हम अपने स्कूली बच्चों के अभिभावकों के छोटे-मोटे झूठ क्यों स्वीकार कर लेते हैं? 18 अगस्त 2014

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

जो भी मेरे ब्लॉग नियमित रूप से पढ़ते हैं, जानते हैं कि हर शुक्रवार के दिन मैं अपने पाठकों का परिचय अपने स्कूल के किसी न किसी बच्चे से करवाता हूँ। इसके लिए हम बच्चों के घर जाकर उनके परिवार वालों से बात करते हैं, उनका वीडिओ बनाते हैं और उनके हाल-चाल जानने की कोशिश करते हैं। दुर्भाग्यवश अक्सर हमें महसूस होता है कि वे हमसे सच नहीं कह रहे हैं। ईमानदार न होना, कम से कम कुछ मामलों में, कुछ लोगों की आदत में शुमार होता है।

छोटे-छोटे झूठ बहुत आम हैं। शायद बहुत से झूठ तो हमें पता ही नहीं चलते। वैसे भी आर्थिक प्रश्नों पर उनके झूठ हमेशा पूरी तरह झूठ नहीं माने जा सकते। स्वाभाविक ही जब हम किसी परिवार से बात करते हैं तो पहला सवाल परिवार में कमाने वाले सदस्य के काम-धंधे को लेकर होता है और दूसरा उसकी मासिक आमदनी को लेकर। वह कितना कमाता है और क्या परिवार के पास आमदनी के दूसरे स्रोत भी हैं?

अब हमें उनके विभिन्न काम-धंधों में होने वाली आमदनी का मोटा अंदाज़ हो गया है। हम जानते हैं कि एक रिक्शा चलाने वाला, एक राजगीर, बैलगाड़ी हाँकने वाला या दर्ज़ी हर माह कितना कमाता होगा। हमें भी कई बार इस तरह के रोजगार करने वालों को काम पर रखना होता है। हमारे बच्चों के अभिभावक इन कामों से होने वाली जो आमदनी बताते हैं वह अक्सर सामान्य, औसत आमदनी से कम होती है। हम जानते हैं कि वे कम बता रहे हैं मगर हम अपनी ओर से कुछ जोड़-जाड़कर उसे स्वीकार कर लेते हैं। हम जानते हैं कि इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला।

वास्तव में कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर कोई व्यक्ति हर माह 50 $ कमाता है मगर हमें 40 या और भी कम, 30 $ ही बताता है तो हर हाल में वह गरीब ही होता है। 10 या 20 $ अधिक कमा भी लेता होगा तो उतने फर्क से उसे संपन्न नहीं माना जा सकता, खासकर तब, जब हमें पता चलता है कि उसके तीन या चार बच्चे भी हैं!

इसलिए हम उनके छोटे-छोटे झूठों को स्वीकार कर लेते हैं-लेकिन कई बार ये झूठ बहुत स्पष्ट और प्रत्यक्ष होते हैं! उनके झूठ इतने अवास्तविक और गैर वाजिब लगने लगते हैं कि कोई भी बता सकता है कि जो आमदनी वे बता रहे हैं, उतने कम में परिवार चलाना असंभव है-विशेष रूप से तब, जब आप उनके घर में बैठे हों और हर तरह से देख-समझ रहे हों कि वे अपनी आमदनी किन चीज़ों पर खर्च करते हैं।

लेकिन क्या किया जाए? यह तो हम देख ही रहे हैं कि वे धनवान नहीं हैं। बल्कि हम देखते हैं कि वे वाकई गरीब हैं और बच्चों की पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकेंगे। उस वक़्त उनसे बहुत वाद-प्रतिवाद करने का कोई अर्थ नहीं होता। तो हमें ऐसे झूठ स्वीकार करने पड़ने हैं-लेकिन हम यह बात आपको बताना चाहते हैं।

बहुत से गरीब अपने आपको उससे ज़्यादा गरीब दिखाते हैं, जितने कि वे वास्तव में होते हैं क्योंकि वे सोचते हैं कि इससे उन्हें लाभ मिल सकता है। यह सामान्य और समझ में आने वाली बात है। यह दिलचस्प भी है कि इसके लिए वे छोटा-मोटा झूठ बोलते हैं। लेकिन यही झूठ उनके बड़ी और महत्वपूर्ण बातों पर भी झूठ बोलने की जड़ है!