ईमानदार रहिए, अच्छे रहिए, प्यारे और भोलेभाले दिखाई दीजिए मगर धोखेबाजी से नहीं! 9 सितम्बर 2014

भारतीय संस्कृति

अपने दिल्ली प्रवास में शनिवार को मेरे साथ हुई एक घटना का ज़िक्र करते हुए मैंने आपको बताया था कि वहाँ एक महिला के नम्रता-प्रदर्शन पर हम खूब हँसे थे। नम्रता-प्रदर्शन भारतीयों की एक आम आदत है जो अक्सर बड़ी झूठी लगती है मगर सच होने पर कई बार उसे देखकर बड़ा अच्छा लगता है।

अगर आप दिल्ली में मेरे साथ हुई घटना पर गौर करें तो पाएँगे कि वह महिला नम्र दिखाई देना चाहती थी मगर वास्तव में उसकी नम्रता महज एक दिखावा था। उसने कहा तो यह कि मैं अपनी मर्ज़ी से कीमत अदा करूँ लेकिन जब मैंने ठीक वही किया तो वह इतना नाखुश हो गई और उसका फ़्लैट छोड़ने के बाद मुझे अपनी इच्छानुसार बकाया रकम वसूल करने के लिए फोन किया।

भारत आने के बाद शुरू में रमोना को भी ऐसे ही कई अनुभव हुए थे। किसी समारोह में वह किसी महिला से मिली और उसके साथ उसकी बड़ी अच्छी बातचीत भी हुई। उसने रमोना से कहा कि वह हमें बहुत अच्छी तरह से जानती है। फिर उस महिला ने उसे अपने घर बुलाया। रमोना बड़ी खुश हुई और उसके यहाँ आने पर तुरंत सहमत हो गई क्योंकि उस वक़्त वृन्दावन में उसके ज़्यादा मित्र नहीं थे। फिर रमोना ने उसके बारे में हमसे चर्चा की और पूछा कि वह कहाँ रहती है-लेकिन हममें से कोई भी उस महिला को बिल्कुल नहीं जानता था! जब वह रमोना से यह सब कह रही थी तब भी वह जान रही थी कि रमोना उसके घर किसी भी तरह नहीं पहुँच पाएगी क्योंकि हममें से कोई भी उसका मित्र नहीं था। इसके बावजूद वह ऐसा ज़ाहिर कर रही थी जैसे हम एक-दूसरे के बचपन के दोस्त थे!

दूसरी तरफ, कई बार आपको बहुत गंभीरतापूर्वक भी आमंत्रित किया जाता है। आप ख़ुशी-ख़ुशी उनके यहाँ जा सकते हैं और वहाँ आपको आदरपूर्वक भोजन कराया जाता है, चाय पिलाई जाती है, नाश्ता कराया जाता है या मिठाई खिलाई जाती है! भले ही उनका घर अव्यवस्थित हो, उतना साफ़-स्वच्छ न हो, उस वक़्त किसी मेहमान के आने की उन्हें अपेक्षा भी न हो तब भी वे दिल से आपका स्वागत करते हैं!

दुनिया भर में भारतीय अपनी मेहमाननवाज़ी और दूसरों की मदद करने के अपने स्वभाव के लिए जाने जाते हैं और वास्तव में इसमें कोई शक नहीं है। आम भारतीय न सिर्फ स्वभाव से ही नम्र होते हैं बल्कि लोगों को अपने घर बुलाकर स्वागत करते हैं, मेहमानों के साथ खुला, निश्छल व्यवहार करते हैं और दूसरों के प्रति सहिष्णुता और संवेदनशीलता प्रदर्शित करने के लिए प्रसिद्ध हैं। फिर इस तरह की झूठी नम्रता कहाँ से आती है, वे ऐसा क्यों करते हैं कि कहते तो प्यार भरी बातें हैं मगर उनका वास्तव में कोई अर्थ नहीं होता?

मुझे लगता है कि लोग जानते हैं कि क्या कि उन्हें कैसा ‘होना चाहिए’। उन्हें यह मालूम है कि उन्हें नम्र और दूसरों के स्वागत के लिए आतुर होना चाहिए। कि दूसरों को अपने घर बुलाकर उनका स्वागत करना अच्छी बात है और हाँ, सीधे-सीधे पैसे नहीं मांगने चाहिए भले ही आप अपनी कोई चीज़ बेच रहे हों क्योंकि आप अपनी चीजों का व्यवसाय नहीं कर रहे हैं। तो इस तरह के मूल्य और नैतिकताएँ समाज में व्याप्त हैं और हालाँकि लोग मन में ऐसा नहीं सोचते, वे उन्हीं अलिखित नियमों के दायरे में भले दिखाई देने की कोशिश करते हैं। वे सभ्य और अच्छे व्यक्ति होने का नाटक करते हैं और वास्तव में उनके शब्द उनके असली मकसद पर पड़ा पर्दा होते हैं।

जबकि मैं मानता हूँ कि लोगों को खुले दिल वाला, दूसरों का स्वागत करने के लिए तत्पर और एक दूसरे के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, लेकिन इसका यह उचित तरीका नहीं है। अगर आपकी इच्छा नहीं है तो किसी को घर बुलाने की कोई आवश्यकता नहीं है। और अगर अपनी किसी वस्तु की आप कोई निश्चित कीमत चाहते हैं तो ‘जो चाहे, दे दें’, कहकर सामने वाले को उलझन में डालने की भी आवश्यकता नहीं है! बाद में यही बातें आपके सामने कई दूसरी समस्याएँ खड़ी कर सकती हैं!

ईमानदार रहिए, अच्छे दिखाई दीजिए, प्यारे और भले लगने की पूरी कोशिश कीजिए मगर झूठ बोलकर नहीं!

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