-छोटे बच्चों को भी चुपचाप पिटने के लिए मजबूर करता है?

मैं कल इस विषय पर और विस्तार से लिखूँगा-यह विषय मुझे बेहद बेचैन और क्रोधित कर देता है और मुझे महसूस होता है कि इस बारे में और भी बहुत कुछ लिखने और करने को है!

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