भारतीय संस्कृति में पश्चिमी देशों की तरह अलग होने की अवधारणा नहीं है – 8 नवंबर 2009

राष्ट्रों और संस्कृतियों के बीच आवाजाही करने वाले एक यात्री के रूप में मैं विभिन्न संस्कृतियों के बीच तुलना करना पसंद करता हूँ और यह जानना भी कि दूसरे देशों में लोग कैसे जीवन गुजारते हैं, कैसे उनके बच्चे बड़े होते हैं और इस विकसित होने की प्रक्रिया में उनके मन-मस्तिष्क में कौन सी बातें गहराई तक उतर जाती हैं।

निस्संदेह, जिन्हें यात्रा करना पसंद है वे इन चीजों पर गौर करना भी पसंद करते हैं और जब वे वापस आते हैं तो यह तुलना किए बगैर नहीं रह सकते कि यहाँ, भारत में स्थिति क्या है। एक बार हमारे एक मित्र ने पूछा कि यहाँ युवा अपना घर छोडकर कब बाहर निकलते हैं और कब अपना अलग घर बसाते हैं।

मैं इस बारे में सोचता रहता हूँ और मुझे हंसी आती है। मैं कभी बाहर नहीं निकला। मैं यहाँ अपने अभिभावकों और अपनी नानी के साथ रह रहा हूँ और साथ में मेरे दो भाई भी हैं और उन्होंने भी कभी ‘बाहर निकलने’ के बारे में नहीं सोचा। यह भारत की विचार-पद्धति ही नहीं है। यह भारत की संस्कृति में ही नहीं है कि बच्चे यह सोचें कि उनका कोई अलग घर हो, कोई फ्लॅट हो, सिर्फ उनके लिए।

हाँ, कभी-कभी यह होता है कि बच्चे पढ़ने के लिए कहीं बाहर चले जाते हैं या कहीं दूसरी जगह नौकरी करने लगते हैं लेकिन अपना घर छोडने की बात कभी उनके मन में नहीं आती। इसके विपरीत वे कोशिश करते हैं कि अपने घर में ही अपने अभिभावकों के साथ किसी तरह रह सकें। एक बच्चा किसी भी उम्र में, किसी भी सामान्य परिस्थिति में अपने अभिभावको को छोडकर अलग रहने का विचार कर ही नहीं सकता।

यह सामान्य सी बात है कि एक लड़की विवाह के बाद अपना घर छोड देती है मगर फिर वह, आम तौर पर, अपने पति और सास-ससुर के साथ रहने लगती है। और जब किसी लड़के का विवाह होता है तो उसके माँ-बाप अपने घर में बहू का स्वागत करते हैं। तो, इस बारे में यहाँ यह विचार-पद्धति पाई जाती है और पश्चिम के लोगों को यह कुछ अजीब लगता होगा लेकिन भारत में लोग इसी तरह सोचते हैं कि अगर (लड़का या) लड़की अलग होकर बाहर निकलती है तो वह अकेलापन महसूस करेगी, लोगों की कमी महसूस करेगी। यहाँ आने पर आप यह अंतर अवश्य अनुभव करेंगे।

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