सारी समस्याओं के लिए पाश्चात्य सभ्यता को दोष देने से नहीं बदलेगी सूरत – 15 जनवरी 13

बीते हफ़्तों में कई राजनेताओं और दूसरी महत्वपूर्ण शख्सियतों ने दिल्ली बलात्कार मामले पर अपनी राय रखी है और ऐसे अपराधों के कारण बताए हैं। भारत में रहने वाले संकीर्ण मानसिकतावादी लोगों व तथाकथित परंपरा के वाहकों में यहां हुए हर अपराध के लिए पाश्चात्य सभ्यता को ज़िम्मेदार ठहरा देने का एक अजीब चलन है। उन्हें पाश्चात्य सभ्यता पर ऊंगली उठाने में एक सैकेंड भी नहीं लगता। मेरे विचार में यह एक बेहद अतार्किक आरोप है और अपनी सभ्यता, अपने राष्ट्र में मौजूद ख़ामियों से लोगों का ध्यान भटकाने का एक घटिया प्रयास है।

सच यह है कि सुरक्षा, विशेषकर स्त्रियों की सुरक्षा के मामले में भारत की स्थिति पश्चिम में मौजूद स्थितियों से बदतर है। मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर ऐसा कह सकता हूं क्यूंकि मैं दोनों सभ्यताओं में रहता हूं। मैं भारत में पला-बढ़ा हूं और देश के लगभग सभी हिस्सों को क़रीब से देखा है लेकिन पिछले बारह वर्षों से मैं पश्चिमी देशों में जीवनयापन कर रहा हूं, मैंने पश्चिम देशों की खूब यात्राएं की है। आप यहां की तरह वहां रोज़-रोज़ बलात्कार और यौन-अपराधों की ख़बर नहीं पढ़ेंगे। यहां आप दो से अस्सी वर्ष तक की स्त्री के बलात्कार की ख़बर आसानी से ढूंढ़ लेंगे लेकिन जर्मनी में एक ऐसी ख़बर इतना हाहाकार मचा देगी कि बात पूरे देश में फैल जाएगी! यहां की तरह वहां इतने जघन्य अपराध नहीं होते। आप आंकड़ों में भी यह देख सकते हैं। मेरा निजी अनुभव जिस पर मैं बात करना चाहता हूं, वो हालांकि इन आंकड़ों से इतर है, वो मानसिकता और रवैये से जुड़ा है।

पश्चिम में, जब एक लड़की बस में प्रवेश करती है, वह पूरे विश्वास के साथ भीड़ के बीच बिना किसी छेड़-छाड़ के खड़ी हो सकती है। आधी रात को एक युवा लड़की ट्रेन में इत्मीनान से सफ़र कर सकती है। कई जगहों पर वो घर तक बिना किसी भय के पैदल उन रास्तों से जा सकती है जहां कोई नहीं है। भारत में ऐसा नहीं है। आप अपने घर की स्त्रियों से अंधेरा होने के पहले लौट आने का आग्रह करते हैं और वे लौट भी आती हैं क्योंकि वे सड़कों पर सुरक्षित महसूस नहीं करतीं। यहां तो वे दिन के उजाले में भी सुरक्षित महसूस नहीं करती!

मैं पाश्चात्य सभ्यता की प्रशंसा नहीं कर रहा, न ही भारतीय संस्कृति को नीचा दिखाने का प्रयास कर रहा हूं। मैंने दोनों सभ्यताओं की कई सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं के बारे में लिखा है। हालांकि मुझे यह बिल्कुल भी न्यायोचित नहीं लगता कि आप हर बात के लिए पश्चिमी सभ्यता को कठघड़े में खड़ा कर दें। क्यूं न हम वहां की सभ्यता के सकारात्मक पहलू को देखें और उन्हें यहां व्यवहार में लाएं? बेशक, अपराध वहां भी हैं, बलात्कार वहां भी होते हैं, लेकिन स्त्रियों को लेकर वहां जो रवैया है, अपराध को लेकर वहां जो रवैया है, वह यहां के समाज से बिल्कुल अलग है।

जो कुछ भी मैं लिख रहा हूं उसकी केवल एक वजह है कि मेरा देश जिस हालत में है उसके बारे में सोचकर मुझे तक़लीफ़ होती है। मुझे अपने राष्ट्र से प्यार है लेकिन मुझे भारतीय होने का गर्व नहीं है, उल्टा मैं शर्मिंदा महसूस करता हूं। हम किस तरह के समाज में रह रहे हैं? हम इसे सबसे बड़ा धार्मिक देश और देवालय मानते हैं? क्या महानता ऐसी दिखती है? चाहे राजनीति हो, नौकरशाही हो, धार्मिक जगत हो या किसी एक जन साधारण का दैनिक जीवन हो भ्रष्टाचार और अपराध सब जगह व्याप्त है। मैं उन्हें संबोधित करना चाहता हूं जो हमेशा धर्म और संस्कृति का झंडा उठाए खड़ा रहते हैं: अगर आप अपने देश की सारी दिक़्क़तों के लिए पाश्चात्य सभ्यता को दोष देते रहेंगे तो आपको इनका हल कभी नहीं मिलेगा। आपको समस्या की तह तक जाना चाहिए, अगर आप ऐसा करेंगे तो आपको पता चलेगा कि दिक़्क़त दरअसल लोगों के सोचने के तरीक़ों में बैठा है। जब तक जनसामान्य की सोच में परिवर्तन नहीं आएगा, आप भारत को स्त्री के खिलाफ़ होने वाले अपराधों से मुक्त नहीं कर सकते।

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