एक घटना जो बताती है कि भारत में बच्चों के खिलाफ हिंसा सामान्य बात है – 15 नवम्बर 12

भारतीय संस्कृति

दीपावली का त्योहार बीत चुका है। खुशियों भरे इन पलों के बाद जीवन एक बार फिर सामान्य ढर्रे पर आ जाएगा। कल से स्कूल खुल जाएंगे। ऐसे में आश्रम के बच्चे छुट्टी का आनंद ले रहे हैं। उन्हें इस बात की चिंता भी है कि कल की थोड़ी तैयारी करनी है, स्कूल ले जाने वाली किताबें निकालनी हैं। आश्रम में आए मेहमान भी ये जानने को इच्छुक रहते हैं कि आश्रम के बच्चे कौन हैं, वे कहां से आये हैं और उनके पारिवारिक हालात कैसे हैं। इतना ही नहीं वे आश्रम के बच्चों के साथ समय गुजार कर और खेल कर आनंदित होते हैं। उनके लिए आश्रम के बच्चों के साथ समय गुजारना भारत और यहां के लोगों के बारे में गहनता से जानने का एक मजेदार तरीका है। कुछ हफ्ते पहले एक ऐसी घटना हुई थी जिसने उन्हें यहां के जीवन का एक और पहलू दिखाया था। इसके बारे में मैं पहले लिख चुका हूं और यहां खत्म करना चाहता हूं – बच्चों के खिलाफ हिंसा।

स्थिति कुछ इस प्रकार थी – हमारे एक मेहमान आश्रम के प्रवेश परिसर में छोटे बच्चों के साथ खेल रहे थे। उनमें से एक बच्चे ने देखा कि उसके पिता उससे मिलने आ रहे हैं। कुछ महीने पहले ही इस बच्चे की मां का निधन हुआ था और पिता के काम पर जाने के बाद ये घर में पूरे दिन अकेला ही रहता था। तब इसके पिता ने हमसे पूछा था कि क्या हम उसके बच्चे की देखभाल कर सकते हैं। पड़ोस में रहने की वजह से वो अक्सर अपने बेटे से मिलने आता रहता था और कोई भी इस बात पर ध्यान नहीं देता था कि पिता-पुत्र के बीच क्या बातचीत हुई। लेकिन उस दिन पिता ने किसी बात पर कुछ कहना शुरू किया तो दूसरे बच्चे खेलना छोड़ कर उन्हें देखने लगे। स्वाभाविक था कि हमारे मेहमान ने भी उन्हें देखा, और उसी क्षण पिता ने हाथ उठाया और बेटे के गाल पर थप्पड़ जड़ दिया। थप्पड़ की गूंज सबको सुनाई दी और आश्रम के बच्चों का सीधा विरोध भी। बच्चे कह रहे थे कि आश्रम में कोई भी किसी को भी नहीं मार सकता चाहे वह छोटा हो या बड़ा।

आप इस बच्चे की भावनात्मक स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं। स्कूल के काम में कुछ गलती की वजह से उसे सभी बच्चों के सामने मारा गया था और उससे भी बढ़कर एक मेहमान के सामने उसकी पिटाई हुई थी। इस वाकये से उस मेहमान की भावनाएं भी आहत हुईं थीं जिसे पिता-पुत्र की बातचीत का एक भी हिस्सा समझ में नहीं आया था। वो वहां बैठी खुद से पूछ रही थी कि माजरा क्या है और क्या उसे बच्चे के साथ हुई हिंसा को रोकना चाहिए था।

उसने ये बात हमें बताई। पूरी स्थिति के बारे में हमें बताया। उसकी जागरूकता देखकर हमें खुशी तो हुई लेकिन दुर्भाग्य से हम सिर्फ सॉरी ही कह सकते थे और ये कि आश्रम में इस तरह घटनाएं स्वीकार्य नहीं हैं। निश्चित रूप से हम पिता को कह सकते थे कि बेटे को फिर कभी ना मारे लेकिन हम ये भी जानते हैं कि घर में पिटने वाला ये अकेला बच्चा नहीं है। लोगों के घरों में ये बहुत ही सामान्य बात है और हाथ उठाने से पहले वे सोचते तक नहीं हैं। बच्चे को बुरा लगा, हमारे मेहमान को बुरा लगा, हमें बुरा लगा लेकिन जिस एक शख्स की वजह से ऐसा हुआ उसे जरा भी बुरा नहीं लगा – और वो था पिता। जिसके लिए बेटे की पढ़ाई के मद्देनजर ये कदम बेहद जरूरी था।

ऐसा नहीं है कि पिता अपने बच्चे से प्यार नहीं करता। वो बच्चा दीपावली मनाने के लिए पिता के पास ही गया। इस घटना से हम ये समझ सकते हैं कि क्यों कुछ बच्चे वर्षों से यहां रह रहे हैं। यहां तक कि छुट्टियों के दिनों में भी घर जाने की इच्छा नहीं रखते। दरअसल, दिक्कत ये है कि लोगों में इस बात की जागरूकता नहीं है कि बच्चे को मारना भी हिंसा ही है। ये आपको नहीं करनी चाहिए। क्योंकि पिटाई की वजह से बच्चों में गुस्सा और दुख घर कर जाता है।

बच्चों से कैसा बर्ताव करते हैं, कैसे उनकी दिक्कतें दूर करते हैं और बिना मारपीट किए या हिंसक रूप से डराए-धमकाए बिना कैसे उनका विकास करते हैं – इस पर हमारे स्कूल और आश्रम में उदाहरण देकर हिंसा कम करने के लिए हम अपने प्रयास जारी रखेंगे। क्योंकि हिंसा सिर्फ हिंसा को बढ़ावा देती है और कुछ नहीं करती। अपने बच्चों से प्यार भरा बर्ताव करें, तभी वे प्रेम करना और आपसे और अपने बच्चों से भी प्रेमपूर्ण व्यवहार करना सीखेंगे।

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