एक बार आदत हो जाए तो यह सब मज़ेदार लगेगा: मंज़िल पर आकर लड़खड़ाने की भारतीय आदत- 25 जुलाई 2013

भारतीय संस्कृति

कल मैंने भारतीयों की एक आदत के बारे में विस्तार से लिखा था, जिसे समझने में और जिससे निपटने में, खासकर दूसरे देशों के लोग, गलती कर बैठते हैं या कठिनाई महसूस करते हैं। वह है उनकी शालीनता और औपचारिकता। इस आदत के अलावा कि आप कई भारतीयों को बहुत नम्र पाएंगे, आप यह भी महसूस करेंगे कि वे कोई नया काम करने में बहुत उत्साही होते हैं, कोई भी नई परियोजना, कुछ नया सृजन, जिससे कुछ बदलाव हो सके और अपने विचारों को कार्यरूप में परिणत किया जा सके। यह शुरुआत में होने वाला जोश है। कुछ समय बाद अगर आप उनके काम को देखें, ऐसे समय, जब आपको लगता है कि अब काम अंतिम चरण में है, आप उनका बिल्कुल दूसरा ही रूप देखेंगे। आपको यह एहसास होगा जैसे वे किसी दूसरी परियोजना, किसी नए काम के बारे में सोचना शुरू कर चुके हैं। भारतीय जिस काम को बड़े उत्साह के साथ शुरू करते हैं उसका अंतिम हिस्सा ठीक तरह से पूरा करने की पर्याप्त योग्यता उनमें नहीं होती।

इसके बहुत से उदाहरण दिये जा सकते हैं लेकिन भवन निर्माण से संबन्धित कामों में यह बात बहुत साफ तौर पर उजागर होती है। जैसे पेंटर रोलर से नहीं, अपने छोटे से ब्रश से दीवारों पर पेंट करता है। यह काम वह घंटों बहुत सफाई के साथ, करीने से, यह ध्यान रखते हुए कि सीलिंग पर लगे प्लास्टर ऑफ पेरिस की नक्काशी पर पेंट न लगे, करता रहता है। लेकिन आप अचानक देखेंगे कि वह बिजली के स्विच बोर्ड तक आया और इतनी लापरवाही से पेंट करने लगा कि उसका ब्रश बोर्ड के ऊपर भी चलता चला गया, जिससे सारा स्विच बोर्ड गंदा हो गया। यह स्विच बोर्ड अब किसी भी आने-जाने वाले की नज़रों से बच नहीं सकता।

एक बनी बनाई अलमारी को एक बढ़ई कमरे के सँकरे कोने में फिट करता है। अलमारी उसी कोने में रखने के लिए नाप लेकर बनवाई गई है और पहली नज़र में बिल्कुल बढ़िया ढंग से फिट भी हो गई है। लेकिन ज़रा बारीकी से देखने पर आपके दिमाग में एक बात कांटे की तरह चुभ जाती है। दरअसल, उसका एक हैंडल उसके साथ वाले हैंडल से दो सेंटीमीटर ऊपर लगा हुआ है।

नलसाज (plumber) बाथरूम का सामान फिट करता है। सारा काम अच्छी तरह हो चुका है, बस सारे छिद्रों को बंद करना है और इसके लिए वह सीमेंट का उपयोग करता है। उसने सारे छिद्रों को अच्छे से भरा, कोई कोना-कतरा नहीं छोड़ा लेकिन काम इस लापरवाही से किया कि सीमेंट से दीवारों की टाइल्स पर दाग पड़ गए, मार्बल का फर्श भी हमेशा के लिए सीमेंट के छीटों से दागदार हो गया।

हमारे दरबान ने एक बार हमारे दरवाजे को, जिसका हत्था (closer) ढीला हो गया था और दरवाजा बंद होने में व्यवधान उपस्थित करता था, तात्कालिक रूप से ठीक किया था। उसने सीलिंग पर लगे हुक में एक रस्सी बांध दी और उसके दूसरे सिरे को हत्थे से बांध दिया, जिससे हत्था उठा रहता था और दरवाजा खुलने में कोई दिक्कत पेश नहीं आती थी। एक दिन बाद वह उसे ठीक करने के लिए एक औज़ार लेकर आया और दरवाजा ठीक कर दिया। फिर उसने हत्थे से रस्सी निकाल दी। वह उस समय भी एक कुर्सी पर चढ़ा काम कर रहा था लेकिन वह सीलिंग में लगे हुक तक नहीं पहुँच पा रहा था, जिससे रस्सी को वहाँ से भी निकाल सके। तो उसने क्या किया? वहाँ तक पहुँचने के लिए वह किसी ऊंची चीज़ को लेने नहीं गया, बल्कि जितना ऊंचा उसका हाथ जा सकता था, उतना ऊपर पहुँचकर उसने रस्सी को वहाँ से काट दिया, जिससे रस्सी का छोटा सा टुकड़ा छत से लटकता रहा। अपने ऑफिस में बैठे बैठे मैं कई हफ्ते उस लटकती रस्सी को देखकर झुँझलाता रहा। हम समझ नहीं पाए कि उसने ऐसा क्यों किया होगा। आखिर हम लोगों में से एक गया और मेहरबानी करते हुए उस लटकती रस्सी को निकाला।

हमारे यहाँ एक बाथ टब है। वह एक प्लास्टिक में पैक होकर आया था। उनके कर्मचारी भीतर आए और उन्होंने अपना काम बखूबी पूरा कर दिया। उनके सफाई करने वालों ने बहुत अच्छा काम किया और सारा कचरा फेंककर बाथरूम साफ कर दिया। हम खुश थे क्योंकि हमारे सामने एक सुंदर, चमकदार बाथ-टब रखा हुआ था-लेकिन रुकिए, सब कुछ इतना चमकदार नहीं था। उस टब पर पूरे किनारे पर एक स्टिकर चिपका रह गया था, जिस पर लिखा था: हैंडल विथ केयर! (कृपया सावधानी के साथ बरताव करें!) वह एक स्टिकर था मगर उन्होंने उसे बाथरूम में टब के साथ स्थायी रूप से लगा दिया था और आधा हिस्सा मार्बल के फर्श पर सीमेंट से जोड़ भी दिया था।

अगर आप कुछ दिन भारत में घूमें-फिरें तो ऐसी छोटी-मोटी कमियों पर गौर करें। यह एक ऐसा चारित्रिक दोष है जो आपको भारत भर में देखने को मिलेगा और एक बार आप उससे परेशान न होने का निश्चय कर लें तो उसका मज़ा भी ले सकते हैं, उस पर हंस भी सकते हैं।

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