सामान्य भारतीय महिला के जीवन में यौन प्रताड़ना दैनिक अनुभव है – 21 जनवरी 2014

भारतीय संस्कृति

मुख्य रूप से पश्चिमी महिलाओं पर हो रहे यौन अपराधों पर लिखी कल की टिप्पणी को आगे बढ़ाते हुए आज मैं उन अनगिनत महिलाओं के विषय में लिखना चाहता हूँ, जिनके लिए यौन प्रताड़ना रोज़ का अनुभव है: जी हाँ, भारतीय महिलाएं, जो इस देश में निवास करती हैं और जिन्हें इन्हीं सड़कों और गलियों से होते हुए रोज़ ही गुजरना होता है। इन पीड़ित महिलाओं के प्रकरण अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में बहुत कम चर्चित हो पाते हैं। यहाँ तक कि स्थानीय मीडिया भी उन शिकायतों पर पर्याप्त तवज्जो नहीं देता। समस्या यह है कि ये प्रकरण बहुत ‘सामान्य’ माने जाते हैं क्योंकि ऐसी घटनाएँ रोज़ ही होती हैं, दिन दहाड़े, अगल-अलग जगहों पर, कई-कई बार होती रहती हैं और इन्हें जीवन का सामान्य हिस्सा मान लिया गया है।

मैं बलात्कार पर ज़्यादा कुछ नहीं कहूँगा क्योंकि यहाँ मैं महिलाओं पर रोज़ होने वाली प्रताड़नाओं के बारे में बात करना चाहता हूँ। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार 93% बलात्कार ऐसे लोगों द्वारा किए जाते हैं, जिनसे प्रताड़ित महिला परिचित होती है, जिसे घरेलू हिंसा कहा जाता है, पिता या चाचा के द्वारा, मित्रों या दूसरे रिश्तेदारों द्वारा। मैं उन अपराधों पर बात करना चाहता हूँ जो रोजाना खुले आम, सड़कों, बसों, ट्रेनों और कार्यालयों में होते हैं: कामुकता के साथ घूरना, अपमानजनक फब्तियाँ कसना, भीड़ भरी बसों, ट्रेनों या दुकानों में स्त्रियॉं के नितंबों या स्तनों को छूना आदि आदि।

इन प्रताड़नाओं पर शुरुआत से चर्चा करें: घूरना। मैंने बताया था कि जब भी मैं अपने विदेशी मित्रों के साथ बाहर निकलता हूँ तो मेरी महिला मित्रों को भारतीय पुरुष बहुत अनुपयुक्त तरीके से देखते हैं। उनकी नज़रों में सम्मान नहीं होता और कई बार लगता है जैसे ये पुरुष आँखों ही आँखों में उन महिलाओं पर बलात्कार कर रहे हैं! एक बार मैंने ऐसा करने वाले एक व्यक्ति से पूछा भी: क्या घूर रहे हो? तो वो मुझपर ही आक्रामक हो गया और बोला "अरे देख ही तो रहे हैं!" मतलब यह कि गनीमत समझो कि इसके कपड़े तो नहीं फाड़ रहे हैं!!

मेरी प्रिय पश्चिमी महिलाओं, ऐसा होने पर आप तो स्तब्ध रह जाती हैं मगर भारतीय महिलाओं के साथ तो यह अक्सर होता रहता है। बहुत बुरा होने पर आप अपने राजदूतावास चली जाती हैं और अगर वे पुलिस बुला लें तो उन घूरने वालों पर कार्यवाही भी हो सकती है, मीडिया, और देश के बुद्धिजीवी आपके पक्ष में खड़े हो जाते हैं, यहाँ तक कि अगर आप चिल्ला दें तो आसपास के लोग आपका पक्ष लेकर उस आदमी की पिटाई तक कर दें। लेकिन भारतीय महिला के साथ ऐसा अपराध होने पर कोई कार्यवाही नहीं होती क्योंकि उसके साथ होने वाले अपराध रोज़मर्रा की बात हैं, उन्हें सामान्य घटना माना जाता है। मेरी असंख्य भारतीय मित्र बताती हैं कि ऐसी एक भी स्त्री नहीं होगी, जिसे इन अनुभवों से गुज़रना न पड़ा हो।

जी हाँ, एक औसत भारतीय महिला का यही कहना है कि इस तरह नज़रों से, ज़बान से और छूने से होने वाले यौन उत्पीड़न उनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं! इसीलिए माएँ अपनी बच्चियों को मर्दों से दूर रहने की हिदायत देती हैं। इसीलिए पिता अपनी लड़कियों को ज़्यादा बाहर निकलने नहीं देते और लौटने में देर होने पर चिंतित रहते हैं। यही कारण है कि अभिभावक, लड़कियों को बाहर निकलना ही पड़े तो भाइयों या चचेरे भाइयों को भी उनके साथ भेज देते हैं और यही कारण है कि लड़कियां समूह बनाकर बाहर निकलती हैं और हमेशा अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहती हैं।

यह कहना ज्यादती होगी कि महिलाओं की तरफ बिना किसी सम्मान के घूरने वाला हर व्यक्ति बलात्कारी ही है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि हर ऐसा व्यक्ति भविष्य में बलात्कार करेगा ही। फिर भी यह चिंता तो होती ही है कि जब वह सबके सामने आँखों से बलात्कार कर रहा है तो अकेला पाकर महिला के साथ क्या कर सकता है? मौका मिलने पर वह ऐसा नहीं करेगा इसकी क्या गारंटी है?

लेकिन यह बात भी सच है कि देश में एक नई हवा बह चली है। आजकल महिलाएं स्वसुरक्षा की ट्रेनिंग ले रही हैं, पुरुषों की गलत नज़रों पर या फब्तियों पर उन्हें लताड़ना शुरू कर चुकी हैं, आप पत्र-पत्रिकाओं में उन महिलाओं और उनके समूहों के बारे में पढ़ते हैं, जो अपने अधिकारों के लिए लड़ती हैं और ज़ुल्म के खिलाफ डटकर खड़े होने की हिम्मत दिखाती हैं, आप उन्हें प्रतिवाद और प्रतिरोध करता हुआ देख सकते हैं। हम देखते हैं कि चीज़ें बदल रही हैं और हम आशा करते हैं कि इन स्थितियों में बदलाव और तेज़ होगा।

मैं अगले कुछ दिन इस समस्या के मूल में स्थित कारणों का ज़िक्र करूंगा और साथ ही भारत भ्रमण पर आई महिला पर्यटकों के लिए कुछ सुरक्षा-टिप्स देने का प्रयास करूंगा। फिलहाल इतना ही कि: अपनी सुरक्षा के आप खुद जिम्मेदार हैं!

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