दूसरों को खुश करने के लिए झूठ न बोलें – 20 मार्च 13

ईमानदारी

मेरे जीवन में ऐसा कई बार हुआ है कि किसी ने मुझसे एक सवाल पूछा और मुझे यह पहले से ही पता था कि यदि मैंने पूरी ईमानदारी से उत्तर दिया तो प्रश्नकर्ता नाराज़ हो जाएगा। मैं जानता हूं कि आप सबों के साथ भी कभी न कभी ऐसा होता होगा। यह एक ऐसी स्थिति होती है जो कई लोगों को असहज कर देती है। आइए, आज और आने वाले कुछ दिनों में इस बात की पड़ताल करते हैं कि हमारे पास और क्या विकल्प हो सकते हैं जिससे सामने वाले को बुरा न लगेः

पहला विकल्पः झूठ बोल दीजिए

शायद यह एक ऐसा विकल्प है जो हर व्यक्ति के दिमाग़ में सबसे पहले आता हैः वही बोलो जो सामने वाले को पसंद आए। आप बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि यह झूठ है लेकिन फिर भी आपको उस समय यही विकल्प सबसे अधिक निरापद लगता है।

अग़र आप हमेशा सबको खुश करने की कोशिश करने वालों की जमात में शामिल हैं तो शायद आप कई बार ऐसी स्थिति का सामना कर चुके होंगें। कल्पना करेः आपकी मित्र और आप साथ सिनेमा जाने की सोच रहे हैं और मित्र कहती है "मेरी बहन भी यह फिल्म देखना चाहती है। आप बुरा तो नहीं मानोगे अग़र वह भी हमारे साथ चले?" आपको दोस्त की बहन के साथ फिल्म देखना कतई पसंद नहीं है। लेकिन आप अपनी दोस्त को नाराज़ भी नहीं करना चाहते और यह भी जाहिर नहीं होने देना चाहते कि आपको उसकी बहन बिल्कुल पसंद नहीं है। तो आपका जवाब होगा "हां, क्यों नहीं। तुम्हारी बहन भी साथ चलेगी तो अच्छा लगेगा।"

आप हर किसी को खुश रखना चाहते हैं और चाहते हैं कि हर कीमत पर समरसता बनी रहे। तो इस बात में आपको कोई नुकसान नज़र नहीं आता कि आप बस इस बार ईमानदारी से जवाब नहीं दे सके! आप दोस्त के साथ काफी वक़्त गुजारते हैं, यदि थोड़ा वक़्त उसकी बहन के साथ भी गुजार लेंगें तो कुछ घट नहीं जाएगा आपका। क्या आपको दोस्त के रिश्तेदारों के साथ भी थोड़ा वक़्त नहीं बिताना चाहिए?

आपको अपनी इस ग़लती का अहसास तब होगा जब आपकी शाम खराब हो जाएगी। आपने दोस्त को थोड़ी देर के लिए खुश भले ही कर लिया हो लेकिन कभी न कभी उसे असलियत का पता चल ही जाएगा । झूठ बहुत ज्यादा दिन नहीं चलता।

झूठ बोलकर दूसरे के लिए समस्याएं खड़ी करने के अतिरिक्त आपने स्वयं को भी नाखुश कर लिया है। चाहे आपकी आत्मा ने एक झूठ बोलने की गवाही दे दी हो परंतु आप उसके अनुसार व्यवहार नहीं कर पाएंगें क्योंकि आपके भीतर की सच्चाई तो कुछ और है। आप कहते है, "मुझे नीला रंग पसंद है।" लेकिन खरीदते हमेशा लाल रंग हैं तो क्या दूसरा व्यक्ति इस विसंगति पर ध्यान नहीं देगा। या फिर लाल रंग खरीदने का मन होते हुए भी आपको जबरन नीला रंग ही खरीदना पड़ेगा। नतीजाः आप नाखुश और दूसरा भी नाखुश। अर्थात यह विकल्प कामयाब नहीं रहा।

मैंने ऊपर जो उदाहरण दिया था, आइए, जरा उसे चित्रांकित करके देखें। आप सिनेमा हॉल में बैठे हैं और वे दोनों बहनें जमकर लुत्फ उठा रही हैं और आपको उनकी बातें जरा नहीं सुहा रही हैं। दोस्त की बहन आपसे कुछ पूछती है और आप, जो पहले से ही भरे बैठे थे, अभद्रता से जवाब देते हैं या उतनी सह्रदयता से जवाब नहीं देते जिसकी आदत आपकी दोस्त को है – तो अवश्य उसे बुरा लगेगा। वह आप पर नाराज़ भी हो सकती है। आखिरकार अपनी बहन को साथ लाने से पहले उसने आपसे इज़ाजत ली थी, तो अब क्या परेशानी है? आपकी शाम नाखुशग़वार गुजरी सो अलग।

झूठ बोलना किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। उल्टे इससे नई – नई समस्याएं खड़ी हो जाएंगीं। इसीलिए मेरा मानना है कि आपकी और आपके नज़दीक वालों की भलाई इसी में है कि इस विकल्प का चुनाव न करें।

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