पुत्रमोही और बेटीविरोधी संस्कार से यौन-अपराधों को मिलता है बढ़ावा – 11 जनवरी 13

भारतीय संस्कृति

कल मैंने बताया था कि किस तरह धर्म महिलाओं को लेकर एक ऐसे रवैये को जन्म देता है जो यौन अपराधों को बढ़ावा देता है। भारत में धर्म का लोगों के दैनिक जीवन पर और उस समाज व संस्कृति पर बड़ा प्रभाव है जिसमें हम रहते हैं – और जिसमें हमारे बच्चे बड़े हो रहे हैं। मुझे लगता है कि लोग अपने बेटों की जिस तरह से परवरिश कर रहे हैं उसमें वे लड़कियों या स्त्रियों का सम्मान नहीं करेंगे, और वे अपनी बेटियों को जिस तरह से परवरिश कर रहे हैं वह उन्हें यौन-अपराधों का आसान शिकार बनाती है। आइए मैं बताता हूं कैसे।

स्त्रियां कमज़ोर हैं और उनका स्थान पुरुषों के नीचे है। धर्म इस अवधारणा को ग्रंथों व मंत्रों से स्थापित करता है जबकि संस्कृति में यह व्यावहारिक स्तर पर होता है। यह आपके उन भेद-भाव से स्थापित होता है जो आप लड़के और लड़कियों में करते हैं। यह भेद-भाव अपने-आप में एक गंभीर समस्या है! इस कटु सत्य की शुरुआत तो यहीं से हो जाती है कि संतान के रूप में बेटे की चाह प्रबल होती है और बेटी की चाह नगन्य, और जब बच्चों का पालन-पोषण शुरू होता है तो यह भेद-भाव और मज़बूती से अपनी जड़ें जमाता है। अगर आपके घर बेटा पैदा हो तो बधाइयों की भरमार लग जाएंगी जबकि बेटी के पैदा होने पर सांत्वना मिलने लगती है।

ज़्यादातर मां-बाप के लिए एक लड़की का लालन-पालन एक लड़के की तुलना में अधिक कठिन लगता है। आख़िरकार आपको एक लड़के को ज़्यादा कुछ सिखाने की ज़रूरत नहीं होती। वह कुछ भी पहन सकता है, जहां चाहे, जब चाहे आ-जा सकता है। जबकि एक लड़की के लिए, हज़ारों की संख्या में प्रतिबंध मुंह बाए खड़े होते हैं: उसे क्या पहनना चाहिए, वह कहां जा सकती है, कब जा सकती है, किससे मिल सकती है, किससे बात कर सकती है। वह इनमें से कोई भी फ़ैसला स्वतः नहीं ले सकती! मां-बाप निश्चित रूप से उन अपराधों को लेकर परेशान रहते हैं जो हर जगह हो रहा है, तो वे उस पर प्रतिबंध लगाते हैं, उसे सिखाते हैं, सलाह देते हैं और उन सारी चीज़ों पर फ़रमान सुनाते हैं। उन्हें इस चीज़ का एहसास ही नहीं हो पाता है कि विभिन्न आशंकाओं के कारण भेद-भाव की जो दीवार वो अपने बेटे और बेटी के बीच खड़ी करते हैं वही लड़के और लड़कियों के बीच असमानता का सबसे बड़ा कारण है!

ज़ाहिर है ऐसे माहौल में लड़कियों को पालना सुखद नहीं है। इसके बाद विवाह का प्रश्न आता है! पहले एक वर की तलाश करना और फिर उसे दहेज देना! इसे एक बड़ा कार्य समझा जाता है जो एक मां-बाप अपनी बेटियों के लिए करते हैं; ज़्यादातर परिवारों का मानना है कि लड़कियां पराया धन होती हैं, बोझ होती हैं। यहां तक कि जो इस स्तर तक आकर ऐसी बातें नहीं कहते हैं, वहां भी लड़कियों को यह तो आसानी से महसूस हो ही जाता है कि उसके लिए स्थितियां उसके भाई की तुलना में अधिक कठिन है। उसके पास किसी भी तरह की स्वतंत्रता नहीं है। अपने लिए एक जीवनसाथी चुनना या अपने रिश्तों से जुड़े फैसले तो दूर की बात है, वो तो ये फ़ैसला भी नहीं कर सकती कि उन्हें किस विषय की पढ़ाई करनी चाहिए या कैसे वस्त्र पहनने चाहिए! एक ऐसे माहौल में जहां लड़कियों को इस तरह देखा जाता है, जहां उन्हें अभिशाप समझा जाता है, कौन लड़की के रूप में जन्म लेना या लड़कियों को जन्म देना पसंद करेंगी?

लड़कियों को सिखाया जाता है कि उन्हें कैसे हंसना चाहिए, कैसे चलना चाहिए, कैसे बातें करनी चाहिए, खुलकर नहीं हंसना चाहिए। ऐसे जवाब नहीं देने चाहिए जो दूसरों के विचारों के खिलाफ़ हो, भले ही आप सही हैं, लेकिन अगर आप लड़की हैं तो आपको ऐसा नहीं करना चाहिए। शांत रहिए, जवाब मत दीजिए, नज़रें झुकाकर रहिए। लड़कों को अगर ऐसा करने के कहा नहीं जाता तो उन्हें रोका भी नहीं जाता। उसकी स्वतंत्र प्रतिक्रियाओं को उसके साहस और उसकी इच्छाशक्ति के रूप में देखा जाता है।

हमें यह याद रखना होगा कि हमारा विशाल देश केवल मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों से नहीं बना है। इन महानगरों का रहन-सहन व संस्कृति शेष भारत से बहुत अलग है और इन शहरों में आप अधिक संख्या में आधुनिक विचारों वाले परिवार देख सकते हैं जहां की लड़कियां अधिक स्वाभिमानी होंगी। जब आप ग्रामीण इलाक़ों और गांवों को देखेंगे, वहां के परंपरागत माहौल में पली लड़कियों को देखेंगे, तो आपको अंदाज़ा होगा कि ये प्रतिबंध, दोनों लिंगों के बीच ये भेद-भाव हमारे देश की बेटियों को किस तरह कमज़ोर करते हैं। आप उसके प्रतिरोध की क्षमता का गला घोंट रहे हैं! आप उसे सिखा रहे हैं कि वह तो बस एक अबला अकेली स्त्री मात्र है।

एक स्त्री आज क्या नहीं कर सकती? स्त्रियां वैज्ञानिक हैं, डॉक्टर हैं, इंजीनियर हैं, शिक्षक हैं और यहां तक कि अंतरिक्ष की यात्राएं करती हैं। लेकिन क्या आपको लगता है कि अगर सुनीता विलियम्स (भारतीय मूल की महिला अंतरिक्षयात्री) संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की जगह भारत के तथाकथित पारंपरिक माहौल में पली-बढ़ी होती तो क्या वे आज इस मुक़ाम पर होतीं? मुझे नहीं लगता! दुनिया के हर हिस्से में महिला पुलिस अधिकारी हैं, सेना में स्त्रियां हैं जो युद्ध में शामिल होती हैं! आप कैसे कह सकते हैं कि वे कमज़ोर हैं? आपको अपनी बेटियों का आत्म-विश्वास बढ़ाना होगा, उन्हें ख़ुद में यक़ीन करना सिखाना होगा, उन्हें मज़बूत बनाना होगा! वे दुनिया फ़तह कर सकती हैं, लेकिन सिर्फ़ तभी जब आप उन्हें ये महसूस कराना बंद करेंगे कि वे अपने भाइयों से कमतर हैं।

इसलिए अपनी लड़कियों को पीछे चलने, मुंह बंद रखने के लिए कहना बंद कीजिए, उन्हें लड़की होने का ताना देना बंद कीजिए! और इसकी जगह उन्हें अन्याय के खिलाफ़ मुंह खोलने, अपने और दूसरों के हक़ के लिए लड़ने को कहिए! अपने बेटों को शिष्टाचार सिखाइए, वैसे ही जैसे आप अपनी बेटियों को सिखाते हैं, और सबसे ज़रूरी बात यह कि अपने सभी बच्चों को बताइए कि वे सब बराबर हैं और उन्हें एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए। हमारी संस्कृति में सम्मान और समानता की बहुत अधिक दरकार है!

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