ज़्यादा दहेज के लिए गाली-गलौज, मार-पीट और हत्या – 30 मार्च 2011

कल मैंने बताया था कि अगर कोई महिला पुत्र को जन्म नहीं देती तो उसका पति, सास-ससुर और सारा परिवार ही उस महिला पर अपना गुस्सा उतारता है और कई बार बहुत हिंसक भी हो उठता है। अगर कोई महिला दुर्भाग्य से ऐसी मानसिकता वाले परिवार में विवाह करके आती है तो यह घरेलू हिंसा बच्चे होने से पहले भी शुरू हो सकती है। और दहेज की यह घिनौनी प्रथा ही इसका कारण होती है।

पहले दूल्हे का परिवार इसे एक बड़ा व्यापार ही बना चुका होता है। बहुत सारा समय वे ऐसी उचित कन्या की तलाश में लगाते हैं जिसके परिवार के पास उनके 'लड़के को खरीदने' के लिए पर्याप्त धन-संपत्ति हो और 'सौभाग्य' भी कि वह उनके परिवार की बहू बन सके। वे लड़की के माँ-बाप के साथ बहुत मोल-भाव करते हैं और आखिर में एक निश्चित राशि पर और गहने-ज़ेवरातों पर बात तय होती है जो विवाह से पहले लड़की वालों को देना पड़ता है। मगर विवाह के तुरंत बाद बेचारी लड़की आश्चर्य चकित रह जाती है की लड़का और उसे परिवार वाले और ज़्यादा चाहते हैं!

छोटे-मोटे तानों से बात शुरू होती है जैसे लड़की से कहा जाता है कि तुम्हें लड़का काफी सस्ते में मिल गया। पति कहेगा, उसकी बहन को हम लोग इससे बहुत ज़्यादा दहेज के साथ विदा कराएँगे। धीरे-धीरे उससे कहा जाएगा कि वह यह न समझे कि वह बहुत ज़्यादा माल लेकर आई है, दरअसल उसके पिता को इससे ज़्यादा दहेज देना चाहिए था।

वे लड़की पर दबाव बनाते जाते हैं कि वह अपने माँ-बाप से कहे कि अभी भी वे रुपया दे दें। फिर धमकाने लगते हैं कि उसकी पिटाई भी हो सकती है। बात बिना बात गलियाँ देना शुरू कर देते हैं। अगर लड़की माँ-बाप से यह सब कहती है तो वे बेचारे पूरी कोशिश करते हैं कि उनकी बेटी के साथ कोई ज्यादती न हो, कोई गाली-गलौज या मार-पीट न हो और अपनी हैसियत के मुताबिक वे कुछ न कुछ दे ही देते हैं।

दुर्भाग्य से होता यह है कि ऐसे अभद्र लोग संतुष्ट नहीं होते बल्कि लड़की के बाप की कमजोरी समझ जाते हैं और फिर और अधिक पैसे की मांग करने लगते हैं। लड़की के साथ उनका व्यवहार और अभद्र होने लगता है। गाली-गलौज और मार-पीट के बाद अगर बात नहीं बनती तो वे उसकी हत्या तक करने से बाज नहीं आते। कई बार वे उसे इतना प्रताड़ित करते हैं कि वह अपने शरीर पर मिट्टी का तेल छिड़ककर आत्महत्या करने की कोशिश करती है या फिर उसके सास-ससुर खुद ही यह काम अंजाम देते हैं। अधिकतर ये हत्याएँ रसोई में दुर्घटना या आत्महत्या के रूप में प्रचारित की जाती हैं। कदाचित ही हत्या के रूप में उसकी जांच की जाती है।

"1997 की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दहेज हत्याओं में कम से कम 5000 महिलाएं हर साल मारी जाती हैं और एक दर्जन महिलाएं हर रोज़ रसोई में आग लगने से मरती हैं और उन्हें 'इरादतन' आग लगाना माना गया है। इसे 'बहू जलाना' कहा जाता है और भारत में भी इसकी सर्वत्र भर्त्सना होती है।" (सूत्र: विकिपीडिया)

इस मामले में भारत में हालात बहुत ही बुरे हैं। हम रोज़ ही ऐसी घटनाओं के बारे में सुनते हैं, अखबारों में पढ़ते हैं और ऐसे समाज में पलते हुए बड़े होते हैं। ये पंक्तियाँ लिखते हुए मुझे याद आ रहा है कि मैं बचपन में सोचा करता था कि मैं एक ऐसी लड़की से विवाह करूंगा जिसके भाई का विवाह मेरी बहन से हुआ हो। ऐसा करने से शायद मैं अपनी बहन को उसके घर वालों की प्रताड़ना से बचा सकूँगा। मेरा बाल मन इतना ही सोच पता था और अपनी बहन को समाज के ज़ुल्मों से बचाने का उसे यही तरीका सूझता था। बाद में वयस्क होने पर विवाह के बारे में मेरा नज़रिया एकदम बदल गया और विवाह करने की इच्छा ही समाप्त हो गई। चार साल पहले मेरी बहन भी अविवाहित ही इस संसार से कूच कर गई।

हम आज कुछ दिनों के लिए भारत छोडकर, जर्मनी के लिए रवाना हो रहे हैं और हमेशा की तरह मेरे मन में देश छोडने का दुख है लेकिन मैं जर्मनी में अपने मित्रों से मिलने और वहाँ कुछ नया काम शुरू करने के उत्साह से भर गया हूँ।

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