अपने आश्रम में विभिन्न मेहमानों के साथ हमें अनेक तरह के अनुभव होते रहे हैं और जैसे मैं यहाँ, अपने ब्लॉगों में, उन अनुभवों को आपके सामने रखता हूँ, उसी तरह कुछ मेहमान भी अपने ब्लॉगों में भारत में उन्होंने जो कुछ देखा-सुना और किया, उसके बारे में लिखते हैं। हम अक्सर सोशल मीडिया के जरिये उनके साथ जुड़ते हैं- बल्कि उनके आश्रम आने से पहले से ही जुड़े हुए होते हैं- और जो वे हमारे बारे में अपने विचार दोस्तों के साथ साझा करते हैं, और हम उसे पढ़ते हैं। कभी-कभी मेरी इच्छा होती है कि उन लेखकों को बताऊँ कि उन्हें भारत में कुछ ज़्यादा समय घूमना-फिरना चाहिए था, या कुछ समय यहाँ रहना चाहिए था, यहाँ की ज़बान सीखनी चाहिए थी और दूसरे विदेशियों के साथ रहने के स्थान पर साधारण भारतीयों के साथ ज़्यादा समय बिताना चाहिए था।
मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ? मैंने देखा है कि अक्सर लोग दो महीने, चार सप्ताह या दो सप्ताह के लिए भारत आते हैं और फिर एक लेख लिख मारते हैं जिसमें इस तरह की सलाहें होती हैं कि ‘अगर आप भारत जाएँ तो आपको यह करना चाहिए…’ या ‘भारतीय ऐसे होते हैं…’ वगैरह। वे बहुत ज़ोर देकर बड़े सख्त जुमलों में अपनी बात कहते हैं, अपने किसी खास व्यक्तिगत अनुभव के बारे में नहीं बल्कि वे अपनी देखी हुई बातों को सामान्य बनाकर पेश करते हैं और कहते हैं कि, देखिये यह है भारत!
मैं एक उदाहरण से अपनी बात समझाने की कोशिश करता हूँ: एक ब्लॉग में एक महिला ने लिखा, ‘दोस्ती में भी एक दूसरे को छू लेना भारत में वर्जित है! कोई एक-दूसरे को गले नहीं लगाता, किसी भी तरह का शारीरिक स्पर्श नहीं होता!’ मैं ऐसी पंक्तियाँ पढ़कर आश्चर्य में पड़ गया और सोचने लगा कि भारत में और खासकर आश्रम में इतने दिन बिताने के बाद क्या एक बार भी उसकी नज़र एक-दूसरे की बाँहों में बाँहें डाले घूमते-फिरते लोगों पर नहीं पड़ी होगी! क्या उसने एक बार भी नहीं देखा होगा कि लोग एक दूसरे के कंधे पर हाथ रखते हुए बिल्कुल सकुचाते नहीं हैं और दो दोस्तों का शारीरिक संस्पर्श बहुत सामान्य बात है! हाँ, विशेषकर विवाह के योग्य युवा पुरुष और स्त्रियाँ सामान्यतः गले नहीं लिपटतीं और एक-दूसरे के स्पर्श से भी बचने की कोशिश करती हैं। लेकिन दोस्ती में पुरुष और स्त्रियाँ भी आपस में काफी निकट होते हैं, शारीरिक रूप से भी। इस महिला ने भारत का एक बहुत छोटा सा हिस्सा ही देखा था और वह भी, निश्चित रूप से बहुत करीब से नहीं। इसके बावजूद वह ऐसा वक्तव्य दे रही हैं जैसे सारा देश घूम आई हों और भारत के लोगों के लिए एक तरह की दया व्यक्त कर रही हैं कि बेचारे एक-दूसरे को छू भी नहीं सकते! यह महज उनके दिमाग का फितूर है और कुछ नहीं।
जबकि इस महिला ने भारत की एक नकारात्मक छवि प्रस्तुत की थी एक अन्य ब्लॉग लेखक ने इतना सकारात्मक निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि मैं आश्चर्य में पड़ गया। भारत में लोग संयुक्त परिवार में अपने अभिभावकों, चाचा-चाचियों, चचेरे भाई-बहनों और दूसरे पारिवारिक संबंधियों के साथ रहते हैं, यह बात सच है। यह एक बढ़िया विचार है और मैं इसका समर्थन भी करता हूँ और सोचता हूँ कि यह एक अच्छी बात है। आश्रम में भी आपको एक कुटुंब में रहने का एहसास होता है जहां सब लोग मिल-जुलकर रहते हैं और कोई लड़ाई-झगड़ा या तनाव नहीं होता, जैसा कि पश्चिमी समाजों में अपरिहार्य है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है, जैसा इस लेखक महोदय ने निष्कर्ष निकाला था: ‘सारे भारत में सारे परिवार शांति और भाईचारे के साथ रहते हैं। वे एक-दूसरे से प्रेम करते हैं और अपने अभिभावकों की दौलत के लिए एक-दूसरे से लड़ते नहीं हैं और संपत्ति का बंटवारा शांतिपूर्वक कर दिया जाता है।’ दुर्भाग्य से भारत में सब कुछ इतना उज्जवल भी नहीं है। परिवारों में आपसी विरोध और द्वन्द्व होता है, जैसा कि सब जगह होता है और कई जगह यही चीज़ें, पैसा और उत्तराधिकार, परिवार टूटने का कारण भी बनती हैं। हमारे यहाँ भी अलग अलग परिवारों का दौर शुरू हो चुका है। इस बात का ज़िक्र आश्रम में रहते हुए हमारी बातों में भी आया होगा मगर महज आसपास के लोगों को दूर से देखकर, क्योंकि कोई भी अपने पारिवारिक झगड़े अजनबियों के सामने सार्वजनिक नहीं करता, उसने इतना सकारात्मक निष्कर्ष निकाल लिया।
यह अच्छी बात है कि लोग अपने अनुभव खुले रूप से और ईमानदारी के साथ बताते हैं। दूसरे लोग इन्हें पढ़कर भारत की एक छवि बनाते हैं और यहाँ आने की इच्छा रखते हैं। लेकिन अपने अनुभवों को सारे देश, सारी संस्कृति या सारे समाज पर लागू करके किसी सामान्य निष्कर्ष पर आ जाना ठीक नहीं। जो आपने देखा है वह अनगिनत फलक वाले विशाल राष्ट्र की एक छोटी सी तस्वीर भर है!
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