दहेज प्रथा – दूल्हा खरीदने और बेचने का धंधा – 28 मार्च, 2011

पिछले हफ्ते मैंने भारत की सबसे बड़ी समस्या, भ्रष्टाचार, के बारे में लिखा था। भारतीय समाज का एक और ऐसा ही कैंसर है विवाह के समय लड़के वालों को लड़की देने के अलावा उसके साथ दहेज देने की प्रथा। यह परंपरा आज एक तरह का व्यापार और लड़की और लड़के, दोनों के परिवारों के लिए बहुत सारी समस्याओं और पीड़ा का कारण बन गई है।

पुराने जमाने में जब दहेज देने की परंपरा की शुरुआत हुई थी तब यह नव-विवाहित दंपति को विवाह के अवसर पर उपहार देने तक सीमित थी। लड़की के परिवार वाले अपनी लड़की को ऐसे उपहार देते थे जो उसकी नई गृहस्थी में काम आ सकें। ये आम तौर पर नया घर बसाने के लिए उपयोग में आने वाले सामान होते थे या धन भी होता था जिससे लड़की अपने पति के साथ जीवन की शुरुआत अच्छी तरह से कर सके। एक तरह की आत्मीयता से भरी यह सुंदर परंपरा ही भ्रष्ट होते होते आज लाखों-करोड़ों रुपए के एक कुरूप व्यवसाय का रूप धारण कर चुकी है।

मैं आपको कई बार बता चुका हूँ कि भारत में आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) बहुत आम बात हैं। किसी समय लड़के के किसी अभिभावक ने बेटे के लिए लड़की ढूंढते हुए सोचा होगा कि नव-विवाहितों को लड़की का परिवार अधिक से अधिक कितना सामान या रुपया दे सकता है और फिर उसने इसी दिशा में प्रयास करना शुरू किया होगा। इस तरह यह प्रथा एक गलत दिशा में विकास करते-करते यहाँ तक पहुँच गई कि लड़की की अच्छाई इस बात से तय होने लगी कि वह अपने परिवार की तरफ से दहेज में कितना रुपया बटोरकर लाती है। और लड़के का परिवार विवाह के लिए लड़की का चुनाव करते समय उसे इसी कसौटी पर कसता है।

लड़के का परिवार उसकी हैसियत, योग्यता और उसकी नौकरी के अनुरूप एक निश्चित रकम लड़की के परिवार से मांगता है। अगर उसके पास कोई अच्छे वेतन वाली नौकरी है, या वह इंजीनियर या डॉक्टर है तो लड़की के लिए यह सुनिश्चित हो जाता है कि वह विवाह के बाद एक सम्पन्न, प्रतिष्ठापूर्ण और सुखमय जीवन बिताएगी। इसी जमानत के लिए लड़की के परिवार वालों को यह खर्च वहन करना पड़ता है। और वे ऐसा करते हैं क्योंकि वे चाहते हैं कि उनकी लड़की का भावी जीवन सुखमय हो। लड़की का परिवार किसी धनी परिवार में रिश्ते की खोज करता है क्योंकि विवाह जीवन में सिर्फ एक बार होता है और वे लड़की का बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने के लिए अपनी हैसियत से अधिक खर्च करने के लिए भी तैयार हो जाते हैं।

वे नगद अदा करते हैं, सोना देते है, लकड़ी का फर्नीचर और दूसरे घरेलू उपकरण देते हैं। वे अक्सर नव दंपति के लिए कार या दूल्हे के लिए मोटर साइकिल खरीदते हैं। पिछले साल हमने सुना कि एक लड़की के धनाढ्य परिवार ने बीएमडबल्यू कारें दहेज में दीं, सिर्फ दूल्हे को नहीं, उसके मित्रों को भी!

फिर ऐसा विवाह एक दिखावा और आडंबर बनकर रह जाता है। हाँ, शादी का उत्सव अवश्य भव्य होता है और एक शो-केस या उससे भी बढ़कर एक शो-रूम ही दहेज के सामानों से सजाकर रख दिया जाता है। एक बड़ा हाल भी हो सकता है जहां नगदी, सोना-चाँदी, जेवरात और कारें प्रदर्शित की जा सकती हैं जिससे विवाह में आने वाले मेहमान आकर दूल्हे द्वारा अपने सास-ससुर से प्राप्त धन-संपत्ति को देख सकें।

आजकल बहुत से मैरेज ब्यूरो और एजेंसियां खुल गई हैं जो भावी दुल्हनों और भावी दूल्हों की जोड़ियाँ मिलाते हैं। अभिभावक लड़की और लड़के के बारे में, दहेज दे सकने की अपनी सामर्थ्य सीमा या अपेक्षित दहेज की राशि सहित सभी दूसरी जानकारियाँ एजेंसी को देते हैं। फिर एजेंसी इन राशियों का और लड़की और लड़के से संबंधित कुछ दूसरी बातों का ध्यान रखते हुए जोड़ियों का मिलान करते हैं।

आखिर में वे दोनों पक्षों से एक निश्चित कमीशन और दहेज के मूल्य का भी कुछ प्रतिशत प्राप्त करते हैं। आप क्या सोचते हैं, लाभ की दृष्टि से ये धंधा बुरा नहीं है! उनकी जाति, शिक्षा और मिलने वाले दहेज के अनुसार वे अपने ग्राहकों की आपस में भेंट करा देते हैं और खुद भी धनवान बनते जाते हैं।

लड़कों के अभिभावक अपने बच्चों की पढ़ाई पर बहुत ध्यान देते हैं ताकि विवाह-बाज़ार में, आगे चलकर अपने सुरक्षित भविष्य के अनुरूप, उसकी ऊंची कीमत प्राप्त हो। जो लोग पश्चिमी देशों में रहते हैं वे मोल-भाव करते वक़्त अपने लड़कों की और भी ज़्यादा कीमत लगाते हैं। देखें, कौन है जो हमारे बेटे के साथ विवाह संबंध बनाने का सामर्थ्य रखता है!

हालांकि दहेज देने की यह प्रथा कानूनी रूप से निषिद्ध है लेकिन फिर भी यह खुले आम जारी है और समाज में अनगिनत समस्याएं पैदा कर रही है।

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