शनिवार को हम दिल्ली गए थे। हमें कुछ ख़रीदारी करनी थी, कुछ रोज़मर्रा की चीज़ें और सबसे प्रमुख: हम अपरा के लिए ट्रेंपलीन (उछाल-पट) खरीदना चाहते थे।
जर्मनी में हमने खेल के कई मैदानों में बच्चों के उछलने-कूदने के लिए ट्रेंपलीन रखे हुए देखे थे। शुरू में अपरा उन पर चढ़ने में थोड़ा झिझकती रही मगर कुछ मिनट बाद जब उसकी झिझक दूर हुई तो उसने उस पर जबरदस्त उछल-कूद मचाई! यह देखकर और यह समझकर कि बच्चों के अंगों के सामंजस्य और शारीरिक संतुलन के विकास में यह उपकरण काफी लाभदायक हो सकता है, हमने उसे अपरा और आश्रम के दूसरे बच्चों के लिए खरीदने का निर्णय किया।
यह इरादा करके हमने कुछ ऑनलाइन खोज की और हमें पता चला कि न सिर्फ कई दुकानें यह उपकरण बेचती हैं बल्कि भारतीय वैबसाइट, ओ एल एक्स का पता भी चला, जिस पर लोग अपना पुराना सामान बेच सकते हैं और जहाँ दिल्ली के पास फरीदाबाद की एक महिला अपना पुराना ट्रेंपलीन बेचना चाहती थी। वैबसाइट पर कीमत 2000 रुपए दर्ज थी और यह अच्छा सौदा हो सकता था क्योंकि 40 इंच वृत्त वाले नए ट्रेंपलीन की कीमत लगभग 4000 रुपए तक हो सकती थी। तो इस वैबसाइट पर जीवन में पहली बार हमने यह सामान खरीदने का मन बनाया।
वहाँ दर्ज फोन नंबर पर हमने बात की और पूछा कि क्या वह बिक चुका है या हम अभी खरीद सकते हैं और यह भी कि उसे लेने हमें ठीक किस जगह आना होगा। महिला ने जवाब दिया कि ट्रेंपलीन अभी बिका नहीं है और उसी के पास है। उसने हमें अपना पता बताया, जिससे हम पैसे देकर उसे ले जा सकें। क्योंकि भारत में किसी भी चीज़ को खरीदने में मोल-भाव किया जाता है इसलिए मैंने भी आदतन उससे कहा कि क्या वह ट्रेंपलीन की कीमत कुछ कम कर सकती है, कुछ कम रुपयों में उसे हमें दे सकती है। महिला ने जवाब दिया कि इस तरह वैबसाइट पर वह पहली बार सामान बेच रही है और जो भी पैसे हम दे देंगे, उसे मंजूर होगा।
खैर, हम अपरा को साथ लेकर भरी दोपहर में उसके घर पहुँचे और उसने हमें खुशी-खुशी अपना ट्रेंपलीन दिखाया। अपरा थोड़ा सा उस पर उछली-कूदी और परिवार के सदस्यों ने बताया कि उस पर खेलने-कूदने वाला अब उनके यहाँ कोई नहीं है और वह यूँ ही पड़ा खराब हो रहा था इसलिए उन्होंने उसे ऑनलाइन बेचने का इरादा किया है। हम देख रहे थे कि वह अच्छी हालत में था और इसलिए उसे खरीदने में हमें कोई परेशानी नहीं थी। लिहाजा हमने उसे लेने का मन बना लिया।
हमने वहाँ ज़्यादा समय बरबाद नहीं किया क्योंकि दिल्ली में हमें और भी काम थे। मैंने फिर पूछा कि "बताइए, ट्रेंपलीन के आपको कितने पैसे दिए जाएँ" और उसने भी फिर वही जवाब दिया: "मैंने तो आपसे कहा, हमने लिखा तो 2000 रुपए है मगर क्योंकि यह हमारा पहला मौका है, आप जो चाहें, दे दें।"
पूर्णेन्दु ने अपनी जेब से 1500 रुपए निकाले और उसे थमाए। बिना पैसों की तरफ देखे, बिना गिने उसने उन्हें पास रखे सोफ़े पर रख दिया और हम भी अपना ट्रेंपलीन उठाकर चल दिए। परिवार का ड्राईवर उसे उठाकर हमारे साथ आया। अभी हम लिफ्ट से नीचे ही उतर रहे थे कि फोन की घंटी बज उठी। वही महिला थी, जिसने अभी-अभी हमें ट्रेंपलीन बेचा था: "आपने सिर्फ 1500 रुपए दिए हैं!" मैंने जवाब दिया, "हाँ, आप ही ने तो कहा था कि जो चाहें, दे दें! और फिर आपने उसी समय उसे गिना क्यों नहीं और जब हम आपके फ्लैट में थे तभी क्यों नहीं कहा कि और चाहिए?" अब उसका कहना था: "आपको कम से कम 1800 तो देना ही चाहिए! मुझे आपके सामने रुपए गिनने में संकोच हो रहा था…"
यह बड़ी ही मज़ेदार बात थी! लेकिन मैंने उससे कहा कि मैं उसके ड्राईवर के हाथ 300 रुपए और भिजवा रहा हूँ और ये पैसे मैंने भेज भी दिए। मुझे ज़रा भी बुरा नहीं लगता अगर उसने उसी वक़्त मुझसे 300 रुपए मांग लिए होते। मैं 2000 रुपए भी देने के लिए तैयार हो जाता! इसीलिए मैंने उससे दो बार पूछा था और अंत तक उसकी स्पष्ट मर्ज़ी जानने की कोशिश की थी कि वह अपने सामान की कितनी कीमत चाहती है!
इसे याद करके बाद में भी हम बहुत देर तक हँसते रहे- उसने शुरू में ही साफ-साफ अपनी कीमत क्यों नहीं बताई? हमारे दिए हुए रुपए उसने हमारे सामने गिने क्यों नहीं? क्या उसे लग रहा था कि मैं उसके मन में चल रहे विचार जान जाऊँगा कि उसे कितने रुपए चाहिए? और अगर वह बहुत नम्र दिखाई देना चाहती थी तो फिर बाद में फोन करके अतिरिक्त 300 रुपए मांगने का क्या अर्थ है? एक तरह से यह एक टिपिकल भारतीय रवैया है- लेकिन है यह बड़ा ही हास्यास्पद!
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