मैं आपको एक कहानी सुनाना चाहता हूँ जिसे मेरे कुछ ब्लॉग पढ़ने के बाद एक मित्र ने मुझे भेजा है। यह कहानी एक सत्य-कथा है जो स्पष्ट करती है कि आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) और रूढ़िबद्ध परंपरावादी विचार किस तरह दो मासूम ज़िंदगियों को बरबाद कर सकते हैं। यह सत्य-कथा इस प्रकार है:
"साढ़े तीन साल पहले सोशल मीडिया के जरिये एक पश्चिमी महिला और एक भारतीय लड़के के बीच मुलाकात हुई। जल्द ही दोनों के बीच करीबी संबंध बन गए और वे आपस में अपने जीवन के दुख-सुख साझा करने लगे। वे एक दूसरे को ढाढ़स बँधाते, एक दूसरे की मदद करते। उन्हें लगा कि उनके बीच साधारण मित्रता के अतिरिक्त भी कुछ पनप रहा है।
आखिर उनकी रूबरू मुलाकात होती है और महिला उन परेशानियों को समझकर जोकि किसी कम उम्र और किसी दूसरे धर्म और संस्कृति से आए लड़के के साथ नजदीकी रिश्ता बनाने पर हो सकती है, अपेक्षा करती है कि यह एक अच्छी मित्रता ही बनी रह पाए तो भी बहुत है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। लेकिन होता इसके बिल्कुल विपरीत है! दोनों को कुछ ही समय में महसूस होने लगता है कि वे सालों से एक दूसरे को जानते हैं। दोनों के बीच संबंध और प्रगाढ़ होते जाते हैं।
दिल्ली का वह भारतीय लड़का अभी नौकरी ढूंढ रहा था और उसे बैंगलोर से एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए इंटरव्यू का बुलावा आया। उसके पिता के सहकर्मी के जरिये यह संभव हुआ था। इंटरव्यू अच्छा हुआ और वह कंपनी के निर्णय का इंतज़ार करते हुए बैंगलोर में ही रुक गया। इसी दौरान उसे एहसास हुआ कि वह तो बैंगलोर में रह ही नहीं पाएगा। उसके पिता ने इस बीच उसे बताया कि यह नौकरी किसी भी हालत में उसे छोडनी नहीं है क्योंकि उसकी नौकरी सुनिश्चित हो जाने के बाद वे अपने सबसे छोटे लड़के के लिए घर गिरवी रखने की योजना बना रहे हैं। उसके पिता 2 साल बाद सेवानिवृत्त हो रहे थे।
वह युवा उससे की जा रही परिवार की बड़ी-बड़ी अपेक्षाओं को समझ रहा था और हालांकि उसे यह उचित नहीं लगा मगर इन अपेक्षाओं में वह उलझ गया था। उसका दम घुट रहा था मगर उसे अपनी नियति स्वीकार करनी ही थी। माह भर बाद उसने अपनी पश्चिमी महिला को बताया कि उसका एक हिन्दू लड़की के साथ मिलना-जुलना शुरू हो गया है क्योंकि वह उसके परिवार को स्वीकार्य होगी और अगर वह खुद यह काम नहीं करेगा तो उसके परिवार वाले खुद कोई लड़की उसके लिए तय कर देंगे। (हालांकि उसके माता-पिता का विवाह भी आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) नहीं था और वे लोग काफी प्रगतिशील विचारों के थे। उनका परिवार आम मध्यवर्गीय परिवार था और उसके पिता एक बड़ी कंपनी में प्रबंधक थे। बच्चों के विभिन्न जातियों के और विभिन्न धर्मों को मनाने वाले मित्र थे।) उसने अपनी महिला मित्र को बताया कि वह उससे बहुत प्यार करता है लेकिन उनकी यही नियति है क्योंकि उनका साथ रहना संभव नहीं है।
वह पश्चिमी महिला अपने उस भारतीय मित्र के सबसे अच्छे और करीबी दोस्त से, जिसे वह भाई कहता था, इस बारे में लंबी बात करती है। यह दोस्त लड़के की किसी दूसरी हिन्दू गर्लफ्रेंड के बारे में नहीं जानता था और समझ गया कि उसका दोस्त किसी मनगढ़ंत हिन्दू लड़की की बात करके उस पश्चिमी महिला से दूर होना चाहता है। दोस्त के लिए यह सदमे की तरह था क्योंकि लड़के ने उसे बताया था कि उस पश्चिमी महिला से वह इतना प्रेम करता है कि उसके बिना रहने की कल्पना भी उसके लिए मुश्किल है और पता नहीं, आगे क्या होगा यह सोच-सोचकर वह बहुत परेशान भी है।
स्वामी जी, मैं आपके ब्लॉग रोज़ पढ़ती हूँ। उनसे मुझे भारत और भारतीय समाज के बारे में जानने का अवसर मिलता है। मैं समझती हूँ कि भारत में स्थितियाँ धीरे-धीरे बदल रही हैं। मेरा दोस्त बहुत प्रगतिशील है मगर भावनात्मक रूप अपने परिवार के बहुत निकट भी है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि सिर्फ परिवार की असहमति और नाराजी पर वह अपने सच्चे प्रेम को भी कुर्बान कर सकता है।"
यह एक कटु सत्य है लेकिन मैं ऐसी परिस्थितियों से अच्छी तरह वाकिफ हूँ। हमारे समाज में यह बहुत सामान्य सी बात है। ऐसे कई प्रकरण देखने में आते हैं जिनमें दोनों में से कोई एक इसी तरह दूसरे का परित्याग कर देता है क्योंकि वह दूसरी जाति का है-वे अपने परिवार के विरुद्ध जाने की, किसी का दिल दुखाने की बात सोच भी नहीं पाते और परिवार द्वारा चुने गए अपने भावी जीवन-साथी के साथ सारा जीवन दुख में बिताने के लिए तैयार हो जाते हैं। मैं आशा करता हूँ कि यह व्यक्ति इस बात को समझेगा कि अपने दिल की बात मानने पर ही जीवन में सच्ची खुशी प्राप्त की जा सकती है।
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