चिल्लाएँ नहीं – बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार करें! 10 नवम्बर 2015

भारतीय संस्कृति

कल ही मैंने आपको बताया कि अपरा अपनी नृत्य प्रस्तुति से कितनी खुश है, और जब उसने पुरस्कार के रूप में मिला अपना कप और मैडल हमें दिखाए तो हमने भी उतना ही गौरवांवित महसूस किया। लेकिन जब वह हमें कार्यक्रम के बारे में विस्तार से बताने लगी तो हमने महसूस किया कि उसके दिमाग में दर्शक और सराहना या खुद अपने प्रदर्शन से अधिक कोई और बात घुस गयी है, जिसने उसकी उपलब्धि और उसके गौरव को दागदार कर दिया है: एक व्यक्ति उस पर और आश्रम के उसके प्रिय भाई पर बेवजह चिल्लाया।

शुरू में तो वह बड़े उत्साह से अपने प्रदर्शन के बारे में बताती रही लेकिन जल्द ही विचारमग्न हो गई और कहा: "वहाँ एक आदमी था, जिसने मुझे और गुड्डू से कहा, 'क्या कर रहे हो तुम लोग यहाँ? चलो भागो, यहाँ से!' हमने कुछ नहीं किया था, सिर्फ बैठना चाहते थे!"

रमोना उत्तर देने से पहले थोड़ा झिझकी क्योंकि उसे अच्छे से पता था कि बच्चों ने कुछ नहीं किया होगा और वह आदमी बस उन बच्चों को वहाँ से भगाना चाहता रहा होगा। शुरू करते हुए उसने कहा “अरे, शायद उस आदमी का मूड खराब होगा", किन्तु उसने तुरंत आगे कहा, "लेकिन उसे तुम्हारे साथ ऐसा दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए था, यह अच्छा नहीं है।‘ क्योंकि महज खराब मनोदशा होने के कारण अशिष्ट आचरण और दुर्व्यवहार करना ठीक नहीं।

अपरा का मन इस घटना को भूल नहीं पा रहा था। कुछ ही देर बाद उसने उस घटना का सारा ब्यौरा ज्यों का त्यों मेरे सामने रख दिया। रमोना की तरह मैं उतना सौम्य नहीं रह पाया और मैंने सीधे कहा: “क्योंकि वह अच्छा व्यक्ति नहीं था!”

बात यह है कि बच्चों के प्रति इस तरह के व्यवहार को भारत में हम अक्सर देखते रहते हैं। लोग बच्चों को सुधारने के लिए अधिकतर नरमी का व्यवहार नहीं करते बल्कि सीधा उन पर चिल्लाने लगते हैं, ज़ोर-ज़ोर से डांटते-डपटते हैं और उन्हें अपनी बात समझाने का अवसर नहीं देते, न ही यह बताते हैं कि जो भी वे कर रहे हैं, वह उन्हें क्यों नहीं करना चाहिए।

स्वाभाविक ही यह बच्चों के प्रति आम भारतीयों के गलत रवैये की झलक दिखाता है। इसमें एक तरह का सकारात्मक भाव भी नज़र आता है कि कोई भी संसार के बच्चों को उचित व्यवहार सिखा सकता है और बता सकता है कि क्या उनके लिए सही है और क्या गलत। यह बहुत अच्छा है, क्योंकि इससे भारतीय समाज के इस नज़रिए का पता चलता है कि बच्चों की ज़िम्मेदारी केवल अभिभावकों की ही नहीं है। लेकिन साथ ही इसका दोष यह है कि लोग अक्सर बच्चों से ऐसे बात करने लगते हैं जैसे वे मूर्ख हों। अधिकतर उन्हें इस बात का एहसास नहीं होता कि हम सबकी तरह बच्चों की भी कुछ भावनाएँ होती हैं, बल्कि हमसे कहीं अधिक तीव्र और गहन भावनाएँ होती हैं।

और इस तरह अपने आठ साल के भाई के साथ मेले में आई हमारी चार-साला नृत्य-सितारा बेटी की कोमल भावनाओं की परवाह किए बगैर यह व्यक्ति उसके साथ मनचाहा दुर्व्यवहार करता है जबकि वे दोनों सिर्फ इस व्यक्ति के साथ वाली सीट पर बैठना चाहते हैं। वह सरल भाषा में कह सकता था कि वहाँ न बैठे, वह उसकी पत्नी की सीट है और वह कभी भी आ सकती है। वह उन्हें प्यार से बता सकता था कि देखो, सारे बच्चे वहाँ कतार में इंतज़ार कर रहे हैं और वहाँ जाकर इंतज़ार करो। चाहता तो वह उन्हें वहीं बैठा रहने दे सकता था क्योंकि वे उसे परेशान नहीं करने वाले थे और जब पत्नी आ जाती तो उठ भी जाते!

पिता होने के नाते मुझे गुस्सा आया कि उसने मेरी बच्ची की बहुत सुखद शाम पर एक काला धब्बा लगा दिया। एक पिता के रूप में मैं पूछता हूँ कि आप लोग अपने आस-पास के बच्चों के साथ विनम्र व्यवहार क्यों नहीं कर सकते! और एक इंसान होने के नाते मैं सोचता हूँ कि अपने से दुर्बल व्यक्तियों के साथ चीखने-चल्लाने जैसा ऐसा बेहूदा व्यवहार अक्सर लोग सहन कैसे कर लेते हैं।

भला व्यवहार कीजिए। बच्चों के साथ और अपने आसपास के सभी लोगों के साथ!

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